मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २४६ * | ९४३ |
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| शुक्र उवाच<br>यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर ।<br>त्वया तु दानवा दैत्या मखभागभुजः कृताः ॥ १४<br>अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् ।<br>विसृष्टेरनु चान्नेन स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः ॥ १५<br>त्वत्कृते भविता नूनं देवो विष्णुः स्थितौ स्थितः ।<br>विद्वित्वैतन्महाभाग कुरु यत्नमनागतम् ॥ १६<br>त्वया हि दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि ।<br>प्रतिज्ञा न हि वोढव्या वाच्यं साम वृथाफलम् ॥ १७<br>नालं दातुमहं देव दैत्य वाच्यं त्वया वचः ।<br>कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १८<br><br>बलिरुवाच<br>ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः ।<br>नास्तीति किमु देवेन संसाराघौघहारिणा ॥ १९<br>व्रतोपवासैर्विविधैः प्रतिसंग्राह्यते हरिः ।<br>स चेद् वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमतोऽधिकम् ॥ २०<br>यदर्थमुपहाराढ्यास्तपःशौचगुणान्वितैः ।<br>यज्ञाः क्रियन्ते देवेशः स मां देहीति वक्ष्यति ॥ २१<br>तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं मम ।<br>यन्मया दत्तमिशेशः स्वयमादास्यते हरिः ॥ २२<br>नास्ति नास्तीत्यहं वक्ष्ये तमप्यागतमीश्वरम् ।<br>यदा वञ्चामि तं प्राप्तं वृथा तज्जन्मनः फलम् ॥ २३<br>यज्ञेऽस्मिन् यदि यज्ञेशो याचते मां जनार्दनः ।<br>निजमूर्द्धानमप्यत्र तद् दास्याम्यविचारितम् ॥ २४<br>नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् ।<br>वक्ष्यामि कथमायाते तदनभ्यस्तमच्युते ॥ २५<br>श्लाघ्य एव हि वीराणां दानादापत्समागमः ।<br>नाबाधकारि यद् दानं तदमङ्गलवत् स्मृतम् ॥ २६<br>मद्राज्ये नासुखी कश्चिन्न दरिद्रो न चातुरः ।<br>नाभूषितो न चोद्विग्नो न स्त्रगादिविवर्जितः ॥ २७<br>हृष्टस्तुष्टः सुगन्धिश्च तृप्तः सर्वसुखान्वितः ।<br>जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी ॥ २८ | शुक्रने कहा— असुर! वेदोंके प्रमाणानुसार देवगण ही यज्ञभागके अधिकारी हैं, किंतु तुमने तो दैत्यों और दानवोंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया है। ये सामर्थ्यशाली भगवान् सत्त्वगुणमें स्थित होकर सृष्टिकी उत्पत्ति और पालन करते हैं तथा प्रलयकालमें प्रजाओंको अपना ग्रास बना लेते हैं। महाभाग! वे भगवान् विष्णु तुम्हारे लिये ही भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं, अतः इसे जानकर भविष्यके लिये उपाय करो। दैत्याधिपते! तुम उन्हें थोड़ी-सी भी वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा न करना, झूठ-मूठ ही नम्रतापूर्वक कुछ वचन कहना। महासुर! देवताओंकी उन्नतिके लिये प्रवृत्त हुए श्रीविष्णुसे तुम्हें ऐसा वचन कहना चाहिये कि 'देव! मैं आपको कुछ भी देनेमें समर्थ नहीं हूँ'॥ १४—१८॥<br><br>बलिने कहा— ब्रह्मन्! साधारण याचकोंके याचना करनेपर मैंने उन्हें कभी नकारात्मक उत्तर नहीं दिया, फिर संसारके पापसमूहोंको दूर करनेवाले परमात्माद्वारा याचना किये जानेपर मैं कैसे कहूँगा कि मेरे पास नहीं है। भला, जो श्रीहरि विविध व्रतों और उपवासोंद्वारा प्राप्त किये जाते हैं, वे गोविन्द यदि ऐसा कहेंगे कि 'दो' तो इससे बढ़कर और क्या बात होगी? जिनकी प्राप्तिके लिये तप और शौच आदि गुणोंसे युक्त याज्ञिक लोग उपहार-सामग्रियोंसे परिपूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे ही देवेश मुझसे 'दो' ऐसी याचना करेंगे। यदि देवाधिदेव श्रीहरि मेरे द्वारा दिये गये दानको स्वयं ग्रहण करेंगे, तब तो मेरे कर्म पुण्यमय हो गये और मेरी तपस्या सफल हो गयी। यदि मैं उन परमेश्वरके आनेपर भी 'नहीं है, नहीं है' ऐसा कहूँ और उन्हें ठगूँ, तब तो मेरे जन्म लेनेका फल ही व्यर्थ है। इसलिये इस यज्ञमें यदि यज्ञेश्वर जनार्दन मुझसे मेरा मस्तक भी माँगेंगे तो मैं उसे बिना हिचकिचाहटके दे डालूँगा। जब मैंने अन्य साधारण याचकोंको 'नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहा, तब भला भगवान् अच्युतके आनेपर वह अनभ्यस्त शब्द कैसे कहूँगा? दान देनेसे आनेवाली विपत्तियाँ वीर पुरुषोंके लिये प्रशंसनीय हैं। जो दान देनेके बाद बाधा नहीं पहुँचाता, वह अमङ्गलके समान कहा गया है। महाभाग! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी दुःखी, दरिद्र, आतुर, भूषारहित, उद्विग्न और माला आदिसे रहित नहीं है, प्रत्युत सभी लोग हृष्ट, संतुष्ट, सुगन्धित द्रव्योंसे विभूषित, तृप्त और सभी सुखोंसे सम्पन्न हैं। फिर मैं सदा सुखी हूँ, इसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ १९—२८॥ |