मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ९३२ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
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| यः प्रवृत्तौ निवृत्तौ च इज्यते कर्मभिः स्वकैः।<br>स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते॥ २०<br><br>यश्चिन्त्यमानो मनसा सद्यः पापं व्यपोहति।<br>नमस्तस्मै विशुद्धाय पराय हरिवेधसे॥ २१<br><br>यं बुद्ध्वा सर्वभूतानि देवदेवेशमव्ययम्।<br>न पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्ति नमामि तम्॥ २२<br><br>यो यज्ञे यज्ञपरमैरिज्यते यज्ञसंज्ञितः।<br>तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम्॥ २३ | अभिवादन है। जो प्रवृत्ति और निवृत्तिमें अपने कर्मोंद्वारा पूजित होते हैं तथा स्वर्ग और अपवर्गके फलदाता हैं, उन गदाधारीको नमस्कार है। जो मनसे चिन्तन किये जानेपर शीघ्र ही पापको नष्ट कर देते हैं, उन आदिकर्ता परात्पर विशुद्ध हरिको प्रणाम है। समस्त प्राणी जिन अविनाशी देवदेवेश्वरको जानकर पुनः जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते, उन्हें अभिवादन है। जो यज्ञपरायण लोगोंद्वारा यज्ञमें यज्ञनामसे पूजित होते हैं, उन सामर्थ्यशाली परमेश्वर यज्ञपुरुष विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ॥ १२—२३ ॥ |
| गीयते सर्ववेदेषु वेदविद्भिर्र्विदां पतिः।<br>यस्तस्मै वेदवेद्याय विष्णवे जिष्णवे नमः॥ २४<br><br>यतो विश्वं समुत्पन्नं यस्मिंश्च लयमेष्यति।<br>विश्वागमप्रतिष्ठाय नमस्तस्मै महात्मने॥ २५<br><br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं येन विश्वमिदं ततम्।<br>मायाजालं समुत्तर्तुं तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ २६<br><br>यस्तु तोयस्वरूपस्थो बिभर्त्यखिलमीश्वरः।<br>विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम्॥ २७<br><br>यमाराध्य विशुद्धेन मनसा कर्मणा गिरा।<br>तरन्त्यविद्यामखिलां तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ २८<br><br>विषादतोषरोषाद्यैर्योऽजस्रं सुखदुःखजैः।<br>नृत्यत्यखिलभूतस्थस्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ २९<br><br>मूर्तं तमोऽसुरमयं तद्धधाद् विनिहन्ति यः।<br>रात्रिर्जं सूर्यरूपीव तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ ३०<br><br>कपिलादिस्वरूपस्थो यश्चाज्ञानमयं तमः।<br>हन्ति ज्ञानप्रदानेन तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्॥ ३१<br><br>यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्।<br>पश्यतः कर्म सततमुपेन्द्रं तं नमाम्यहम्॥ ३२<br><br>यस्मिन् सर्वेश्वरे सर्वं सत्यमेतन्मयोदितम्।<br>नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाप्ययम्॥ ३३<br><br>यच्च तत्सत्यमुक्तं मे भूयांश्चातो जनार्दनः।<br>सत्येन तेन सकलाः पूर्यन्तां मे मनोरथाः॥ ३४ | विद्वानोंके स्वामी जो भगवान् वेदवेत्ताओंद्वारा सम्पूर्ण वेदोंमें गाये जाते हैं, उन वेदोंद्वारा जाननेयोग्य विजयशील विष्णुको प्रणाम है। जिससे विश्व उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह लीन हो जायगा, उन वेद-मर्यादाके रक्षक महात्मा विष्णुको अभिवादन है। जिसके द्वारा ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त इस विश्वका विस्तार हुआ है, उन उपेन्द्रको मायाजालसे उद्धार पानेके लिये मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जलरूपसे स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वका भरण-पोषण करते हैं, उन विश्वेश्वर प्रजापति विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। विशुद्ध मन, वचन एवं कर्मद्वारा जिनकी आराधना कर मनुष्य सम्पूर्ण अविद्याको पार कर जाते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जो सभी चराचर जीवोंमें विद्यमान रहकर सुख-दुःखसे उत्पन्न हुए दुःख, संतोष और क्रोध आदिके वशीभूत हो निरन्तर नाचते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जो रात्रिजन्य अन्धकारको सूर्यकी तरह असुरमय मूर्तिमान् अन्धकारका विनाश करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं प्रणाम करती हूँ। जो कपिल आदि महर्षियोंके रूपमें स्थित होकर ज्ञानदानद्वारा अज्ञानान्धकारको दूर करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जिनके नेत्रस्वरूप चन्द्रमा और सूर्य समस्त संसारके शुभाशुभ कर्मोंको बराबर देखते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जिन सर्वेश्वरके लिये मैंने इन सभी विशेषणोंको सत्यरूपसे वर्णन किया है, मिथ्या नहीं, उन अजन्मा एवं उत्पत्ति-विनाशके कारणभूत विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। मैंने उनके विषयमें जितनी सत्य बातें कही हैं, जनार्दन उससे भी बढ़कर हैं। इस सत्यके फलस्वरूप मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो जायें॥ २४—३४॥ |