भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९२८* मत्स्यपुराण *
हस्तिनीवडवानां च गवां च प्रसवो गृहे।<br>आरोहणमथाश्वानां रोदनं च तथा शुभम्॥ ३२<br>वरस्त्रीणां तथा लाभस्तथालिङ्गनमेव च।<br>निगडैर्बन्धनं धन्यं तथा विष्ठानुलेपनम्॥ ३३<br>जीवतां भूमिपालानां सुहृदामपि दर्शनम्।<br>दर्शनं देवतानां च विमलानां तथाम्भसाम्॥ ३४<br>शुभान्यथैतानि नरस्तु दृष्ट्वा<br>प्राप्नोत्ययत्नाद् ध्रुवमर्थलाभम्।<br>स्वप्नानि वै धर्मभृतां वरिष्ठ<br>व्याधेर्विमोक्षं च तथातुरोऽपि॥ ३५घरमें हथिनी, घोड़ी तथा गायोंका बच्चा देना, घोड़ेपर सवार होना तथा रोना—ये स्वप्न शुभदायक होते हैं। सुन्दरी स्त्रियोंकी प्राप्ति तथा उनका आलिङ्गन, जंजीरोंद्वारा बन्धन, मलका लेपन, जीवित राजाओं तथा मित्रोंका दर्शन, देवताओं तथा निर्मल जलका दर्शन—ये स्वप्न शुभ कहे गये हैं। धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ राजन्! मनुष्य इन शुभदायक स्वप्नोंको देखकर बिना प्रयासके ही निश्चितरूपमें धन प्राप्त कर लेता है तथा रोगग्रस्त व्यक्ति भी रोगसे मुक्त हो जाता है॥ २९—३५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते स्वप्नाध्यायोनाम द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राप्रसंगमें स्वप्नविवेक नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४२ ॥


दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय

शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण

मनुरुवाच<br>गमनं प्रति राज्ञां तु सम्मुखादर्शने च किम्।<br>प्रशस्तांश्चैव सम्भाष्य सर्वनेतांश्च कीर्तय॥ १मनुजीने पूछा—भगवन्! राजाओंके लिये यात्राके अवसरपर सम्मुख देखने या न देखने योग्य कौन-कौन-सी वस्तुएँ प्रशस्त मानी गयी हैं, उन सबका वर्णन कीजिये॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>औषधानि त्वयुक्तानि धान्यं कृष्णं च यद् भवेत्।<br>कार्पासश्च तृणं राजञ्छुष्कं गोमयमेव च॥ २<br>इन्धनं च तथाङ्गारं गुडं तैलं तथाशुभम्।<br>अभ्यक्तं मलिनं मुण्डं तथा नग्नं च मानवम्॥ ३<br>मुक्तकेशं रुजार्तं च काषायाम्बरधारिणम्।<br>उन्मत्तकं तथा सत्त्वं दीनं चाथ नपुंसकम्॥ ४<br>अयः पङ्कस्तथा चर्म केशबन्धनमेव च।<br>तथैवोद्धृतसाराणि पिण्याकादीनि यानि च॥ ५<br>चण्डालश्वपचाश्चैव राजबन्धनपालकाः।<br>वधकाः पापकर्माणो गर्भिणी स्त्री तथैव च॥ ६<br>तुषभस्मकपालास्थि भिन्नभाण्डानि यानि च।<br>रिक्तानि चैव भाण्डानि मृतं शार्ङ्गिकमेव च॥ ७मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! अनुपयुक्त ओषधियाँ, काला अन्न, कपास, तृण, सूखा गोबर, ईंधन, अङ्गार, गुड़, तेल—ये सब अशुभ वस्तुएँ हैं। तेल लगाया हुआ, मलिन, मुण्डन कराया हुआ, नंगा, खुले बालोंवाला, रोगपीड़ित, काषाय वस्त्रधारी, पागल, दीन तथा नपुंसक व्यक्ति, लोहा, कीचड़, चमड़ा, केशका बन्धन, खली आदि सभी सारहीन वस्तुएँ, चाण्डाल, श्वपच, बन्धनमें डालनेवाले राजाके कर्मचारी, जल्लाद, पापी, गर्भिणी स्त्री, भूसी, राख, खोपड़ी, हड्डी, टूटे हुए सभी पात्र, खाली पात्र, लाश, सींगोंवाले पशु—