भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 952

९४२ | मत्स्यपुराण

दो सौ छियालीसवाँ अध्याय

बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्वारा उन्हें तीन डग पृथ्वीका दान, वामनद्वारा बलिका बन्धन और वर प्रदान

| शौनक उवाच<br>सपर्वतवनामुर्वीं दृष्ट्वा संक्षोभितां बलिः।<br>पप्रच्छोशनसं शुद्धं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ १<br>आचार्य क्षोभमायाता साब्धिभूमूर्द्धना मही।<br>कस्माच्चनासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्नयः॥ २<br>इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वरः।<br>उवाच दैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः॥ ३<br>अवतीर्णो जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः।<br>वामनेनेह रूपेण जगदात्मा सनातनः॥ ४<br>स एष यज्ञमायाति तव दानवपुङ्गव।<br>तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही।<br>कम्पन्ते गिरयश्चामी क्षुभितो मकरालयः॥ ५<br>नैनं भूतपतिं भूमिः समर्था वोढुमीश्वरम्।<br>सदेवासुरगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनराः ॥ ६<br>अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पवनो नभः।<br>धारयत्यखिलान् देवो मन्वादींश्च महासुर॥ ७<br>इयमेव जगद्धेतोर्माया कृष्णस्य गह्बरी।<br>धार्यधारकभावेन यया सम्पीड़ितं जगत्॥ ८<br>तत्संनिधानादसुरा भागार्हा नासुरोत्तम।<br>भुञ्जते नासुरान् भागानमी तेनैव चाग्नयः॥ ९ | शौनकजीने कहा— पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वीको क्षुब्ध हुई देख बलिने शुद्धाचारी शुक्राचार्यको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे पूछा—‘आचार्य! किस कारण समुद्र, पर्वत और वनोंसहित पृथ्वी संक्षुब्ध हो उठी है और यज्ञोंमें अग्नियाँ आसुरी भागोंको नहीं ग्रहण कर रही हैं?’ बलिद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् शुक्राचार्य कुछ देरतक ध्यान करके दैत्यराज बलिसे बोले—‘दानवश्रेष्ठ! जगत्के उत्पत्तिस्थान विश्वात्मा अविनाशी श्रीहरि वामनरूपसे कश्यपके गृहमें अवतीर्ण हुए हैं। वही इस समय तुम्हारे यज्ञमें पधार रहे हैं। उन्हींके पैर रखनेसे संक्षुब्ध होकर यह पृथ्वी डगमगा रही है, ये पर्वत काँप रहे हैं और समुद्र क्षुब्ध हो उठा है। देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरोंसे भरी हुई पृथ्वी समस्त जीवोंके स्वामी इन ईश्वरको वहन करनेमें समर्थ नहीं है। महासुर! इन्हीं परमात्माने पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशको धारण कर रखा है तथा ये ही देवेश्वर सम्पूर्ण मनु आदिको धारण करते हैं। जगत्के लिये भगवान् विष्णुकी यही दुर्गम माया है, जिसके द्वारा धार्य-धारकभावसे सारा जगत् पीड़ित हो रहा है। असुरोत्तम! उन्हीं भगवान्के समीपस्थ होनेसे असुरगण यज्ञमें अपने भागोंके अधिकारी नहीं रह गये। यही कारण है कि ये अग्नियाँ असुरोंके भागोंको ग्रहण नहीं कर रही हैं’॥ १–९॥ | | बलिरुवाच<br>धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्।<br>यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान्॥ १०<br>यं योगिनः सदा युक्ताः परमात्मानमव्ययम्।<br>द्रष्टुमिच्छन्ति देवेशं स मेऽध्वरमुपैष्यति॥ ११<br>होता भागप्रदोऽयं च यमुद्गाता च गायति।<br>तमध्वरेश्वरं विष्णुं मत्तः कोऽन्य उपैष्यति॥ १२<br>सर्वेश्वरेश्वरे कृष्णे मदध्वरमुपागते।<br>यन्मया काव्य कर्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि॥ १३ | बलिने कहा— ब्रह्मन्! मैं धन्य और पुण्यात्मा हूँ जो मेरे यज्ञमें साक्षात् भगवान् यज्ञपति उपस्थित हो रहे हैं। अब मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष है? योगाभ्यासमें लगे हुए योगी जिन अविनाशी देवाधिदेव परमात्माको देखनेकी लालसा करते हैं, वे ही भगवान् मेरे यज्ञमें आ रहे हैं। होता जिन्हें यज्ञभाग प्रदान करते हैं और उद्गाता जिनका गान करते हैं, उन यज्ञपति विष्णुके निकट मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन जा सकता है। शुक्राचार्यजी! सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुके मेरे यज्ञमें पधारनेपर मेरा जो कर्तव्य हो, उसका मुझे आदेश दीजिये॥ १०–१३॥ |