मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २४४ * | ९३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अर्जुन उवाच<br>किं निमित्तमयं देवो वामनाकृतिरिज्यते ।<br>वराहरूपी भगवान् कस्मात् पूज्योऽभवत् पुरा।<br>कस्माच्च वामनस्येदमिष्टं क्षेत्रमजायत ॥ ६ | अर्जुनने पूछा— महर्षे! किस फलकी प्राप्तिके लिये वामनभगवान्की पूजा की जाती है? प्राचीनकालमें वराहरूपधारी भगवान् किस कारण पूज्य माने गये और किस निमित्तसे यह क्षेत्र भगवान् वामनको प्रिय हुआ है? ॥ ६ ॥ |
| शौनके उवाच<br>वामनस्य च वक्ष्यामि वराहस्य च धीमतः।<br>त्यक्त्वातिविस्तरं भूयो माहात्म्यं कुरुनन्दन ॥ ७<br>पुरा निर्वासिते शक्रे सुरेषु विजितेषु च।<br>चिन्तयामास देवानां जननी पुनरुद्भवम् ॥ ८<br>अदितिर्देवमाता च परमं दुष्करं तपः।<br>तीव्रं चचार वर्षाणां सहस्रं पृथिवीपते ॥ ९<br>आराधनाय कृष्णस्य वाग्यता वायुभोजना।<br>दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयान् कुरुनन्दन ॥ १०<br>वृथापुत्राहमस्मीति निर्वेदात् प्रणता हरिम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः परमार्थविबोधिनी।<br>देवदेवं हृषीकेशं नत्वा सर्वगतं हरिम् ॥ ११ | शौनकजी बोले— कुरुनन्दन! मैं भगवान् वामन एवं ज्ञानस्वरूप वराहके माहात्म्यको संक्षेपमें पुनः तुम्हें बतला रहा हूँ। प्राचीनकालमें दानवोंद्वारा देवताओंके पराजित हो जानेपर तथा इन्द्रको निर्वासित कर दिये जानेपर देवमाता अपने पुत्रोंके पुनरुत्थानके लिये चिन्ता करने लगीं। राजन्! देवमाता अदितिने एक हजार वर्षोंतक परम दुष्कर तप किया। उस समय वे मौन होकर वायुका आहार करती हुई श्रीकृष्णकी आराधनामें तत्पर थीं। कुरुनन्दन! वे अपने पुत्रोंको दैत्योंद्वारा तिरस्कृत हुआ देखकर 'मैं निष्फल पुत्रवाली हूँ', इस दुःखसे दुःखी होकर श्रीहरिकी शरणागत हुईं। तत्पश्चात् परमार्थको समझनेवाली अदिति देवाधिदेव, इन्द्रियोंके स्वामी, सर्वव्यापी श्रीहरिको नमस्कार कर अभीष्ट वाणीद्वारा उनकी स्तुति करने लगीं ॥ ७—११॥ |
| अदितिरुवाच<br>नमः सर्वार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने।<br>नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥ १२<br>नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनाभये।<br>श्रियः कान्ताय दान्ताय परमार्थाय चक्रिणे ॥ १३<br>नमः पङ्कजसम्भूतिसम्भवायात्मयोनये।<br>नमः शङ्खासिहस्ताय नमः कनक्रेतसे ॥ १४<br>तथाऽऽत्मज्ञानविज्ञानयोगिचिन्त्यात्मयोगिने ।<br>निर्गुणायाविशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥ १५<br>जगत्प्रतिष्ठितं यत्र जगतां यो न दृश्यते।<br>नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्ङ्गिणे ॥ १६<br>यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः।<br>अपश्यद्भिर्जगत्यत्र स देवो हृदि संस्थितः ॥ १७<br>यस्मिन्नेव विनश्येत यस्यैतदखिलं जगत्।<br>तस्मै समस्तजगतामाधाराय नमो नमः ॥ १८<br>आद्यः प्रजापतिपतिर्यः प्रभूणां पतिः परः।<br>पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ॥ १९ | अदिति बोलीं— सभीके दुःखोंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। कमल-मालाधारीको प्रणाम है। परम कल्याणके भी कल्याणस्वरूप एवं आदिविधाताको अभिवादन है। आप कमलनेत्र, कमलनाभि, लक्ष्मीपति, दमनकर्ता, परमार्थस्वरूप और चक्रधारी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। ब्रह्माकी उत्पत्तिके स्थानस्वरूप एवं आत्मयोनिको प्रणाम है। आप हाथोंमें शङ्ख और खड्ग धारण करनेवाले एवं स्वर्णरेता हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। आप आत्मज्ञान-विज्ञानके योगियोंद्वारा चिन्तनीय, आत्मयोगी, निर्गुण, अविशेष, ब्रह्मस्वरूप श्रीहरि हैं। आप समस्त जगत्में स्थित हैं, परंतु जगत्द्वारा देखे नहीं जाते, आप स्थूल और अति सूक्ष्मस्वरूप हैं आप शार्ङ्ग-धनुषधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्को देखते हुए भी मनुष्य जिसे देख नहीं पाते, वह देवता इस जगत्में उन्हींके हृदयमें स्थित हैं। यह सारा जगत् उन्हींमें लीन हो जाता है। जिसका यह समस्त जगत् है और जो समस्त जगत्के आधार हैं, उन्हें वारंवार प्रणाम है। जो आद्य प्रजापतियोंमें अग्रगण्य, प्रभुओंके भी प्रभु, परात्पर और देवताओंके स्वामी हैं, उन आदिकर्ता कृष्णको |