मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ९४४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एतद्विशिष्टपात्रोऽयं दानबीजफलं मम।<br>विदितं भृगुशार्दूल मयैतत् त्वत्प्रसादतः॥ २९ | भृगुवंशसिंह! मेरे दानरूपी बीजका ही यह फल है, जो मुझे इस प्रकार दान देनेयोग्य विशिष्ट पात्र प्राप्त होगा। यह मुझे आपकी कृपासे ही ज्ञात हुआ है। अतः |
| एतद् विजानतो दानबीजं पतति चेद् गुरो।<br>जनार्दनमहापात्रे किं च प्राप्तं ततो मया॥ ३० | गुरो! यह सब जानते हुए यदि मेरा यह दानबीज जनार्दनरूपी महापात्रमें पड़ जाय तो फिर मुझे क्या नहीं मिला अर्थात् मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। यदि |
| मत्तो दानमवाप्येशो यदि पुष्णाति देवताः।<br>उपभोगाद् दशगुणं दानं श्लाघ्यतमं मम॥ ३१ | परमेश्वर मुझसे दान लेकर देवताओंका पालन-पोषण करते हैं तो उनके उपभोगसे मेरा दान दसगुना प्रशंसनीय हो जायगा। |
| मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।<br>तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्॥ ३२ | इसमें सन्देह नहीं कि यज्ञद्वारा आराधित श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो गये हैं, इसी कारण दर्शन देकर उपकार करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं। यदि |
| अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधिनम्।<br>मां निहन्तुमनाश्रैव वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्॥ ३३ | क्रुद्ध होकर देवभागको रोकनेवाले मुझको मार डालनेके विचारसे आ रहे हैं तो भगवान्के हाथोंसे मेरा वध भी प्रशंसनीय है! |
| तन्मयं सर्वमेवेदं नाप्राप्यं यस्य विद्यते।<br>स मां याचितुमभ्येति नानुग्रहमृते हरिः॥ ३४ | यह सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। जिनके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है, वे ही श्रीहरि यदि मुझसे माँगनेके लिये आ रहे हैं तो यह उनके अनुग्रहके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। |
| यः सृजत्यात्मभूः सर्वं चेतसैव च संहरेत्।<br>स मां हन्तुं हृषीकेशः कथं यत्नं करिष्यति॥ ३५ | जो स्वयम्भू परमात्मा सबकी सृष्टि करते हैं और मनकी कल्पनासे ही उसका विनाश कर देते हैं, वे हृषीकेश भला मुझे मारनेके लिये क्यों यत्न करेंगे? |
| एतद् विदित्वा न गुरो दानविघ्नकरेण च।<br>त्वया भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते॥ ३६ | गुरो! ऐसा जानकर मेरे यज्ञमें जगन्नाथ गोविन्दके उपस्थित होनेपर आपको मेरे दानमें विघ्न नहीं करना चाहिये॥ २९–३६॥ |
| शौनक उवाच<br>इत्येवं वदतस्तस्य सम्प्राप्तः स जगत्पतिः।<br>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक्॥ ३७ | शौनकजी बोले— बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य एवं मायासे वामनरूपधारी जगदीश्वर वहाँ आ पहुँचे। |
| तं दृष्ट्वा यज्ञवाटान्तःप्रविष्टमसुरैः प्रभुम्।<br>जग्मुः सभासदः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः॥ ३८ | यज्ञशालाके भीतर प्रविष्ट हुए उन प्रभुको देखकर सभी सभासद असुरगण क्षुब्ध हो उठे; क्योंकि वामनके तेजसे वे तेजोहीन हो गये थे। |
| जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे।<br>बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः॥ ३९ | उस महान् यज्ञमें आये हुए मुनिगण जप करने लगे। बलिने अपना समस्त जीवन सफल मान लिया। |
| ततः संक्षोभमापन्नो न कश्चित्किंचिदुक्तवान्।<br>प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास चेतसा॥ ४० | इसके बाद सभी संक्षुब्ध थे, अतः किसीने भी किसीसे कुछ भी नहीं कहा। सभीने हृदयसे देवदेवेशकी पूजा की। |
| अथासुरपतिं प्रह्रं दृष्ट्वा मुनिवरांश्च तान्।<br>देवदेवपतिः साक्षी विष्णुर्वामनरूपधृक्॥ ४१ | तत्पश्चात् देवाधिदेव वामनरूपधारी साक्षात् विष्णुने विनीत बलि और उन मुनिवरोंको देखकर |
| तुष्टाव यज्ञवह्निं च यजमानमथर्त्विजः।<br>यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदः॥ ४२ | यज्ञाग्नि, यज्ञकर्माधिकारी सदस्यों और यजमान, पुरोहित, कर्ममें प्रस्तुत द्रव्य-सम्पत्तियोंकी प्रशंसा की। |
| ततः प्रसन्नमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात्।<br>यज्ञवाटस्थितं वीरः साधु साध्वित्युदीरयन्॥ ४३ | तदनन्तर यज्ञशालामें स्थित वामनभगवान्को अत्यन्त प्रसन्न देखकर उसी समय सदस्यगण ‘साधु-साधु’ की ध्वनि करने लगे। |