भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
* अध्याय २४० *९२३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दिव्यान्तरिक्षक्षितिजैरुत्पातैः पीडितं परम्।<br>षडक्षपीडासंतप्तं पीडितं च तथा ग्रहैः॥ ७<br><br>ज्वलन्ती च तथैवोल्का दिशं यां च प्रपद्यते।<br>भूकम्पोल्कादि संयाति यां च केतुः प्रसूयते॥ ८<br><br>निर्घातश्च पतेद् यत्र तां यायाद् वसुधाधिपः।<br>स्वबलव्यसनोपेतं तथा दुर्भिक्षपीडितम्॥ ९<br><br>सम्भूतान्तरकोपं च क्षिप्रं प्रायादरिं नृपः।<br>यूकामाक्षीकबहुलं बहुपङ्कं तथाविलम्॥ १०<br><br>नास्तिकं भिन्नमर्यादं तथामङ्गलवादिनम्।<br>अपेतप्रकृतिं चैव निःसारं च तथा जयेत्॥ ११जो दिव्य, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वीजन्य उत्पातोंसे पीड़ित, हाथ-पैर आदि छः इन्द्रियोंकी पीड़ासे संतप्त तथा ग्रहोंद्वारा पीड़ित हो, ऐसे शत्रु राजापर विजय-यात्रा करनी चाहिये। जिस दिशामें जलती हुई उल्का गिरती है, जिस दिशामें भूकम्पादि उत्पात अधिक होते हैं तथा पुच्छल तारा उदित होता है, उसी दिशामें राजाको विजयार्थ यात्रा करनी चाहिये। जो अपनी सेनाके विद्रोहसे युक्त, दुर्भिक्षसे पीड़ित तथा आन्तरिक विद्रोहसे प्रभावित हो, ऐसे शत्रुपर राजाको तुरंत आक्रमण कर देना चाहिये। जिसके देशमें ढील, मक्खी, कीचड़ और गंदगीकी बहुतायत हो, जो नास्तिक, मर्यादारहित, अमङ्गलवादी, दुश्चरित्र और पराक्रमहीन हो—ऐसे शत्रुको वशमें कर लेना उचित है॥ २—११॥
विद्विष्टनायकं सैन्यं तथा भिन्नं परस्परम्।<br>व्यसनासक्तनृपतिं बलं राजाभियोजयेत्॥ १२जिस राजाकी प्रजा या सेनानायक उसका शत्रु हो गया हो अथवा उसके मन्त्री-सेना आदिमें भी परस्पर विद्वेष हो, वह स्वयं किसी विपत्तिमें पड़ गया हो, ऐसे शत्रुपर अपनी सेनाको चढ़ाईका आदेश दे देना चाहिये।
सैनिकानां न शस्त्राणि स्फुरन्त्यङ्गानि यत्र च।<br>दुःस्वप्नानि च पश्यन्ति बलं तदभियोजयेत्॥ १३जिस राजाके सैनिकोंके अस्त्र एवं अङ्ग प्रस्फुरित न होते हों तथा उन्हें बुरे स्वप्न दीख पड़ते हों, उनपर धावा बोल देना चाहिये।
उत्साहबलसम्पन्नः स्वानुरक्तबलस्तथा।<br>तुष्टपुष्टबलो राजा परानभिमुखो व्रजेत्॥ १४उत्साह एवं पराक्रमसे संयुक्त तथा अपनेमें अनुराग करनेवाली, संतुष्ट एवं परिपुष्ट विशाल सेनासे सम्पन्न राजा शत्रुओंपर आक्रमण कर दे।
शरीरस्फुरणे धन्ये तथा दुःस्वप्ननाशने।<br>निमित्ते शकुने धन्ये जाते शत्रुपुरं व्रजेत्॥ १५जब शुभ अङ्ग फड़कते हों, दुःस्वप्न न दिखायी पड़ते हों तथा शुभ शकुन दिखायी पड़ रहे हों, उस समय शत्रुकी राजधानीपर चढ़ाई करनी चाहिये।
ऋक्षेषु षट्सु शुद्धेषु ग्रहेष्वनुगुणेषु च।<br>प्रश्नकाले शुभे जाते परान् यायान्नराधिपः॥ १६जन्म-नक्षत्र आदि छः नक्षत्रोंके शुद्ध होनेपर, शुभ ग्रहोंकी स्थिति अनुकूल होनेपर तथा प्रश्न करनेपर शुभदायक उत्तर मिलनेपर राजाको शत्रुओंपर आक्रमण करना चाहिये।
एवं तु दैवसम्पन्नस्तथा पौरुषसंयुतः।<br>देशकालोपपन्नां तु यात्रां कुर्यान्नराधिपः॥ १७<br><br>स्थले नक्रस्तु नागस्य तस्यापि सजले वशे।<br>उलूकस्य निशि ध्वाङ्क्षः स च तस्य दिवा वशे॥ १८इस प्रकार दैवबल तथा पराक्रमसे संयुक्त राजा देश एवं कालके अनुसार शत्रुपर चढ़ाई करे। स्थलपर मगर हाथीके वशमें होता है, किंतु जलमें हाथी नाकके वशमें हो जाता है। इसी प्रकार रात्रिमें काक उल्लूके अधीन हो जाता है, किंतु दिनमें उल्लू काकके वशमें होता है। इसी प्रकार राजाको देश एवं कालका विचारकर शत्रुपर विजय-यात्रा करनी चाहिये॥ १२—१८ १/२॥
एवं देशं च कालं च ज्ञात्वा यात्रां प्रयोजयेत्।<br>पदातिनागबहुलां सेनां प्रावृषि योजयेत्॥ १९राजाको वर्षा-ऋतुमें पैदल और हाथियोंकी सेनाको,
हेमन्ते शिशिरे चैव रथवाजिसमाकुलाम्।<br>खरोष्ट्रबहुलां सेनां तथा ग्रीष्मे नराधिपः॥ २०हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें अधिक रथ और घोड़ोंसे सम्पन्न सेनाको ग्रीष्म-ऋतुमें गधे और ऊँटोंसे भरी हुई सेनाको तथा
९२४* मत्स्यपुराण *
चतुरङ्गबलोपेतां वसन्ते वा शरद्यथ।<br>सेना पदातिबहुला यस्य स्यात् पृथिवीपतेः॥ २१<br>अभियोज्यो भवेत् तेन शत्रुग्विषममाश्रितः।<br>गम्ये वृक्षावृते देशे स्थितं शत्रुं तथैव च॥ २२<br>किञ्चित्पङ्के तथा यायाद् बहुनागो नराधिपः।<br>रथाश्वबहुलो यायाच्छत्रुं समपथस्थितम्॥ २३<br>तमाश्रयन्तो बहुलास्तांस्तु राजा प्रपूजयेत्।<br>खरोष्ट्रबहुलो राजा शत्रुर्वन्धेन संस्थितः॥ २४<br>बन्धनस्थोऽभियोज्योऽरिस्तथा प्रावृषि भूभुजा।<br>हिमपातयुते देशे स्थितं ग्रीष्मेऽभियोजयेत्॥ २५<br>यवसेन्धनसंयुक्तः कालः पार्थिव हैमनः।<br>शरद्वसन्तौ धर्मज्ञ कालौ साधारणौ स्मृतौ॥ २६<br>विज्ञाय राजा हितदेशकालौ<br>दैवं त्रिकालं च तथैव बुद्ध्वा।<br>यायात् परं कालविदां मतेन<br>संचिन्त्य सार्धं द्विजमन्त्रविद्भिः॥ २७वसन्त और शरद्-ऋतुमें चतुरंगिणी सेनाको यात्रामें लगाना उचित है। जिस राजाके पास पैदल सेना अधिक हो, उसे विषम स्थानपर स्थित शत्रुपर आक्रमण करना चाहिये। राजाको चाहिये कि जो शत्रु अधिक वृक्षोंसे युक्त देशमें या कुछ कीचड़वाले स्थानपर स्थित हो, उसपर हाथियोंकी सेनाके साथ चढ़ाई करे। समतल भूमिमें स्थित शत्रुपर रथ और घोड़ोंकी सेना साथ लेकर चढ़ाई करनी चाहिये। जिस शत्रुओंके पास बहुत बड़ी सेना हो, राजाको चाहिये कि उनका आदर-सत्कार करे, अर्थात् उनके साथ संधि कर ले। वर्षा-ऋतुमें अधिक संख्यामें गधे और ऊँटोंकी सेना रखनेवाला राजा यदि शत्रुके बन्धनमें पड़ गया हो तो उस अवस्थामें भी उसे वर्षा-ऋतुमें चढ़ाई करनी चाहिये। जिस देशमें बरफ गिरती हो, वहाँ राजा ग्रीष्म-ऋतुमें आक्रमण करे। पार्थिव! हेमन्त और शिशिर-ऋतुओंका समय काष्ठ तथा घास आदि साधनोंसे युक्त होनेसे यात्राके लिये बहुत अनुकूल रहता है। धर्मज्ञ! इसी प्रकार शरद् और वसन्त-ऋतुओंके काल भी अनुकूल माने गये हैं। राजाको देश-काल और त्रिकालज्ञ ज्योतिषीसे यात्राकी स्थितिको भलीभाँति समझकर उसी प्रकार पुरोहित और मन्त्रियोंके साथ परामर्श कर विजय-यात्रा करनी चाहिये॥ १९—२७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्तकालयोज्यचिन्ता नाम चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राकाल-विधान नामक दो सौ चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४०॥


दो सौ एकतालीसवाँ अध्याय

अङ्गस्फुरणके शुभाशुभ फल

मनुरुवाच<br>ब्रूहि मे त्वं निमित्तानि अशुभानि शुभानि च।<br>सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठ त्वं हि सर्वविदुच्यसे॥ १<br>मत्स्य उवाच<br>अङ्गदक्षिणभागे तु शस्तं प्रस्फुरणं भवेत्।<br>अप्रशस्तं तथा वामे पृष्ठस्य हृदयस्य च॥ २<br>मनुरुवाच<br>अङ्गानां स्पन्दनं चैव शुभाशुभविचेष्टितम्।<br>तन्मे विस्तरतो ब्रूहि येन स्यां तद्विदो भुवि॥ ३**मनुजीने पूछा—**सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ भगवन्! चूँकि आप सर्वज्ञ कहे जाते हैं, इसलिये अब आप मुझे शुभाशुभसूचक शकुनोंके लक्षण बतलाइये॥ १॥<br>**मत्स्यभगवान्‌ने कहा—**राजन्! शरीरके दाहिने भागमें स्फुरण होना शुभ तथा पीठ, हृदय और बायें भागका स्फुरण अशुभ फलदायक होता है॥ २॥<br>**मनुजीने पूछा—**भगवन्! अङ्गोंका स्फुरण जिस शुभा-शुभकी सूचना देनेवाला होता है, उसे मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये, जिससे मैं भूतलपर उसका ज्ञाता हो जाऊँ॥ ३॥

* अध्याय २४१ * ९२५

मत्स्य उवाच
पृथ्वीलाभो भवेन्मूर्ध्नि ललाटे रविनन्दन।<br>स्थानं विवृद्धिमायाति भ्रूनसोः प्रियसंगमः॥ ४<br>भृत्यलब्धिश्चाक्षिदेशे दृगुपान्ते धनागमः।<br>उत्कण्ठोपगमो मध्ये दृष्टं राजन् विचक्षणैः॥ ५<br>दृग्बन्धने सङ्गरे च जयं शीघ्रमवाप्नुयात्।<br>योषिद्भोगोऽपाङ्गदेशे श्रवणान्ते प्रियश्रुतिः॥ ६<br>नासिकायां प्रीतिसौख्यं प्रजाप्तिरधरोष्ठजे।<br>कण्ठे तु भोगलाभः स्याद् भोगवृद्धिस्तथांसयोः॥ ७<br>सुहृत्स्नेहश्च बाहुभ्यां हस्ते चैव धनागमः।<br>पृष्ठे पराजयः सद्यो जयो वक्षःस्थले भवेत्॥ ८मत्स्यभगवान् बोले— रविनन्दन! सिरके स्फुरणसे पृथ्वीका लाभ होता है, ललाटके स्फुरणसे स्थानकी वृद्धि होती है, भौंह और नासिकाके स्फुरणसे प्रियजनोंका समागम होता है। राजन्! नेत्रोंके फड़कनेसे सेवककी तथा नेत्रोंके समीप स्फुरण होनेसे धनकी प्राप्ति होती है। नेत्रोंके मध्य भागमें स्फुरण होनेसे उत्कण्ठा बढ़ती है, ऐसा विचक्षणोंने अनुभव किया है। नेत्र-पलकोंके फड़कनेसे संग्राममें शीघ्र ही विजय प्राप्त होती है। नेत्रापाङ्गोंके स्फुरणसे स्त्री-लाभ, कानके फड़कनेसे प्रियवार्ता-श्रवण, नासिका-स्फुरणसे प्रीति एवं सौख्य, निचले होंठके फड़कनेसे संतान-प्राप्ति, कण्ठ-स्फुरणसे भोग-लाभ तथा दोनों कंधोंके स्फुरणसे भोगकी वृद्धि होती है। बाहुओंके फड़कनेसे मित्र-स्नेहकी प्राप्ति, हाथके स्फुरणसे धनकी प्राप्ति, पीठके फड़कनेसे युद्धमें पराजय तथा छातीके स्फुरणसे विजय-प्राप्ति होती है॥ ४-८॥
कुक्षिभ्यां प्रीतिरुद्दिष्टा स्त्रियाः प्रजननं स्तने।<br>स्थानभ्रंशो नाभिदेशे अन्त्रे चैव धनागमः॥ ९<br>जानुसंधौ परैः संधिर्बलवद्भिर्भवेन्नृप।<br>देशैकदेशनाशोऽथ जङ्घाभ्यां रविनन्दन॥ १०<br>उत्तमं स्थानमाप्नोति पद्भ्यां प्रस्फुरणान्नृप।<br>सलाभं चाध्वगमनं भवेत् पादतले नृप॥ ११<br>लाञ्छनं पिटकं चैव ज्ञेयं स्फुरणवत् तथा।<br>विपर्ययेण विहितः सर्वः स्त्रीणां फलागमः॥ १२<br>अप्रशस्ते तदा वामे त्वप्रशस्तं विशेषतः।<br>दक्षिणेऽपि प्रशस्तेऽङ्गे प्रशस्तं स्याद् विशेषतः॥ १३<br>अतोऽन्यथा सिद्धिप्रजल्पनात् तु<br>फलस्य शस्तस्य च निन्दितस्य।<br>अनिष्टचिह्नोपगमे द्विजानां<br>कार्यं सुवर्णेन तु तर्पणं स्यात्॥ १४दोनों कुक्षियोंके फड़कनेसे प्रेमकी वृद्धि कही गयी है, स्तनके स्फुरणसे स्त्रीसे संतानोत्पत्ति होती है। राजन्! नाभिके स्फुरणसे स्थानसे च्युत होना पड़ता है, आँतके फड़कनेसे धनकी प्राप्ति तथा जानुके संधिभागके स्फुरणसे बलवान् शत्रुओंके साथ संधि हो जाती है। रविनन्दन! फिल्लियोंके फड़कनेसे राजाके देशके किसी भागका नाश होता है। नृप! दोनों पैरोंके स्फुरणसे उत्तम स्थानकी प्राप्ति होती है। राजन्! पैरोंके तलुओंके फड़कनेसे लाभदायिनी यात्रा होती है। अङ्गस्फुरणके समान ही लक्षण (कालेदाग) एवं पिटकों (छोटे मांसपिण्ड, जो जन्मसे ही बालकोंके अङ्गोंमें उत्पन्न होते हैं)-के भी फलाफलको जानना चाहिये। स्त्रियोंके लिये ये सभी फलागम विपरीत होते हैं। बायें भागके अप्रशस्त अङ्गोंके स्फुरणसे विशेष अशुभ होता है। इसी प्रकार दाहिने भागमें भी शुभ अङ्गोंके स्फुरणसे विशेष शुभ होता है। इस शुभ एवं अशुभ फलके सिद्धि-कथनके अतिरिक्त अनिष्ट चिह्नके प्रकट होनेपर ब्राह्मणोंको सुवर्णदान देकर संतुष्ट करना चाहिये॥ ९—१४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्तकदेहस्पन्दनं नामैकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गस्फुरण नामक दो सौ एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४१॥

२४५- बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्लादका उन्हें शाप, बलिकी अनुनय, ब्रह्माजी-द्वारा वामनभगवान्‌का स्तवन, भगवान्‌ वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान

९२६* मत्स्यपुराण *

दो सौ बयालीसवाँ अध्याय

शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण

मनुरुवाचमनुजीने पूछा—देव! यात्राके समयके स्वप्नका वृत्तान्त कैसा है? विविध प्रकारके वैसे यों भी स्वप्न अनेक दिखायी पड़ते हैं, उनका फल कैसा होता है (बतलायें)॥ १॥
स्वप्नाख्यानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते।<br>दृश्यन्ते विविधाकाराः कथं तेषां फलं भवेत्॥ १
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—मनो! अब मैं स्वप्नोंके शुभाशुभ लक्षणोंको बतला रहा हूँ! नाभिके अतिरिक्त अन्य अङ्गोंमें तृण एवं वृक्षका उगना, मस्तकपर कांसेका कूटा जाना, मुण्डन, नग्नता, मलिन वस्त्रोंका धारण करना, तेल लगाना, कीचमें धँसना, लेप, ऊँचे स्थानसे गिरना, झूलेपर चढ़ना, कीचड़ और लोहेको इकट्ठा करना, घोड़ोंको मारना, लाल पुष्पवाले वृक्षों, मण्डल, शूकर, रीछ, गधे और ऊँटोंपर चढ़ना, पक्षी, मछली, तेल और खिचड़ीका भोजन, नाचना, हँसना, विवाह, गायन, वीणाको छोड़कर अन्य वाद्योंका स्वागत करना, जलके सोतेमें स्नान करनेके लिये जाना, गोबर लगाकर जलमें स्नान करना, इसी प्रकार कीचड़युक्त जलमें तथा पृथ्वीके थोड़े जलमें नहाना, माताके उदरमें प्रवेश करना, चितापर चढ़ना, इन्द्रध्वजका गिरना, चन्द्रमा और सूर्यका पतन, दिव्य, अन्तरिक्ष तथा भौम उत्पातोंका दर्शन, देवता, द्विजाति, राजा और गुरुका क्रोध, कुमारी कन्याओंका आलिङ्गन, पुरुषोंके साथ सम्भोग, अपने ही शरीरका नाश, विरेचन, वमन, दक्षिण दिशाकी यात्रा, किसी व्याधिसे पीड़ित होना, फलों तथा पुष्पोंकी हानि, घरोंका गिरना, घरोंकी सफाई होना, पिशाच, मांसभक्षी जीव, वानर, रीछ और मनुष्यके साथ क्रीडा करना, शत्रुसे पराजित होना या उसकी ओरसे किसी प्रकारकी आपत्तिका प्रकट होना, काषाय वस्त्रको धारण करना अथवा वैसे वस्त्रवाली स्त्रीके साथ क्रीडा करना, तेल-पान या उसीमें स्नान करना, लाल पुष्प और लाल चन्दनको धारण करना तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दुःस्वप्न कहे गये हैं। इन्हें देखनेके बाद दूसरेसे कह देना तथा पुनः सो जाना कल्याणकारक है॥ २–१५॥
इदानीं कथयिष्यामि निमित्तं स्वप्नदर्शने।<br>नाभिं विनान्यगात्रेषु तृणवृक्षसमुद्भवः॥ २
चूर्णं मूर्ध्नि कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा।<br>मलिनाम्बरधारित्वमभ्यङ्गः पङ्कदिग्धता॥ ३
उच्चात् प्रपतनं चैव दोलारोहणमेव च।<br>अर्जनं पङ्कलोहानां हयानामपि मारणम्॥ ४
रक्तपुष्पद्रुमाणां च मण्डलस्य तथैव च।<br>वराहर्क्षरक्षोष्ट्राणां तथा चारोहणक्रिया॥ ५
भक्षणं पक्षिमत्स्यानां तैलस्य कृसरस्य च।<br>नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च॥ ६
तन्त्रीवाद्यविहीनानां वाद्यानामभिवादनम्।<br>स्रोतोऽवगाहगमनं स्नानं गोमयवारिणा॥ ७
पङ्कोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ।<br>मातुः प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च॥ ८
शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसूर्ययोः।<br>दिव्यान्तरिक्षभौमानामुत्पातानां च दर्शनम्॥ ९
देवद्विजातिभूपालगुरूणां क्रोध एव च।<br>आलिङ्गनं कुमारीणां पुरुषाणां च मैथुनम्॥ १०
हानिश्चैव स्वगात्राणां विरेचवमनक्रिया।<br>दक्षिणाशाभिगमनं व्याधिनाभिभवस्तथा॥ ११
फलापहानिश्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च।<br>गृहाणां चैव पातश्च गृहसम्मार्जनं तथा॥ १२
क्रीडा पिशाचक्रव्यादवानरर्क्षनरैरपि।<br>परादभिभवश्चैव तस्माच्च व्यसनोद्भवः॥ १३
काषायवस्त्रधारित्वं तद्वत् स्त्रीक्रीडनं तथा।<br>स्नेहपानावगाहौ च रक्तमाल्यानुलेपनम्॥ १४
एवमादीनि चान्यानि दुःस्वप्नानि विनिर्दिशेत्।<br>एषां संकथनं धन्यं भूयः प्रस्वापनं तथा॥ १५
  • अध्याय २४२ * | ९२७ --- | ---

| कल्कस्नानं तिलैर्होमो ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्॥ १६<br>नागेन्द्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्ननाशनम्।<br>स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवत्सरविपाकिनः॥ १७<br>षड्भिर्मासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयेके।<br>चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः॥ १८<br>अरुणोदयवेलायां दशाहेन फलं भवेत्।<br>एकस्यां यदि वा रात्रौ शुभं वा यदि वाशुभम्॥ १९<br>पश्चाद् दृष्टस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत्।<br>तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्चात् स्वप्नो न शस्यते॥ २० | (ऐसे स्वप्न देखनेपर) खली लगाकर स्नान, तिलसे हवन और ब्राह्मणोंका पूजन करे। भगवान् वासुदेवकी स्तुति उनकी पूजा और गजेन्द्रमोक्षकी कथाका श्रवण आदिका दुःस्वप्नका नाशक समझना चाहिये। रात्रिके पहले पहरमें देखे गये स्वप्न देखनेवालेको निःसंदेह एक वर्षमें, दूसरे पहरमें देखे गये छः महीनेमें, तीसरे पहरमें देखे गये तीन महीनेमें तथा चतुर्थ पहरमें देखे गये एक महीनेमें फल देते हैं। सूर्योदयके समय देखे जानेपर दस दिनमें ही फल प्राप्त होता है। यदि एक ही रातमें शुभ और अशुभ—दोनों प्रकारके स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जो पीछे दीख पड़ा हो, उसीका फल कहना चाहिये। इसलिये शुभ स्वप्नके देखनेपर मनुष्यको पुनः नहीं सोना चाहिये॥ १६—२०॥ | | शैलप्रासादनागाश्ववृषभारोहणं हितम्।<br>द्रुमाणां श्वेतपुष्पाणां गमने च तथा द्विज॥ २१<br>द्रुमतृणोद्भवो नाभौ तथैव बहुबाहुता।<br>तथैव बहुशीर्षत्वं फलितोद्भव एव च॥ २२<br>सुशुक्लमाल्यधारित्वं सुशुक्लाम्बरधारिता।<br>चन्द्रार्कताराग्रहणं परिमार्जनमेव च॥ २३<br>शक्रध्वजालिङ्गनं च तदुच्छ्रायक्रिया तथा।<br>भूम्यम्बुधीनां ग्रसनं शत्रूणां च वधक्रिया॥ २४<br>जयो विवादे द्यूते च संग्रामे च तथा द्विज।<br>भक्षणं चार्द्रमांसानां मत्स्यानां पायसस्य च॥ २५<br>दर्शनं रुधिरस्यापि स्नानं वा रुधिरेण च।<br>सुरारुधिरमद्यानां पानं क्षीरस्य चाथ वा॥ २६<br>अन्त्रैर्वा वेष्टनं भूमौ निर्मलं गगनं तथा।<br>मुखेन दोहनं शस्तं महिषीणां तथा गवाम्॥ २७<br>सिंहीनां हस्तिनीनां च वडवानां तथैव च।<br>प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा शुभः॥ २८ | द्विज! पर्वत, राजमहल, हाथी, घोड़ा, वृषभ—इनपर आरोहण करना हितकारक है तथा श्वेत पुष्पोंवाले वृक्षोंपर चढ़ना शुभप्रद है। नाभिमें वृक्ष और तृणका उत्पन्न होना, अनेक बाहुओंका होना, अनेक सिरोंका होना, फलदान, उद्भिद्जोंका दर्शन, सुन्दर श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओंको हाथसे पकड़ना या उन्हें स्वच्छ करना, इन्द्रधनुषका आलिङ्गन करना या उसे ऊपर उठाना, पृथ्वी और समुद्रोंको निगलना, शत्रुओंका संहार करना, संग्राम, विवाद और जूएमें जीतना, कच्चा मांस, मछली और खीरका खाना, रक्तका दर्शन या रक्तसे स्नान, मदिरा, रक्त, मद्य अथवा दुग्धका पीना, अपनी आँतोंसे पृथ्वीको बाँधना, निर्मल आकाशको देखना, भैंस, गाय, सिंहिनी, हथिनी तथा घोड़ियोंको मुखसे दुहना, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी प्रसन्नता—ये स्वप्न शुभदायक होते हैं॥ २१—२८॥ | | अम्भसा त्वभिषेकस्तु गवां शृङ्गस्रुतेन वा।<br>चन्द्राद् भ्रष्टेन वा राजन्ज्ञेयो राज्यप्रदोहि सः॥ २९<br>राज्याभिषेकश्च तथा छेदनं शिरसस्तथा।<br>मरणं वह्निदाहश्च वह्निदाहो गृहादिषु॥ ३०<br>लब्धिश्च राज्यलिङ्गानां तन्त्रीवाद्याभिवादनम्।<br>तथोदकानां तरणं तथा विषमल्लङ्घनम्॥ ३१ | राजन्! गौओंके सींगसे चूनेवाले अथवा चन्द्रमासे गिरे हुए जलसे अभिषेक होना राज्यप्रद समझना चाहिये। राज्याभिषेक, सिरका कटना, मृत्यु, अग्निका प्रज्वलित होना या घरमें आग लगना, राज्यचिह्नोंकी प्राप्ति, वीणाका स्वर सुनायी पड़ना, जलमें तैरना, दुर्गम स्थानोंको पार करना, |

९२८* मत्स्यपुराण *
हस्तिनीवडवानां च गवां च प्रसवो गृहे।<br>आरोहणमथाश्वानां रोदनं च तथा शुभम्॥ ३२<br>वरस्त्रीणां तथा लाभस्तथालिङ्गनमेव च।<br>निगडैर्बन्धनं धन्यं तथा विष्ठानुलेपनम्॥ ३३<br>जीवतां भूमिपालानां सुहृदामपि दर्शनम्।<br>दर्शनं देवतानां च विमलानां तथाम्भसाम्॥ ३४<br>शुभान्यथैतानि नरस्तु दृष्ट्वा<br>प्राप्नोत्ययत्नाद् ध्रुवमर्थलाभम्।<br>स्वप्नानि वै धर्मभृतां वरिष्ठ<br>व्याधेर्विमोक्षं च तथातुरोऽपि॥ ३५घरमें हथिनी, घोड़ी तथा गायोंका बच्चा देना, घोड़ेपर सवार होना तथा रोना—ये स्वप्न शुभदायक होते हैं। सुन्दरी स्त्रियोंकी प्राप्ति तथा उनका आलिङ्गन, जंजीरोंद्वारा बन्धन, मलका लेपन, जीवित राजाओं तथा मित्रोंका दर्शन, देवताओं तथा निर्मल जलका दर्शन—ये स्वप्न शुभ कहे गये हैं। धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ राजन्! मनुष्य इन शुभदायक स्वप्नोंको देखकर बिना प्रयासके ही निश्चितरूपमें धन प्राप्त कर लेता है तथा रोगग्रस्त व्यक्ति भी रोगसे मुक्त हो जाता है॥ २९—३५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते स्वप्नाध्यायोनाम द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राप्रसंगमें स्वप्नविवेक नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४२ ॥


दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय

शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण

मनुरुवाच<br>गमनं प्रति राज्ञां तु सम्मुखादर्शने च किम्।<br>प्रशस्तांश्चैव सम्भाष्य सर्वनेतांश्च कीर्तय॥ १मनुजीने पूछा—भगवन्! राजाओंके लिये यात्राके अवसरपर सम्मुख देखने या न देखने योग्य कौन-कौन-सी वस्तुएँ प्रशस्त मानी गयी हैं, उन सबका वर्णन कीजिये॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>औषधानि त्वयुक्तानि धान्यं कृष्णं च यद् भवेत्।<br>कार्पासश्च तृणं राजञ्छुष्कं गोमयमेव च॥ २<br>इन्धनं च तथाङ्गारं गुडं तैलं तथाशुभम्।<br>अभ्यक्तं मलिनं मुण्डं तथा नग्नं च मानवम्॥ ३<br>मुक्तकेशं रुजार्तं च काषायाम्बरधारिणम्।<br>उन्मत्तकं तथा सत्त्वं दीनं चाथ नपुंसकम्॥ ४<br>अयः पङ्कस्तथा चर्म केशबन्धनमेव च।<br>तथैवोद्धृतसाराणि पिण्याकादीनि यानि च॥ ५<br>चण्डालश्वपचाश्चैव राजबन्धनपालकाः।<br>वधकाः पापकर्माणो गर्भिणी स्त्री तथैव च॥ ६<br>तुषभस्मकपालास्थि भिन्नभाण्डानि यानि च।<br>रिक्तानि चैव भाण्डानि मृतं शार्ङ्गिकमेव च॥ ७मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! अनुपयुक्त ओषधियाँ, काला अन्न, कपास, तृण, सूखा गोबर, ईंधन, अङ्गार, गुड़, तेल—ये सब अशुभ वस्तुएँ हैं। तेल लगाया हुआ, मलिन, मुण्डन कराया हुआ, नंगा, खुले बालोंवाला, रोगपीड़ित, काषाय वस्त्रधारी, पागल, दीन तथा नपुंसक व्यक्ति, लोहा, कीचड़, चमड़ा, केशका बन्धन, खली आदि सभी सारहीन वस्तुएँ, चाण्डाल, श्वपच, बन्धनमें डालनेवाले राजाके कर्मचारी, जल्लाद, पापी, गर्भिणी स्त्री, भूसी, राख, खोपड़ी, हड्डी, टूटे हुए सभी पात्र, खाली पात्र, लाश, सींगोंवाले पशु—

* अध्याय २४३ * | ९२९

| एवमादीनि चान्यानि अशस्तान्यभिदर्शने।<br>अशस्तो वाद्यशब्दश्च भिन्नभैरवजर्जरः ॥ ८<br>पुरतः शब्द एहीति शस्यते न तु पृष्ठतः।<br>गच्छेति पश्चाद् धर्मज्ञ पुरस्तात् तु विगर्हितः ॥ ९<br>क्व यासि तिष्ठ मा गच्छ किं ते तत्र गतस्य तु।<br>अन्ये शब्दाश्च येऽनिष्टास्ते विपत्तिकरा अपि ॥ १०<br>ध्वजादिषु तथा स्थानं क्रव्यादानां विगर्हितम्।<br>स्खलनं वाहनानां च वस्त्रसङ्गस्तथैव च ॥ ११<br>निर्गतस्य तु द्वारादौ शिरसश्चाभिघातिता।<br>छत्रध्वजानां वस्त्राणां पतनं च तथाशुभम् ॥ १२<br>दृष्टे निमित्ते प्रथमममङ्गल्यविनाशनम्।<br>केशवं पूजयेद् विद्वान् स्तवेन मधुसूदनम् ॥ १३<br>द्वितीये तु ततो दृष्टे प्रतीपे प्रविशेद् गृहम्।<br>अथेष्टानि प्रवक्ष्यामि मङ्गल्यानि तथानघ ॥ १४<br>श्वेताः सुमनसः श्रेष्ठाः पूर्णकुम्भास्तथैव च।<br>जलजाः पक्षिणश्चैव मांसमत्स्याश्च पार्थिव ॥ १५<br>गावस्तुरंगमा नागा बद्ध एकः पशुस्त्वजः।<br>त्रिदशाः सुहृदो विप्रा ज्वलितश्च हुताशनः ॥ १६<br>गणिका च महाभाग दूर्वा चार्द्रं च गोमयम्।<br>रुक्मं रूप्यं तथा ताम्रं सर्वरत्नानि चाप्यथ ॥ १७<br>औषधानि च धर्मज्ञ यवाः सिद्धार्थकास्तथा।<br>नृवाह्यमानं यानं च भद्रपीठं तथैव च ॥ १८<br>खड्गं छत्रं पताका च मृदश्चायुधमेव च।<br>राजलिङ्गानि सर्वाणि शवं रुदितवर्जितम् ॥ १९<br>घृतं दधि पयश्चैव फलानि विविधानि च।<br>स्वस्तिकं वर्धमानं च नन्द्यावर्तं सकौस्तुभम् ॥ २०<br>वादित्राणां सुखः शब्दो गम्भीरः सुमनोहरः।<br>गान्धारषड्जऋषभा ये च शास्तास्तथा स्वराः ॥ २१<br>वायुः सशर्करो रूक्षः सर्वत्र समुपस्थितः।<br>प्रतिलोमस्तथा नीचो विज्ञेयो भयकृद् द्विज ॥ २२<br>अनुकूलो मृदुः स्निग्धः सुखस्पर्शः सुखावहः।<br>रूक्षा रूक्षस्वरा भद्राः क्रव्यादाः परिगच्छताम् ॥ २३ | ये तथा इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएँ देखनेमें अशुभ मानी गयी हैं। वाद्योंके भयानक तथा बिना तालके रूखे स्वर भी अशुभ कहे गये हैं। धर्मज्ञ! सामनेसे 'आओ'—ऐसा शब्द कहना शुभ है, किंतु पीछेसे नहीं। इसी तरह पीछेसे 'जाओ' यह कहना शुभ है, किंतु वही आगेसे कहना अशुभ है। 'कहाँ जा रहे हो, रुको, मत जाओ; तुम्हारे वहाँ जानेसे क्या लाभ?'—इस प्रकारके जो दूसरे अनिष्ट शब्द हैं, वे सभी विपत्तिकारक हैं। ध्वजा, पताका आदिपर मांसभक्षी पक्षियोंका बैठना, वाहनोंका फिसलना तथा वस्त्रका अटक जाना निन्दित माना गया है। द्वारसे निकलते समय सिरमें चोट लगना तथा छत्र, ध्वजा और वस्त्रादिका गिरना अशुभकारक है। प्रथम बार अपशकुन दीखनेपर विद्वान् राजाको चाहिये कि वह अशुभविनाशक एवं मधुहन्ता भगवान् केशवकी स्तोत्रोंद्वारा पूजा¹ करे। दूसरी बार पुनः अपशकुन दिखायी पड़नेपर उसे घरमें लौट जाना चाहिये ॥ २—१३ १/२ ॥<br><br>अनघ! अब मैं शुभ-सूचक अभीष्ट शकुनोंका वर्णन कर रहा हूँ। राजन्! श्वेत फूल, भरा हुआ घट, जलजन्तु, पक्षी, मांस, मछलियाँ, गौएँ, घोड़े, हाथी, अकेला बँधा हुआ पशु, बकरा, देवता, मित्र, ब्राह्मण, जलती हुई अग्नि, वेश्या, दूर्वा, गीला गोबर, सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, सभी प्रकारके रत्न, ओषधियाँ, जौ, पीली सरसों, मनुष्योंको ढोता हुआ वाहन, सुन्दर सिंहासन, तलवार, छत्र, पताका, मिट्टी, हथियार, सभी प्रकारके राजचिह्न, रुदनरहित मुर्दा, घी, दही, दूध, विविध प्रकारके फल, स्वस्तिक², वर्धमान³, नन्द्यावर्त⁴, कौस्तुभमणि, वाद्योंके सुखदायक, मनोहर एवं गम्भीर शब्द, गान्धार, षड्ज तथा ऋषभ आदि स्वर शुभदायक माने गये हैं। द्विज! यदि बालूके कणोंसे युक्त रूखी वायु सर्वत्र प्रतिकूल दिशामें पृथ्वीका स्पर्श करके बह रही हो तो उसे भयकारी जानना चाहिये। अनुकूल दिशामें बहनेवाली मृदु, शीतल एवं सुखस्पर्शी वायु सुखदायिनी होती है। निष्ठुर एवं रूखे स्वरमें बोलनेवाले मांसभक्षी जीव यात्रियोंके लिये कल्याणकारक होते हैं। |


१. ऐसे स्तोत्रोंमें विष्णुसहस्रनाम, गजेन्द्रमोक्ष, (महापुरुषविद्या) 'जितं ते पुण्डरीकाक्ष' आदि श्रेष्ठ हैं।
२. ऐसा प्रासाद जिसमें पूर्वकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३४)
३. वह प्रासाद जिसमें दक्षिणकी ओर दरवाजा न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३३)
४. एक प्रकारका मकान, जिसमें पश्चिमकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३२)

९३० * मत्स्यपुराण *

| मेघाः शस्ता घनाः स्निग्धा गजबृंहितनिःस्वनाः।<br>अनुलोमास्तडिच्छस्ताः शक्रचापं तथैव च॥ २४<br>अप्रशस्ते तथा ज्ञेये परिवेषप्रवर्षणे।<br>अनुलोमा ग्रहाः शस्ता वाक्पतिस्तु विशेषतः॥ २५<br>आस्तिक्यं श्रद्दधानत्वं तथा पूज्याभिपूजनम्।<br>शस्तान्येतानि धर्मज्ञ यच्च स्यान्मनसः प्रियम्॥ २६<br>मनसस्तुष्टिरेवात्र परमं जयलक्षणम्।<br>एकतः सर्वलिङ्गानि मनसस्तुष्टिरेकतः॥ २७<br>यानोत्सुकत्वं मनसः प्रहर्षः<br>शुभस्य लाभो विजयप्रवादः।<br>मङ्गल्यलब्धिः श्रवणं च राजन्<br>ज्ञेयानि नित्यं विजयावहानि॥ २८ | हाथियोंकी चिग्घाड़के समान गम्भीर शब्द करनेवाले चिकने घने मेघ शुभदायी होते हैं। पीछेसे चमकनेवाली बिजलीका प्रकाश तथा इन्द्रधनुष प्रशंसनीय हैं। यात्रामें सूर्य एवं चन्द्रमाके मण्डल तथा घनघोर वृष्टिको अशुभ समझना चाहिये। अनुकूल दिशामें उदित हुए ग्रहोंको, विशेषकर बृहस्पतिको शुभसूचक कहा गया है। धर्मज्ञ! (यात्राकालमें) आस्तिकता, श्रद्धा, पूज्योंके प्रति पूज्यभाव और मनकी प्रसन्नता—ये सभी प्रशंसनीय हैं। यात्राकालमें मनका संतोष विजयका परम लक्षण है। तुलनामें एक ओर सभी शुभ शकुन और एक ओर अपने मनकी प्रसन्नताको मानना चाहिये। राजन्! वाहनोंकी उत्सुकता, मनका आनन्दातिरेक, शुभ शकुनोंकी प्राप्ति, विजयसूचक प्रवाद, माङ्गलिक वस्तुओंकी उपलब्धि तथा श्रवण—इन्हें नित्य विजयप्रद जानना चाहिये॥ २४-२८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते मङ्गलाध्यायो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके यात्रा-प्रसंगमें मङ्गलाध्याय नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४३॥


दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय

वामन-प्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें श्रीभगवान्द्वारा अदितिको वरदान

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
राजधर्मस्त्वया सूत कथितो विस्तरेण तु।<br>तथैवाद्भुतमङ्गल्यं स्वप्नदर्शनमेव च॥ १<br>विष्णोरिदानीं माहात्म्यं पुनर्वक्तुमिहार्हसि।<br>कथं स वामनो भूत्वा बबन्ध बलिदानवम्।<br>क्रमतः कीदृशं रूपमासील्लोकत्रये हरेः॥ २सूतजी! आपने विस्तारपूर्वक राजधर्मका वर्णन तो कर दिया, उसी प्रकार अद्भुत शकुन एवं स्वप्नदर्शनका भी निरूपण कर दिया। अब आप पुनः भगवान् विष्णुके माहात्म्यका वर्णन कीजिये। किस प्रकार भगवान्ने वामनस्वरूप धारणकर दानवराज बलिको बाँधा था और नापते समय किस प्रकार भगवान्का वह शरीर बढ़कर तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गया था?॥ १-२॥
सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
एतदेव पुरा पृष्टः कुरुक्षेत्रे तपोधनः।<br>शौनकस्तीर्थयात्रायां वामनायतने पुरा॥ ३<br>यदा समयभेदित्वं द्रौपद्याः पार्थिवं प्रति।<br>अर्जुनेन कृतं तत्र तीर्थयात्रां तदा ययौ॥ ४<br>धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे वामनायतने स्थितः।<br>दृष्ट्वा स वामनं तत्र अर्जुनो वाक्यमब्रवीत्॥ ५मुनिगण! इसी वृत्तान्तको प्राचीनकालमें तीर्थ-यात्राके समय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें अर्जुनने तपस्वी शौनकजीसे पूछा था। जिस समय उन्होंने द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए युधिष्ठिरके नियमोंका उल्लङ्घन किया था, उस समय वे उस पापकी शान्तिके लिये तीर्थयात्रामें गये हुए थे। उस समय धर्ममय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें पहुँचकर वामनभगवान्का दर्शन कर अर्जुनने इस प्रकार प्रश्न किया था॥ ३-५॥
* अध्याय २४४ *९३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अर्जुन उवाच<br>किं निमित्तमयं देवो वामनाकृतिरिज्यते ।<br>वराहरूपी भगवान् कस्मात् पूज्योऽभवत् पुरा।<br>कस्माच्च वामनस्येदमिष्टं क्षेत्रमजायत ॥ ६अर्जुनने पूछा— महर्षे! किस फलकी प्राप्तिके लिये वामनभगवान्‌की पूजा की जाती है? प्राचीनकालमें वराहरूपधारी भगवान् किस कारण पूज्य माने गये और किस निमित्तसे यह क्षेत्र भगवान् वामनको प्रिय हुआ है? ॥ ६ ॥
शौनके उवाच<br>वामनस्य च वक्ष्यामि वराहस्य च धीमतः।<br>त्यक्त्वातिविस्तरं भूयो माहात्म्यं कुरुनन्दन ॥ ७<br>पुरा निर्वासिते शक्रे सुरेषु विजितेषु च।<br>चिन्तयामास देवानां जननी पुनरुद्भवम् ॥ ८<br>अदितिर्देवमाता च परमं दुष्करं तपः।<br>तीव्रं चचार वर्षाणां सहस्रं पृथिवीपते ॥ ९<br>आराधनाय कृष्णस्य वाग्यता वायुभोजना।<br>दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयान् कुरुनन्दन ॥ १०<br>वृथापुत्राहमस्मीति निर्वेदात् प्रणता हरिम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः परमार्थविबोधिनी।<br>देवदेवं हृषीकेशं नत्वा सर्वगतं हरिम् ॥ ११शौनकजी बोले— कुरुनन्दन! मैं भगवान् वामन एवं ज्ञानस्वरूप वराहके माहात्म्यको संक्षेपमें पुनः तुम्हें बतला रहा हूँ। प्राचीनकालमें दानवोंद्वारा देवताओंके पराजित हो जानेपर तथा इन्द्रको निर्वासित कर दिये जानेपर देवमाता अपने पुत्रोंके पुनरुत्थानके लिये चिन्ता करने लगीं। राजन्! देवमाता अदितिने एक हजार वर्षोंतक परम दुष्कर तप किया। उस समय वे मौन होकर वायुका आहार करती हुई श्रीकृष्णकी आराधनामें तत्पर थीं। कुरुनन्दन! वे अपने पुत्रोंको दैत्योंद्वारा तिरस्कृत हुआ देखकर 'मैं निष्फल पुत्रवाली हूँ', इस दुःखसे दुःखी होकर श्रीहरिकी शरणागत हुईं। तत्पश्चात् परमार्थको समझनेवाली अदिति देवाधिदेव, इन्द्रियोंके स्वामी, सर्वव्यापी श्रीहरिको नमस्कार कर अभीष्ट वाणीद्वारा उनकी स्तुति करने लगीं ॥ ७—११॥
अदितिरुवाच<br>नमः सर्वार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने।<br>नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥ १२<br>नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनाभये।<br>श्रियः कान्ताय दान्ताय परमार्थाय चक्रिणे ॥ १३<br>नमः पङ्कजसम्भूतिसम्भवायात्मयोनये।<br>नमः शङ्खासिहस्ताय नमः कनक्रेतसे ॥ १४<br>तथाऽऽत्मज्ञानविज्ञानयोगिचिन्त्यात्मयोगिने ।<br>निर्गुणायाविशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥ १५<br>जगत्प्रतिष्ठितं यत्र जगतां यो न दृश्यते।<br>नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्ङ्गिणे ॥ १६<br>यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः।<br>अपश्यद्भिर्जगत्यत्र स देवो हृदि संस्थितः ॥ १७<br>यस्मिन्नेव विनश्येत यस्यैतदखिलं जगत्।<br>तस्मै समस्तजगतामाधाराय नमो नमः ॥ १८<br>आद्यः प्रजापतिपतिर्यः प्रभूणां पतिः परः।<br>पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ॥ १९अदिति बोलीं— सभीके दुःखोंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। कमल-मालाधारीको प्रणाम है। परम कल्याणके भी कल्याणस्वरूप एवं आदिविधाताको अभिवादन है। आप कमलनेत्र, कमलनाभि, लक्ष्मीपति, दमनकर्ता, परमार्थस्वरूप और चक्रधारी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। ब्रह्माकी उत्पत्तिके स्थानस्वरूप एवं आत्मयोनिको प्रणाम है। आप हाथोंमें शङ्ख और खड्ग धारण करनेवाले एवं स्वर्णरेता हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। आप आत्मज्ञान-विज्ञानके योगियोंद्वारा चिन्तनीय, आत्मयोगी, निर्गुण, अविशेष, ब्रह्मस्वरूप श्रीहरि हैं। आप समस्त जगत्‌में स्थित हैं, परंतु जगत्‌द्वारा देखे नहीं जाते, आप स्थूल और अति सूक्ष्मस्वरूप हैं आप शार्ङ्ग-धनुषधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌को देखते हुए भी मनुष्य जिसे देख नहीं पाते, वह देवता इस जगत्‌में उन्हींके हृदयमें स्थित हैं। यह सारा जगत् उन्हींमें लीन हो जाता है। जिसका यह समस्त जगत् है और जो समस्त जगत्‌के आधार हैं, उन्हें वारंवार प्रणाम है। जो आद्य प्रजापतियोंमें अग्रगण्य, प्रभुओंके भी प्रभु, परात्पर और देवताओंके स्वामी हैं, उन आदिकर्ता कृष्णको
९३२* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
यः प्रवृत्तौ निवृत्तौ च इज्यते कर्मभिः स्वकैः।<br>स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते॥ २०<br><br>यश्चिन्त्यमानो मनसा सद्यः पापं व्यपोहति।<br>नमस्तस्मै विशुद्धाय पराय हरिवेधसे॥ २१<br><br>यं बुद्ध्वा सर्वभूतानि देवदेवेशमव्ययम्।<br>न पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्ति नमामि तम्॥ २२<br><br>यो यज्ञे यज्ञपरमैरिज्यते यज्ञसंज्ञितः।<br>तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम्॥ २३अभिवादन है। जो प्रवृत्ति और निवृत्तिमें अपने कर्मोंद्वारा पूजित होते हैं तथा स्वर्ग और अपवर्गके फलदाता हैं, उन गदाधारीको नमस्कार है। जो मनसे चिन्तन किये जानेपर शीघ्र ही पापको नष्ट कर देते हैं, उन आदिकर्ता परात्पर विशुद्ध हरिको प्रणाम है। समस्त प्राणी जिन अविनाशी देवदेवेश्वरको जानकर पुनः जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते, उन्हें अभिवादन है। जो यज्ञपरायण लोगोंद्वारा यज्ञमें यज्ञनामसे पूजित होते हैं, उन सामर्थ्यशाली परमेश्वर यज्ञपुरुष विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ॥ १२—२३ ॥
गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्र्विदां पतिः।<br>यस्तस्मै वेदवेद्याय विष्णवे जिष्णवे नमः॥ २४<br><br>यतो विश्वं समुत्पन्नं यस्मिंश्च लयमेष्यति।<br>विश्वागमप्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने॥ २५<br><br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं येन विश्वमिदं ततम्।<br>मायाजालं समुत्तर्तुं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ २६<br><br>यस्तु तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः।<br>विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम्॥ २७<br><br>यमाराध्य विशुद्धेन मनसा कर्मणा गिरा।<br>तरन्त्यविद्यामखिलां तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ २८<br><br>विषादतोषरोषाद्यैर्योऽजस्रं सुखदुःखजैः।<br>नृत्यत्यखिलभूतस्थस्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ २९<br><br>मूर्तं तमोऽसुरमयं तद्धधाद् विनिहन्ति यः।<br>रात्रिर्जं सूर्यरूपीव तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ ३०<br><br>कपिलादिस्वरूपस्थो यश्चाज्ञानमयं तमः।<br>हन्ति ज्ञानप्रदानेन तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ ३१<br><br>यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्।<br>पश्यतः कर्म सततमुपेन्द्रं तं नमाम्यहम्॥ ३२<br><br>यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम्।<br>नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाप्ययम्॥ ३३<br><br>यच्च तत्सत्यमुक्तं मे भूयांश्चातो जनार्दनः।<br>सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः॥ ३४विद्वानोंके स्वामी जो भगवान् वेदवेत्ताओंद्वारा सम्पूर्ण वेदोंमें गाये जाते हैं, उन वेदोंद्वारा जाननेयोग्य विजयशील विष्णुको प्रणाम है। जिससे विश्व उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह लीन हो जायगा, उन वेद-मर्यादाके रक्षक महात्मा विष्णुको अभिवादन है। जिसके द्वारा ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त इस विश्वका विस्तार हुआ है, उन उपेन्द्रको मायाजालसे उद्धार पानेके लिये मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जलरूपसे स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वका भरण-पोषण करते हैं, उन विश्वेश्वर प्रजापति विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। विशुद्ध मन, वचन एवं कर्मद्वारा जिनकी आराधना कर मनुष्य सम्पूर्ण अविद्याको पार कर जाते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जो सभी चराचर जीवोंमें विद्यमान रहकर सुख-दुःखसे उत्पन्न हुए दुःख, संतोष और क्रोध आदिके वशीभूत हो निरन्तर नाचते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जो रात्रिजन्य अन्धकारको सूर्यकी तरह असुरमय मूर्तिमान् अन्धकारका विनाश करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं प्रणाम करती हूँ। जो कपिल आदि महर्षियोंके रूपमें स्थित होकर ज्ञानदानद्वारा अज्ञानान्धकारको दूर करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जिनके नेत्रस्वरूप चन्द्रमा और सूर्य समस्त संसारके शुभाशुभ कर्मोंको बराबर देखते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जिन सर्वेश्वरके लिये मैंने इन सभी विशेषणोंको सत्यरूपसे वर्णन किया है, मिथ्या नहीं, उन अजन्मा एवं उत्पत्ति-विनाशके कारणभूत विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। मैंने उनके विषयमें जितनी सत्य बातें कही हैं, जनार्दन उससे भी बढ़कर हैं। इस सत्यके फलस्वरूप मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो जायें॥ २४—३४॥
  • अध्याय २४४ * ९३३
शौनक उवाच<br>एवं स्तुतः स भगवान् वासुदेव उवाच ताम्।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः ॥ ३५<br>श्रीभगवानुवाच<br>मनोरथांस्त्वमदिते यानिच्छस्यभिवाञ्छितान्।<br>तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान्न संशयः ॥ ३६<br>शृणुष्व सुमहाभागे वरो यस्ते हृदि स्थितः।<br>तमाशु व्रियतां कामं श्रेयस्ते सम्भविष्यति।<br>मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति ॥ ३७<br>अदितिरुवाच<br>यदि देव प्रसन्नस्त्वं मद्भक्त्या भक्तवत्सल।<br>त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः ॥ ३८<br>हृतं राज्यं हृताश्चास्य यज्ञभागा महासुरैः।<br>त्वयि प्रसन्ने वरदे तान् प्राप्नोतु सुतो मम ॥ ३९<br>हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव।<br>सापत्नाद् दायनिर्भ्रंशो बाधां नः कुरुते हृदि ॥ ४०<br>श्रीभगवानुवाच<br>कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितः।<br>स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात् ॥ ४१<br>तव गर्भसमुद्भूतस्ततस्ते ये सुरारयः।<br>तानहं निहनिष्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि ॥ ४२<br>अदितिरुवाच<br>प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन।<br>नाहं त्वामुदरे देव वोढुं शक्ष्यामि केशव ॥ ४३<br>यस्मिन् प्रतिष्ठितं विश्वं यो विश्वं स्वयमीश्वरः।<br>तमहं नोदरेण त्वां वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरम् ॥ ४४<br>श्रीभगवानुवाच<br>सत्यमात्थ महाभागे मयि सर्वमिदं जगत्।<br>प्रतिष्ठितं न मां शक्ता वोढुं सेन्द्रा दिवौकसः ॥ ४५<br>किंत्वहं सकलाँल्लोकान् सदेवासुरमानुषान्।<br>जङ्गमान् स्थावरान् सर्वांस्त्वां च देवि सकश्यपाम्।<br>धारयिष्यामि भद्रं ते तदलं सम्भ्रमेण ते ॥ ४६शौनकजीने कहा— इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् वासुदेव, जो समस्त प्राणियोंके लिये अदर्शनीय हैं, अदितिके समक्ष उपस्थित होकर उनसे इस प्रकार बोले ॥ ३५ ॥<br>श्रीभगवान्‌ने कहा— धर्मज्ञा अदिते! तुम जिन अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त करना चाहती हो उन्हें तुम मेरी कृपासे प्राप्त करोगी, इसमें संदेह नहीं है। महाभाग्यशालिनि! सुनो, तुम्हारे हृदयमें जो वरदान स्थित है उसे शीघ्र ही इच्छानुसार माँग लो। तुम्हारा कल्याण होगा; क्योंकि मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होता ॥ ३६-३७ ॥<br>अदिति बोलीं— भक्तवत्सल देव! यदि आप मेरी भक्तिसे प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र इन्द्र पुनः त्रिलोकीका स्वामी हो जाय। महान् असुरोंद्वारा मेरे पुत्रका राज्य छीन लिया गया है तथा उसके यज्ञभागोंपर भी अधिकार कर लिया गया है। अब आप-जैसे वरदानीके प्रसन्न हो जानेपर मेरा पुत्र पुनः उन्हें प्राप्त करे। केशव! मेरे पुत्रका छीना हुआ राज्य मुझे उतना कष्ट नहीं दे रहा है, जितना सौतेले पुत्रोंद्वारा मेरे पुत्रोंका अपने हिस्सेसे भ्रष्ट हो जाना मेरे हृदयमें चुभ रहा है ॥ ३८-४० ॥<br>श्रीभगवान्‌ने कहा— देवि! मैंने तुम्हारे इच्छानुसार तुमपर कृपा की है। मैं अपने अंशसे युक्त कश्यपके सम्पर्कसे तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होऊँगा। इस प्रकार तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होकर मैं देवताओंके उन सभी शत्रुओंका वध करूँगा। नन्दिनि! अब तुम तपसे निवृत्त हो जाओ ॥ ४१-४२ ॥<br>अदिति बोलीं— जगत्कर्ता देवेश्वर! आपको नमस्कार है। आप मुझपर कृपा कीजिये। केशव! मैं आपको गर्भमें धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकती। यह सारा विश्व जिसमें स्थित है तथा जो स्वयं इस विश्वके स्वामी हैं, उन दुर्धर्ष आपको मैं अपने गर्भमें धारण करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ॥ ४३-४४॥<br>श्रीभगवान्‌ने कहा— महाभागे! तुम सच कह रही हो। यह सारा जगत् मुझमें स्थित है, अतः इन्द्रसहित समस्त देवता मेरा भार वहन करनेमें समर्थ नहीं हो सकते, किंतु देवि! मैं देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सभी लोकोंको, सम्पूर्ण चराचरको तथा कश्यपसहित तुमको धारण करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो,

९३४ * मत्स्यपुराण *

न ते ग्लानिर्न ते खेदो गर्भस्थे भविता मयि।<br>दाक्षायणि प्रसादं ते करोम्यन्यैः सुदुर्लभम्॥ ४७<br>गर्भस्थे मयि पुत्राणां तव योऽरिर्भविष्यति।<br>तेजसस्तस्य हानिं च करिष्ये मा व्यथां कृथाः॥ ४८<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्त्वा ततः सद्यो यातोऽन्तर्धानमीश्वरः।<br>सापि कालेन तं गर्भमवाप कुरुसत्तम॥ ४९<br>गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः।<br>चकम्पिरे महाशैलाः क्षोभं जग्मुस्तथाब्धयः॥ ५०<br>यतो यतोऽदितिर्याति ददाति ललितं पदम्।<br>ततस्ततः क्षितिः खेदान्नाम वसुधाधिप॥ ५१<br>दैत्यानामथ सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने।<br>बभूव तेजसां हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना॥ ५२अब तुम्हें विकल नहीं होना चाहिये। तुम्हारे गर्भमें मेरे स्थित होनेपर तुम्हें न तो ग्लानि होगी, न खेद होगा। दाक्षायणि! मैं तुमपर ऐसी कृपा करूँगा जो दूसरोंके लिये परम दुर्लभ है। मेरे गर्भमें स्थित रहनेपर तुम्हारे पुत्रोंका जो शत्रु होगा उसके तेजोबलको मैं विनष्ट कर दूँगा। तुम दुःख मत करो॥ ४५–४८॥<br><br>शौनकजी बोले—कुरुश्रेष्ठ! ऐसा कहकर भगवान् तुरंत अन्तर्हित हो गये। समयानुसार अदिति ने भी उस गर्भको धारण किया। भगवान् विष्णुके गर्भस्थित होनेपर सारी पृथ्वी डगमगाने लगी, बड़े-बड़े पर्वत काँपने लगे तथा समुद्रमें ज्वार-भाटा उठने लगा। वसुधाधिप! अदिति जिधर-जिधर जाती थीं और अपना सुन्दर पद रखती थीं, वहाँ-वहाँ भारके कारण पृथ्वी विनम्र हो जाती थी। भगवान् विष्णुके गर्भस्थ होनेपर सभी दैत्योंके तेज बिलकुल मन्द हो गये, जैसा कि भगवान्ने अदितिसे पहले कहा था॥ ४९–५२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावेऽदितिवरप्रदानं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव-प्रसंगमें अदितिको वरदान नामक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४४॥


दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय

बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्लादका उन्हें शाप, बलिका अनुनय, ब्रह्माजीद्वारा वामनभगवान्‌का स्तवन, भगवान् वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान

शौनक उवाच<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा समस्तानसुरेश्वरः।<br>प्रह्रादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम्॥ १<br><br>बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्या निर्दग्धा इव वह्निना।<br>किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव॥ २<br>अरिष्टं किं नु दैत्यानां किं कृत्या वैरिनिर्मिता।<br>नाशायैषा समुद्भूता यया निस्तेजसोऽसुराः॥ ३शौनकजीने कहा—असुरराज बलिने समस्त दैत्योंको निस्तेज देखकर अपने पितामह प्रह्लादसे प्रश्न किया॥ १॥<br><br>बलिने पूछा—तात! क्या बात है कि आज सहसा ये दैत्यगण अग्निसे जले हुएके समान निस्तेज और ब्रह्मदण्डसे मारे हुएकी भाँति निर्बल दिखायी पड़ने लगे हैं? क्या दैत्योंके ऊपर कोई अरिष्ट आ गया है? या वैरियाेंद्वारा निर्मित कोई कृत्या इनका विनाश करनेके लिये प्रकट हुई है, जिससे ये असुर तेजोहीन हो गये हैं?॥ २-३॥
  • अध्याय २४५ * | ९३५ ---|---

| शौनक उवाच | **शौनकजीने कहा—**राजन्! इस प्रकार अपने | | इति दैत्यपतिर्धीरः पृष्टः पौत्रेण पार्थिव।<br>चिरं ध्यात्वा जगादैनमसुरेन्द्रं बलिं तदा॥ ४ | पौत्र बलिद्वारा पूछे जानेपर धैर्यशाली दैत्यपति प्रह्लादने बहुत देरतक ध्यानकर उस असुरनायक बलिसे कहा॥ ४॥ | | प्रह्लाद उवाच | **प्रह्लाद बोले—**दानवराज बलि! इस समय पर्वत | | चलन्ति गिरयो भूमिर्जहाति सहजां धृतिम्।<br>सर्वे समुद्राः क्षुभिता दैत्या निस्तेजसः कृताः॥ ५ | काँप उठे हैं, पृथ्वीने अपनी स्वाभाविक धीरता छोड़ दी है, सभी समुद्र विक्षुब्ध हो उठे हैं और दैत्यगण तेजोहीन कर दिये गये हैं। ग्रहगण सूर्योदय होनेपर जिस | | सूर्योदये यथा पूर्वं तथा गच्छन्ति न ग्रहाः।<br>देवानां च परा लक्ष्मीः कारणैरनुमीयते॥ ६ | प्रकार पहले सूर्यका अनुगमन करते थे वैसा अब नहीं कर रहे हैं। कुछ कारणोंसे ऐसा अनुमान होता है कि देवताओंकी विशेष अभ्युन्नति होनेवाली है। महाबाहो! | | महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर।<br>न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्यं सुरार्दन॥ ७ | इसका कोई महान् कारण है। सुरार्दन! तुम्हें इस कार्यको तुच्छ नहीं मानना चाहिये॥ ५—७॥ | | शौनक उवाच | **शौनकजीने कहा—**परम भक्त असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद | | इत्युक्त्वा दानवपतिं प्रह्लादः सोऽसुरोत्तमः।<br>अत्यन्तभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम्॥ ८ | दानवराज बलिसे ऐसा कहकर मन-ही-मन देवेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये। तत्पश्चात् प्रह्लाद परम मनोहर ध्यानयोगका | | स ध्यानयोगं कृत्वाथ प्रह्लादः सुमनोहरम्।<br>विचारयामास ततो यतो देवो जनार्दनः॥ ९ | आश्रय लेकर देवाधिदेव जनार्दनका ध्यान करने लगे। तब उन्होंने अदितिके उदरमें वामनरूपमें उन | | स ददर्शोदरेऽदित्याः प्रह्लादो वामनाकृतिम्।<br>अन्तःस्थान् बिभ्रतं सप्त लोकानादिप्रजापतिम्॥ १० | आदिप्रजापतिको देखा जिनके भीतर सातों लोक विराजमान थे। उस समय प्रह्लादने भगवान्‌के भीतर वसु, रुद्र, | | तदन्तःस्थान् वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।<br>साध्यान् विश्वांस्तथादित्यान् गन्धर्वोरगराक्षसान्॥ ११ | अश्विनीकुमार, मरुद्गण, साध्यगण, विश्वेदेव, आदित्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, अपना पुत्र विरोचन, असुरराज बलि, | | विरोचनं स्वतनयं बलिं चासुरनायकम्।<br>जम्भं कुजम्भं नरकं बाणमन्यांस्तथासुरान्॥ १२ | जम्भ, कुजम्भ, नरक, बाण तथा अन्य असुरगण, स्वयं अपने-आप, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, समुद्र, | | आत्मानमुर्वीं गगनं वायुमम्भो हुताशनम्।<br>समुद्रान् वै द्रुमसरित्सरांसि च पशून् मृगान्॥ १३ | वृक्ष, नदियाँ, सरोवर, पशु, मृग, पक्षी, मनुष्य, सर्पादि जीव, सभी लोकोंके सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, शिव, ग्रह, | | वयोमनुष्यानखिलंस्तथैव च सरीसृपान्।<br>समस्तलोकस्रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च।<br>ग्रहनक्षत्रनागांश्च दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन्॥ १४ | नक्षत्र, नाग तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा। यह देखकर प्रह्लाद आश्चर्यचकित हो गये। पुनः क्षणभर बाद स्वस्थ होनेपर उन्होंने विरोचन-पुत्र असुरराज बलिसे इस प्रकार कहा॥ ८—१५॥ | | स पश्यन् विस्मयाविष्टः प्रकृतिस्थः क्षणात् पुनः।<br>प्रह्लादः प्राह दैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं तदा॥ १५ | | | प्रह्लाद उवाच | **प्रह्लाद बोले—**वत्स! जिस कारण तुम राक्षसोंके | | वत्स ज्ञातं मया सर्वं यदर्थं भवतामियम्।<br>तेजसो हानिरुत्पन्ना तच्छृणु त्वमशेषतः॥ १६ | तेजकी यह हानि उत्पन्न हुई है उस सारे रहस्यको मैं जान गया। उसे तुम पूर्णरूपसे सुनो। जो | | देवदेवो जगद्योनिरयोनिजंगदादिकृत्।<br>अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः॥ १७ | देवाधिदेव, जगत्के उत्पत्तिस्थान, अजन्मा, जगत्के आदिकर्ता, अनादि, विश्वके आदि, सर्वश्रेष्ठ, वरदायक, |

९३६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
परावराणां परमः परः परवतामपि।<br>प्रमाणं च प्रमाणानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः॥ १८<br>प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा-<br>मनादिमध्यो भगवाननन्तः ।<br>त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेष<br>कर्तुं महात्मादितिजोऽवतीर्णः॥ १९<br>न यस्य रुद्रो न च पद्मयोनि-<br>र्नैन्द्रो न सूर्येन्दुमरीचिमुख्याः।<br>जानन्ति दैत्याधिप यत्स्वरूपं<br>स वासुदेवः कलयावतीर्णः॥ २०<br>योऽसौ कलांशेन नृसिंहरूपी<br>जघान पूर्वं पितरं ममेशः।<br>यः सर्वयोगीशमनोनिवासः<br>स वासुदेवः कलयावतीर्णः॥ २१<br>यमक्षरं वेदविदो विदित्वा<br>विशन्ति यज्ज्ञानविधूतपापाः।<br>यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवन्ति<br>तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम्॥ २२पापनाशक, परावरोंमें उत्तम, परात्पर, प्रमाणोंके प्रमाण, सातों लोकोंके गुरुके गुरु, प्रभुके प्रभु, पर-से-परे, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न हैं, वे भगवान् अपने अंशसे त्रिलोकीको सनाथ करनेके लिये अदितिके गर्भसे अवतीर्ण हो रहे हैं। दैत्यपते! जिनके स्वरूपको रुद्र, पद्मयोनि ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, मरीचि प्रभृति महर्षिगण नहीं जानते, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे उत्पन्न हो रहे हैं। जिन भगवान्ने पूर्वकालमें अपनी एक कलाद्वारा नृसिंहरूपमें अवतीर्ण होकर मेरे पिता (हिरण्यकशिपु)-का वध किया था तथा जो सभी योगिराजोंके मनमें निवास करनेवाले हैं, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे अवतीर्ण हो रहे हैं। जिनके ज्ञानसे पापमुक्त हुए वेदवेत्ता जिन अव्यय भगवान्को जानकर उनमें प्रवेश करते हैं तथा जिनमें प्रवेश कर पुनः जन्म नहीं धारण करते, उन भगवान् वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ॥ १६—२२॥
भूतान्यशेषाणि यतो भवन्ति<br>यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्रम्।<br>लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयान्ति<br>तं वासुदेवं प्रणमाम्यचिन्त्यम्॥ २३समस्त प्राणी समुद्रसे लहरोंकी भाँति जिनसे निरन्तर उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः जिनमें लय हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।
न यस्य रूपं न बलप्रभावौ<br>न यस्य भावः परमस्य पुंसः।<br>विज्ञायते शर्वपितामहाद्यै-<br>स्तं वासुदेवं प्रणमाम्यजस्रम्॥ २४जिन परम पुरुषके स्वरूप, बल, प्रभाव और भावको शिव तथा ब्रह्मा आदि देवगण भी नहीं समझ पाते, उन भगवान् वासुदेवको मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ।
रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्वगिष्टा<br>स्पर्शे ग्रहीत्री रसना रसस्य।<br>श्रोत्रं च शब्दग्रहणे नराणां<br>घ्राणं च गन्धग्रहणे नियुक्तम्॥ २५<br>येनैकदंष्ट्राग्रसमुद्धृतेयं<br>धराचलान् धारयतीह सर्वान्।<br>यस्मिंश्च शेते सकलं जगच्च<br>तमीशमाद्यं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्॥ २६जिन भगवान् वासुदेवने मनुष्योंको स्वरूप देखनेके लिये नेत्र, स्पर्शके लिये चमड़ा, रसास्वादनके लिये जिह्वा, शब्द सुननेके लिये कान तथा सुगन्ध ग्रहण करनेके लिये नासिका दी है, जिन्होंने अपने एक दाँतके अग्रभागपर इस पृथ्वीको, जो सभी पर्वतोंको धारण करती है, धारण किया है, तथा जिनमें यह समस्त जगत् शयन करता है, उन आदिभूत भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ।
* अध्याय २४५ *९३७

| न घ्राणचक्षुःश्रवणादिभिर्यः<br>सर्वेश्वरो वेदितुमक्षयात्मा।<br>शक्यस्तमीड्यं मनसैव देवं<br>ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारम्॥ २७<br>अंशावतीर्णेन च येन गर्भे<br>हतानि तेजांसि महासुराणाम्।<br>नमामि तं देवमनन्तमीश-<br>मशेषसंसारतरोः कुठारम्॥ २८<br>देवो जगद्योनिरयं महात्मा<br>स षोडशांशेन महासुरेन्द्र।<br>स देवमातुर्जठरं प्रविष्टो<br>हतानि वस्तेन बलाद् वपूंषि॥ २९ | जो अक्षयात्मा सर्वेश्वर नासिका, नेत्र और कान आदि इन्द्रियोंद्वारा जाने नहीं जा सकते, जिन्हें केवल मनद्वारा ग्रहण किया जा सकता है उन पूज्य परमेश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने गर्भमें अपने अंशमात्रसे अवतीर्ण होकर बड़े-बड़े दैत्योंके तेजोंका हरण कर लिया है, जो समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप हैं उन अनन्त परमात्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। महासुरेन्द्र! जो ये महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं जगत्के उत्पत्तिस्थान भगवान् विष्णु हैं, ये अपने सोलह अंशोंसे माता अदितिके उदरमें प्रविष्ट हुए हैं, उन्होंने ही बलपूर्वक तुमलोगोंके शरीरको निस्तेज कर दिया है॥ २३—२९॥ | | बलिरुवाच<br>तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्।<br>सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः॥ ३०<br>विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरायःशङ्कुस्तथैव च।<br>अयःशिराश्चाश्वशिरा भङ्गकारी महाहनुः॥ ३१<br>प्रतापः प्रघसः शुम्भः कुकुरश्च सुदुर्जयः।<br>एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा॥ ३२<br>महाबला महावीर्या भूभारोद्धरणक्षमाः।<br>एषामेकैकशः कृष्णो न वीर्यार्धेन सम्मितः॥ ३३ | **बलिने कहा—**तात! यह हरि कौन है जिससे हम लोगोंको भय प्राप्त हो गया है? मेरे पास तो उस वासुदेवसे भी अधिक बलवान् सैकड़ों दैत्य हैं। विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कु, अयःशङ्कु, अयःशिरा, अश्वशिरा, भङ्गकारी, महाहनु, प्रताप, प्रघस, शुम्भ, अत्यन्त कठिनाईसे जीतने योग्य कुकुर—ये तथा इनके अतिरिक्त और भी दैत्य एवं दानव मेरे अधिकारमें हैं। ये सभी महाबली, महान् पराक्रमी तथा पृथ्वीके भारको उठानेमें समर्थ हैं। इनमेंसे एक-एकके आधे पराक्रमसे भी कृष्णकी कोई समानता नहीं है॥ ३०—३३॥ | | शौनक उवाच<br>पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादो दैत्यपुंगवः।<br>धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्॥ ३४ | **शौनकजी बोले—**दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद अपने पौत्रकी यह बात सुनकर भगवान्‌की निन्दा करनेवाले उस बलिको धिक्कारते हुए बोले॥ ३४॥ | | प्रह्लाद उवाच<br>विनाशमुपयास्यन्ति मन्ये दैतेयदानवाः।<br>येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिरविवेकवान्॥ ३५<br>देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्।<br>त्वामृते पापसंकल्पः कोऽन्य एवं वदिष्यति॥ ३६<br>य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः।<br>सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरानन्तभूमयः॥ ३७<br>त्वं चाहं च जगच्चेदं साद्रिद्रुमनदीनदम्।<br>समुद्रद्वीपलोकाश्च न समं केशवस्य हि॥ ३८ | **प्रह्लादने कहा—**मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जिनका तुम-जैसा अविवेकी एवं दुर्बुद्धि राजा है, उन दैत्यों और दानवोंका विनाश हो जायगा। तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन ऐसा पापी होगा जो देवाधिदेव, महाभाग, अजन्मा एवं सर्वव्यापी वासुदेवको ऐसा कहेगा? तुमने जिनका नाम गिनाया है ये सभी दैत्य-दानव, ब्रह्मसहित देवगण, चराचर जगत्, तुम, मैं, पर्वत, वृक्ष, नदी और नदोंसहित यह संसार, समुद्र, द्वीप और लोक—ये सभी भगवान् केशवकी समानता नहीं कर सकते। |

९३८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यस्यातिवन्द्यवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः।<br>एकांशेन जगत् सर्वं कस्तमेवं प्रवक्ष्यति॥ ३९<br><br>ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम्।<br>कुबुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम्॥ ४०<br><br>शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तव पिताधमः।<br>यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवस्य निन्दकः॥ ४१<br><br>तिष्ठत्वेषा हि संसारसम्भृताघविनाशिनी।<br>कृष्णे भक्तिरहं तावदवेक्ष्यो भवता न किम्॥ ४२जिन सर्वव्यापी एवं वन्दनीयोंके भी वन्दनीय परमात्माके एक अंशसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, उन्हें अकेले तुम-जैसे अविवेकी, विनाशोन्मुख, कुबुद्धि, अजितात्मा, वृद्धोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवालेके सिवा दूसरा कौन ऐसा कहेगा ? अब तो शोचनीय मैं हुआ, जिसके घरमें तुम्हारा नीच पिता उत्पन्न हुआ, जिसके तुम इस प्रकार देवाधिदेव विष्णुकी निन्दा करनेवाले पुत्र हुए। संसारमें जन्म लेकर उपार्जित किये गये पापोंको नष्ट करनेवाली भगवान् कृष्णके चरणोंमें हमारी भक्ति अक्षुण्ण बनी रहे, भले ही मैं तुम्हारे द्वारा अपमानित क्यों न होऊँ ? ॥ ३५-४२ ॥
न मे प्रियतमः कृष्णादपि देहो महात्मनः।<br>इति जानात्ययं लोको न भवान् दितिजाधम॥ ४३<br><br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम॥ ४४<br><br>विरोचनस्तव गुरुर्गुरुस्तस्याप्यहं बले।<br>ममापि सर्वजगतां गुरोर्नारायणो गुरुः॥ ४५<br><br>निन्दां करोषि यस्तस्मिन् कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौ।<br>यस्मात्तस्मादिहैश्वर्यादचिराद् भ्रंशमेष्यसि॥ ४६<br><br>मम देवो जगन्नाथो बले तावज्जनार्दनः।<br>भवत्वहमुपेक्ष्यस्ते प्रीतिमानस्तु मे गुरुः॥ ४७<br><br>एतावन्मात्रमप्येवं निन्दितस्त्रिजगद्गुरुः।<br>नावेक्षितं त्वया यस्मात् तस्माच्छापं ददामि ते॥ ४८<br><br>यथा मे शिरसश्छेदादिदं गुरुतरं वचः।<br>त्वयोक्तमच्युताक्षेपि राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ४९<br><br>यथा च कृष्णान्न परं परित्राणं भवार्णवे।<br>तथाचिरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ५०दैत्याधम! भगवान् (विष्णु)-से बढ़कर मुझे अपना शरीर भी प्रिय नहीं है, इसे यह संसार जानता है, किंतु तुम्हें विदित नहीं है। मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भगवान् विष्णुको जानते हुए भी तुम मेरे गौरवकी रक्षा न करते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु विरोचन है और मैं उसका भी गुरु हूँ तथा मेरे एवं समस्त संसारके गुरुके भी गुरु नारायण हैं। चूँकि तुम उन गुरुओंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इसलिये इस लोकमें शीघ्र ही ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! जगदीश्वर जनार्दन मेरे देवता हैं। वे मेरे गुरु मुझपर प्रसन्न रहें, भले ही मैं तुम्हारे द्वारा उपेक्षित हो जाऊँ। (मुझे इसकी परवा नहीं है।) चूँकि तुमने बिना विचारे त्रिलोकीके गुरु भगवान्‌की जो इस प्रकार इतनी निन्दा की है, इसीलिये मैं तुम्हें शाप दे रहा हूँ। जिस प्रकार तुमने मेरा सिर काट लेनेसे भी बढ़कर यह भगवान् अच्युतकी निन्दा करनेवाला वचन कहा है, उसी प्रकार तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर (अवनतिके गर्तमें) गिर जाओ। जिस प्रकार इस संसारसागरमें विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई शरणदाता नहीं है, (मेरी यह बात सत्य है तो) मैं शीघ्र ही तुम्हें राज्यसे च्युत हुआ देखूँ ॥ ४३-५० ॥
शौनक उवाचशौनकजी बोले—
इति दैत्यपतिः श्रुत्वा गुरोर्वचनमप्रियम्।<br>प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ ५१दैत्यराज बलिने अपने पितामह प्रह्लादकी ऐसी अप्रिय बात सुनकर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर सभी प्रकारसे प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ ५१ ॥
* अध्याय २४५ *९३९

| बलिरुवाच | बलिने कहा— तात! प्रसन्न हो जाइये। अज्ञानसे मारे हुए मुझपर क्रोध मत कीजिये। मैंने बलके गर्वसे उन्मत्त होकर ऐसी बात कह दी है। दैत्यश्रेष्ठ! मेरा सारा ज्ञान मोहसे नष्ट हो गया है, मैं पापी और दुराचारी हूँ। अतः आपने जो मुझे यह शाप दिया है, वह अच्छा ही किया है। तात! मैं राज्यसे च्युत और सम्पत्तिसे रहित हो जाऊँगा—इससे मैं उतना दुःखी नहीं हूँ जितना आपके साथ अविनयपूर्ण व्यवहार करनेसे मुझे कष्ट हो रहा है। त्रिलोकीका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य कोई भी वस्तु अत्यन्त दुर्लभ नहीं है, परंतु आपके समान जो गुरुजन हैं, वे विश्वमें अवश्य दुर्लभ हैं। इसलिये दैत्योंके पालक! आप प्रसन्न हो जाइये, मुझपर क्रोध न कीजिये। तात! मैं आपकी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे दुःखी हो रहा हूँ, शापसे नहीं॥ ५२-५६॥ | | प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि।<br>बलावलेपमत्तेन मयैतद् वाक्यमीरितम्॥ ५२<br>मोहोपहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम।<br>यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम्॥ ५३<br>राज्यभ्रंशं वसुभ्रंशं सम्प्राप्स्यामीति न त्वहम्।<br>विषण्णोऽस्मि यथा तात तवैवाविनये कृते॥ ५४<br>त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नाति दुर्लभम्।<br>संसारे दुर्लभास्ते तु गुरवो ये भवद्विधाः॥ ५५<br>तत् प्रसीद न मे कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप।<br>त्वत्कोपदृष्ट्या ताताहं परितप्ये न शापतः॥ ५६ | | | प्रह्लाद उवाच | प्रह्लाद बोले— वत्स! कोपके कारण मुझे मोह उत्पन्न हो गया, जिससे अभिभूत होकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया; क्योंकि मोहने मेरे विवेकको नष्ट कर दिया था। महासुर! यदि मोहके द्वारा मेरा ज्ञान नष्ट न हुआ होता तो भगवान् विष्णुको सर्वव्यापी जानता हुआ मैं शाप क्यों देता? असुरश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें जो यह शाप दिया है, यह तुम्हारे लिये अवश्य घटित होगा, अतः तुम विषाद मत करो। आजसे जो देवेश्वर, कभी च्युत न होनेवाले और शास्ता हैं, उन भगवान् श्रीहरिके प्रति तुम भक्तिमान् हो जाओ। वे ही तुम्हारे रक्षक होंगे। वीर! इस शापके घटित होनेपर तुम मेरा स्मरण करना। तुम जैसे स्मरण करोगे वैसे ही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि जिससे तुम कल्याणके भागी होओगे। दैत्यराज बलिसे ऐसा कहकर महामतिमान् प्रह्लाद चुप हो गये। उधर भगवान् गोविन्द वामनरूपमें प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी उन जगन्नाथके अवतरित होनेपर देवगण तथा देवमाता अदिति दुःखसे विमुक्त हो गयीं। उस समय सुख-स्पर्शी वायु बहने लगी, आकाश निर्मल हो गया और सभी प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें संलग्न हो गयी। तभीसे राजाओं और राक्षसोंके तथा पृथ्वी, आकाश और स्वर्गमें निवास करनेवाले सभी जीवोंके मनोंमें उद्वेग नहीं हुआ। राजन्! भगवान्‌के उत्पन्न होते ही लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने उनका जातकर्म आदि संस्कार किया। तत्पश्चात् उन देवदेवेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन कर वे ऋषियोंके सुनते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥ ५७–६६॥ | | वत्स कोपेन मोहो मे जनितस्तेन ते मया।<br>शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम॥ ५७<br>यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर।<br>तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं किंचिच्छपाम्यहम्॥ ५८<br>योऽयं शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुङ्गव।<br>भाव्यमेतेन नूनं ते तस्मान्मा त्वं विषीद वै॥ ५९<br>अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ।<br>भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति॥ ६०<br>शापं प्राप्याथ मां वीर संस्मरेथाः स्मृतस्त्वया।<br>यथा तथा यतिष्येऽहं श्रेयसा योज्यसे यथा॥ ६१<br>एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्रं विरराम महामतिः।<br>अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः॥ ६२<br>अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वार्मरेश्वरे।<br>देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमातादितिस्तथा॥ ६३<br>ववुर्वाताः सुखस्पर्शा विरजस्कमभून्नभः।<br>धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत॥ ६४<br>नोद्वेगश्चाप्यभूत् तत्र मनुजेन्द्रासुरेष्वपि।<br>तदादि सर्वभूतानां भूम्यम्बरदिवौकसाम्॥ ६५<br>तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>जातकर्मादिकं कृत्वा कृष्णं दृष्ट्वा च पार्थिव।<br>तुष्टाव देवदेवेशमृषीणां चैव शृण्वताम्॥ ६६ | |

९४० * मत्स्यपुराण *

ब्रह्मोवाचब्रह्मा बोले—
जयाद्येश जयाजेय जय सर्वात्मकात्मक।<br>जय जन्मजरापेत जयानन्त जयाच्युत॥ ६७<br><br>जयाजित जयामेय जयाव्यक्तस्थिते जय।<br>परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयात्मनिःसृत॥ ६८<br><br>जयाशेषजगत्साक्षिञ्जगत्कर्तर्जगद्गुरो ।<br>जगतोऽप्यन्तकृद् देव स्थिति पालयितुं जय॥ ६९<br><br>जय शेष जयाशेष जयाखिलहृदिस्थित।<br>जयादिमध्यान्त जय सर्वज्ञाननिधे जय॥ ७०<br><br>मुमुक्षुभिरनिर्देश्य स्वयंदृष्ट जयेश्वर।<br>योगिनां मुक्तिफलद दमादिगुणभूषण॥ ७१<br><br>जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय।<br>जय स्थूलातिसूक्ष्म त्वं जयातीन्द्रिय सेन्द्रिय॥ ७२<br><br>जय स्वमायायोगस्थ शेषभोगशयाक्षर।<br>जयैकदंष्ट्राप्रान्ताग्रसमुद्धृतवसुंधर ॥ ७३आदि परमेश्वर! आपकी जय हो। अजेय! आपकी जय हो। सर्वात्मस्वरूप! आपकी जय हो। आप जन्म एवं वृद्धतासे विमुक्त, अन्तरहित तथा कभी च्युत होनेवाले नहीं हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप अजित, अमेय और अव्यक्त स्थितिवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप परमार्थके प्रयोजनस्वरूप, सर्वज्ञ, ज्ञानद्वारा जानने योग्य और अपनी महिमासे प्रकट होनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, जगत्के कर्ता और जगत्के गुरु हैं, आपकी जय हो। देव! आप जगत्की स्थिति, पालन और अन्त करनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप शेषरूप, अशेषरूप तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप जगत्के आदि, मध्य और अन्त हैं, आपकी जय हो। सर्वज्ञाननिधे! आपकी जय हो। आप मोक्षार्थीजनद्वारा अज्ञात, स्वयंदृष्ट, ईश्वर, योगियोंको मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले और दम आदि गुणोंसे विभूषित हैं, आपकी जय हो। आप अत्यन्त सूक्ष्म, दुर्ज्ञेय, स्थूल, जगन्मय, इन्द्रियवान् और अतीन्द्रिय हैं, आपकी बारंबार जय हो। आप अपनी योगमायामें स्थित रहनेवाले, शेषनागके फणपर शयन करनेवाले और अव्यय हैं, आपकी जय हो। आप एक दाँतके अग्रभागपर वसुंधराको उठाकर रख लेनेवाले (आदिवराह) हैं, आपकी जय हो॥ ६७—७३ ॥
नृकेसरिन् जयारातिवक्षःस्थलविदारण।<br>साम्प्रतं जय विश्वात्मन् जय वामन केशव॥ ७४<br><br>निजमायापटच्छन्न जगन्मूर्ते जनार्दन।<br>जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो॥ ७५<br><br>वर्धस्व वर्धिताशेषविकारप्रकृते हरे।<br>त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः॥ ७६<br><br>न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे।<br>न ज्ञातुमीशा मुनयः सनकाद्या न योगिनः॥ ७७<br><br>त्वन्मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते।<br>कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः॥ ७८<br><br>त्वमेवाराधितो येन प्रसादसुमुख प्रभो।<br>स एव केवलो देव वेत्ति त्वां नेतरे जनाः॥ ७९<br><br>नन्दीश्वरेश्वरेशान प्रभो वर्धस्व वामन।<br>प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन॥ ८०शत्रुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंह! आपकी जय हो। विश्वात्मन्! इस समय आप वामनरूपमें प्रकट हैं, आपकी जय हो। केशव! आपकी जय हो। जगन्मूर्ति जनार्दन! आप अपनी मायाके आवरणसे छिपे रहते हैं, आपकी जय हो। प्रभो! आप अचिन्त्य, अनेक स्वरूप धारण करनेवाले और एकरूप हैं, आपकी जय हो। हरे! आप सम्पूर्ण प्रकृतिके विकारोंसे युक्त हैं, आपकी वृद्धि हो। आप परमेश्वरमें जगत्की यह धर्ममर्यादा स्थित है। हरे! न मैं, न शंकर, न इन्द्रादि देवगण, न सनकादि मुनिगण और न योगीजन ही आपको जाननेमें समर्थ हैं। जगदीश्वर सर्वेश! इस जगत्में आपकी मायारूपी वस्त्रसे लिपटा हुआ कौन मनुष्य आपकी कृपाके बिना आपको जान सकता है। प्रसन्नतासे सुन्दर मुखवाले देव! जिसने आपकी आराधना की है, केवल वही आपको जानता है, अन्य लोग नहीं। विश्वात्मन्! आप बड़े-बड़े नेत्रोंसे सुशोभित एवं नन्दीश्वरके स्वामी शंकररूप हैं। सामर्थ्यशाली वामन! आप इस विश्वकी उन्नतिके लिये वृद्धिको प्राप्त हों॥ ७४—८०॥

* अध्याय २४५ * ९४१


शौनक उवाचशौनकजी बोले—
एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः।<br>प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचाब्जसमुद्भवम् ॥ ८१<br>स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च।<br>मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ८२<br>भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि प्रतिश्रुतम्।<br>यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ८३<br>सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः।<br>भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः॥ ८४<br>ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्।<br>यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्मै बृहस्पतिः॥ ८५<br>आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं वेदमथाङ्गिराः ॥ ८६<br>अक्षसूत्रं च पुलहः पुलस्त्यः सितवाससी।<br>उपत्तस्थुश्च तं वेदाः प्रणवस्वरभूषणाः ॥ ८७<br>शास्त्राण्यशेषाणि तथा सांख्ययोगोक्तयश्च याः।<br>स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः ॥ ८८<br>सर्वदेवमयो भूप बलेरध्वरमभ्यगात्।<br>यत्र यत्र पदं भूयो भूभागे वामनो ददौ ॥ ८९<br>ददाति भूमिविवरं तत्र तत्रातिपीडिता।<br>स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम्।<br>साब्धिद्वीपवतीं सर्वां चालयामास मेदिनीम् ॥ ९०राजन्! ब्रह्माद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वामनस्वरूपधारी भगवान् हृषीकेशने उस समय हँसकर कमलजन्मा ब्रह्मासे भावोंसे युक्त गम्भीर वाणीमें कहा—'ब्रह्मन्! प्राचीनकालमें इन्द्रादि देवताओंके साथ कश्यपने तथा आपने मेरी स्तुति की थी, उस समय मैंने आपलोगोंसे इन्द्रको त्रिभुवन दिलानेकी प्रतिज्ञा की थी। पुनः अदितिने भी मेरी स्तुति की थी और मैंने उससे भी प्रतिज्ञा की थी कि इन्द्रको कण्टकरहित त्रिलोकीका राज्य समर्पित करूँगा। वही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे सहस्राक्ष इन्द्र पुनः जगत्के अधिपति होंगे, यह मैं आपलोगोंसे सत्य कह रहा हूँ।' तदनन्तर ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्णमृगका चर्म दिया। भगवान् बृहस्पतिने उन्हें यज्ञोपवीत प्रदान किया। ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचिने उन्हें पलाश-दण्ड, वसिष्ठने कमण्डलु, अङ्गिराने कुशासन और वेद, पुलहने अक्षसूत्र तथा पुलस्त्यने दो श्वेत वस्त्र समर्पित किये। फिर प्रणवके स्वरोंसे विभूषित वेद, सम्पूर्ण शास्त्र और सांख्ययोगकी उक्तियाँ उनके निकट उपस्थित हुईं। राजन्! तत्पश्चात् सर्वदेवमय भगवान् वामन जटा, दण्ड, छत्र और कमण्डलु धारण करके बलिके यज्ञकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय भगवान् वामन पृथ्वीतलपर जहाँ-जहाँ अपने चरणोंको रखते थे वहाँ-वहाँ अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण पृथ्वीमें दरारें पड़ जाती थीं। इस प्रकार धीरे-धीरे मंद गतिसे चलते हुए भगवान् वामनने पर्वतों, समुद्रों और द्वीपोंसहित समूची पृथ्वीको चलायमान कर दिया ॥ ८१—९० ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावे वामनोत्पत्तिर्नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामन-प्रादुर्भाव-प्रसंगमें वामन-जन्म नामक दो सौ पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४५ ॥

९४२ | मत्स्यपुराण

दो सौ छियालीसवाँ अध्याय

बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्वारा उन्हें तीन डग पृथ्वीका दान, वामनद्वारा बलिका बन्धन और वर प्रदान

| शौनक उवाच<br>सपर्वतवनामुर्वीं दृष्ट्वा संक्षोभितां बलिः।<br>पप्रच्छोशनसं शुद्धं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ १<br>आचार्य क्षोभमायाता साब्धिभूमूर्द्धना मही।<br>कस्माच्चनासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः॥ २<br>इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः।<br>उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः॥ ३<br>अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः।<br>वामनेनेह रूपेण जगदात्मा सनातनः॥ ४<br>स एष यज्ञमायाति तव दानवपुङ्गव।<br>तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही।<br>कम्पन्ते गिरयश्चामी क्षुभितो मकरालयः॥ ५<br>नैनं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम्।<br>सदेवासुरगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनराः ॥ ६<br>अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः।<br>धारयत्यखिलान् देवो मन्वादींश्च महासुर॥ ७<br>इयमेव जगद्धेतोर्माया कृष्णस्य गह्बरी।<br>धार्यधारकभावेन यया सम्पीड़ितं जगत्॥ ८<br>तत्संनिधानादसुरा भागार्हा नासुरोत्तम।<br>भुञ्जते नासुरान् भागानमी तेनैव चाग्नयः॥ ९ | शौनकजीने कहा— पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वीको क्षुब्ध हुई देख बलिने शुद्धाचारी शुक्राचार्यको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे पूछा—‘आचार्य! किस कारण समुद्र, पर्वत और वनोंसहित पृथ्वी संक्षुब्ध हो उठी है और यज्ञोंमें अग्नियाँ आसुरी भागोंको नहीं ग्रहण कर रही हैं?’ बलिद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् शुक्राचार्य कुछ देरतक ध्यान करके दैत्यराज बलिसे बोले—‘दानवश्रेष्ठ! जगत्के उत्पत्तिस्थान विश्वात्मा अविनाशी श्रीहरि वामनरूपसे कश्यपके गृहमें अवतीर्ण हुए हैं। वही इस समय तुम्हारे यज्ञमें पधार रहे हैं। उन्हींके पैर रखनेसे संक्षुब्ध होकर यह पृथ्वी डगमगा रही है, ये पर्वत काँप रहे हैं और समुद्र क्षुब्ध हो उठा है। देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरोंसे भरी हुई पृथ्वी समस्त जीवोंके स्वामी इन ईश्वरको वहन करनेमें समर्थ नहीं है। महासुर! इन्हीं परमात्माने पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशको धारण कर रखा है तथा ये ही देवेश्वर सम्पूर्ण मनु आदिको धारण करते हैं। जगत्के लिये भगवान् विष्णुकी यही दुर्गम माया है, जिसके द्वारा धार्य-धारकभावसे सारा जगत् पीड़ित हो रहा है। असुरोत्तम! उन्हीं भगवान्के समीपस्थ होनेसे असुरगण यज्ञमें अपने भागोंके अधिकारी नहीं रह गये। यही कारण है कि ये अग्नियाँ असुरोंके भागोंको ग्रहण नहीं कर रही हैं’॥ १–९॥ | | बलिरुवाच<br>धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्।<br>यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान्॥ १०<br>यं योगिनः सदा युक्ताः परमात्मानमव्ययम्।<br>द्रष्टुमिच्छन्ति देवेशं स मेऽध्वरमुपैष्यति॥ ११<br>होता भागप्रदोऽयं च यमुद्गाता च गायति।<br>तमध्वरेश्वरं विष्णुं मत्तः कोऽन्य उपैष्यति॥ १२<br>सर्वेश्वरेश्वरे कृष्णे मदध्वरमुपागते।<br>यन्मया काव्य कर्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि॥ १३ | बलिने कहा— ब्रह्मन्! मैं धन्य और पुण्यात्मा हूँ जो मेरे यज्ञमें साक्षात् भगवान् यज्ञपति उपस्थित हो रहे हैं। अब मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष है? योगाभ्यासमें लगे हुए योगी जिन अविनाशी देवाधिदेव परमात्माको देखनेकी लालसा करते हैं, वे ही भगवान् मेरे यज्ञमें आ रहे हैं। होता जिन्हें यज्ञभाग प्रदान करते हैं और उद्गाता जिनका गान करते हैं, उन यज्ञपति विष्णुके निकट मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन जा सकता है। शुक्राचार्यजी! सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुके मेरे यज्ञमें पधारनेपर मेरा जो कर्तव्य हो, उसका मुझे आदेश दीजिये॥ १०–१३॥ |