भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 933
* अध्याय २४० *९२३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दिव्यान्तरिक्षक्षितिजैरुत्पातैः पीडितं परम्।<br>षडक्षपीडासंतप्तं पीडितं च तथा ग्रहैः॥ ७<br><br>ज्वलन्ती च तथैवोल्का दिशं यां च प्रपद्यते।<br>भूकम्पोल्कादि संयाति यां च केतुः प्रसूयते॥ ८<br><br>निर्घातश्च पतेद् यत्र तां यायाद् वसुधाधिपः।<br>स्वबलव्यसनोपेतं तथा दुर्भिक्षपीडितम्॥ ९<br><br>सम्भूतान्तरकोपं च क्षिप्रं प्रायादरिं नृपः।<br>यूकामाक्षीकबहुलं बहुपङ्कं तथाविलम्॥ १०<br><br>नास्तिकं भिन्नमर्यादं तथामङ्गलवादिनम्।<br>अपेतप्रकृतिं चैव निःसारं च तथा जयेत्॥ ११जो दिव्य, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वीजन्य उत्पातोंसे पीड़ित, हाथ-पैर आदि छः इन्द्रियोंकी पीड़ासे संतप्त तथा ग्रहोंद्वारा पीड़ित हो, ऐसे शत्रु राजापर विजय-यात्रा करनी चाहिये। जिस दिशामें जलती हुई उल्का गिरती है, जिस दिशामें भूकम्पादि उत्पात अधिक होते हैं तथा पुच्छल तारा उदित होता है, उसी दिशामें राजाको विजयार्थ यात्रा करनी चाहिये। जो अपनी सेनाके विद्रोहसे युक्त, दुर्भिक्षसे पीड़ित तथा आन्तरिक विद्रोहसे प्रभावित हो, ऐसे शत्रुपर राजाको तुरंत आक्रमण कर देना चाहिये। जिसके देशमें ढील, मक्खी, कीचड़ और गंदगीकी बहुतायत हो, जो नास्तिक, मर्यादारहित, अमङ्गलवादी, दुश्चरित्र और पराक्रमहीन हो—ऐसे शत्रुको वशमें कर लेना उचित है॥ २—११॥
विद्विष्टनायकं सैन्यं तथा भिन्नं परस्परम्।<br>व्यसनासक्तनृपतिं बलं राजाभियोजयेत्॥ १२जिस राजाकी प्रजा या सेनानायक उसका शत्रु हो गया हो अथवा उसके मन्त्री-सेना आदिमें भी परस्पर विद्वेष हो, वह स्वयं किसी विपत्तिमें पड़ गया हो, ऐसे शत्रुपर अपनी सेनाको चढ़ाईका आदेश दे देना चाहिये।
सैनिकानां न शस्त्राणि स्फुरन्त्यङ्गानि यत्र च।<br>दुःस्वप्नानि च पश्यन्ति बलं तदभियोजयेत्॥ १३जिस राजाके सैनिकोंके अस्त्र एवं अङ्ग प्रस्फुरित न होते हों तथा उन्हें बुरे स्वप्न दीख पड़ते हों, उनपर धावा बोल देना चाहिये।
उत्साहबलसम्पन्नः स्वानुरक्तबलस्तथा।<br>तुष्टपुष्टबलो राजा परानभिमुखो व्रजेत्॥ १४उत्साह एवं पराक्रमसे संयुक्त तथा अपनेमें अनुराग करनेवाली, संतुष्ट एवं परिपुष्ट विशाल सेनासे सम्पन्न राजा शत्रुओंपर आक्रमण कर दे।
शरीरस्फुरणे धन्ये तथा दुःस्वप्ननाशने।<br>निमित्ते शकुने धन्ये जाते शत्रुपुरं व्रजेत्॥ १५जब शुभ अङ्ग फड़कते हों, दुःस्वप्न न दिखायी पड़ते हों तथा शुभ शकुन दिखायी पड़ रहे हों, उस समय शत्रुकी राजधानीपर चढ़ाई करनी चाहिये।
ऋक्षेषु षट्सु शुद्धेषु ग्रहेष्वनुगुणेषु च।<br>प्रश्नकाले शुभे जाते परान् यायान्नराधिपः॥ १६जन्म-नक्षत्र आदि छः नक्षत्रोंके शुद्ध होनेपर, शुभ ग्रहोंकी स्थिति अनुकूल होनेपर तथा प्रश्न करनेपर शुभदायक उत्तर मिलनेपर राजाको शत्रुओंपर आक्रमण करना चाहिये।
एवं तु दैवसम्पन्नस्तथा पौरुषसंयुतः।<br>देशकालोपपन्नां तु यात्रां कुर्यान्नराधिपः॥ १७<br><br>स्थले नक्रस्तु नागस्य तस्यापि सजले वशे।<br>उलूकस्य निशि ध्वाङ्क्षः स च तस्य दिवा वशे॥ १८इस प्रकार दैवबल तथा पराक्रमसे संयुक्त राजा देश एवं कालके अनुसार शत्रुपर चढ़ाई करे। स्थलपर मगर हाथीके वशमें होता है, किंतु जलमें हाथी नाकके वशमें हो जाता है। इसी प्रकार रात्रिमें काक उल्लूके अधीन हो जाता है, किंतु दिनमें उल्लू काकके वशमें होता है। इसी प्रकार राजाको देश एवं कालका विचारकर शत्रुपर विजय-यात्रा करनी चाहिये॥ १२—१८ १/२॥
एवं देशं च कालं च ज्ञात्वा यात्रां प्रयोजयेत्।<br>पदातिनागबहुलां सेनां प्रावृषि योजयेत्॥ १९राजाको वर्षा-ऋतुमें पैदल और हाथियोंकी सेनाको,
हेमन्ते शिशिरे चैव रथवाजिसमाकुलाम्।<br>खरोष्ट्रबहुलां सेनां तथा ग्रीष्मे नराधिपः॥ २०हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें अधिक रथ और घोड़ोंसे सम्पन्न सेनाको ग्रीष्म-ऋतुमें गधे और ऊँटोंसे भरी हुई सेनाको तथा