मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २४२ * | ९२७ --- | ---
| कल्कस्नानं तिलैर्होमो ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्॥ १६<br>नागेन्द्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्ननाशनम्।<br>स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवत्सरविपाकिनः॥ १७<br>षड्भिर्मासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयेके।<br>चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः॥ १८<br>अरुणोदयवेलायां दशाहेन फलं भवेत्।<br>एकस्यां यदि वा रात्रौ शुभं वा यदि वाशुभम्॥ १९<br>पश्चाद् दृष्टस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत्।<br>तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्चात् स्वप्नो न शस्यते॥ २० | (ऐसे स्वप्न देखनेपर) खली लगाकर स्नान, तिलसे हवन और ब्राह्मणोंका पूजन करे। भगवान् वासुदेवकी स्तुति उनकी पूजा और गजेन्द्रमोक्षकी कथाका श्रवण आदिका दुःस्वप्नका नाशक समझना चाहिये। रात्रिके पहले पहरमें देखे गये स्वप्न देखनेवालेको निःसंदेह एक वर्षमें, दूसरे पहरमें देखे गये छः महीनेमें, तीसरे पहरमें देखे गये तीन महीनेमें तथा चतुर्थ पहरमें देखे गये एक महीनेमें फल देते हैं। सूर्योदयके समय देखे जानेपर दस दिनमें ही फल प्राप्त होता है। यदि एक ही रातमें शुभ और अशुभ—दोनों प्रकारके स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जो पीछे दीख पड़ा हो, उसीका फल कहना चाहिये। इसलिये शुभ स्वप्नके देखनेपर मनुष्यको पुनः नहीं सोना चाहिये॥ १६—२०॥ | | शैलप्रासादनागाश्ववृषभारोहणं हितम्।<br>द्रुमाणां श्वेतपुष्पाणां गमने च तथा द्विज॥ २१<br>द्रुमतृणोद्भवो नाभौ तथैव बहुबाहुता।<br>तथैव बहुशीर्षत्वं फलितोद्भव एव च॥ २२<br>सुशुक्लमाल्यधारित्वं सुशुक्लाम्बरधारिता।<br>चन्द्रार्कताराग्रहणं परिमार्जनमेव च॥ २३<br>शक्रध्वजालिङ्गनं च तदुच्छ्रायक्रिया तथा।<br>भूम्यम्बुधीनां ग्रसनं शत्रूणां च वधक्रिया॥ २४<br>जयो विवादे द्यूते च संग्रामे च तथा द्विज।<br>भक्षणं चार्द्रमांसानां मत्स्यानां पायसस्य च॥ २५<br>दर्शनं रुधिरस्यापि स्नानं वा रुधिरेण च।<br>सुरारुधिरमद्यानां पानं क्षीरस्य चाथ वा॥ २६<br>अन्त्रैर्वा वेष्टनं भूमौ निर्मलं गगनं तथा।<br>मुखेन दोहनं शस्तं महिषीणां तथा गवाम्॥ २७<br>सिंहीनां हस्तिनीनां च वडवानां तथैव च।<br>प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा शुभः॥ २८ | द्विज! पर्वत, राजमहल, हाथी, घोड़ा, वृषभ—इनपर आरोहण करना हितकारक है तथा श्वेत पुष्पोंवाले वृक्षोंपर चढ़ना शुभप्रद है। नाभिमें वृक्ष और तृणका उत्पन्न होना, अनेक बाहुओंका होना, अनेक सिरोंका होना, फलदान, उद्भिद्जोंका दर्शन, सुन्दर श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओंको हाथसे पकड़ना या उन्हें स्वच्छ करना, इन्द्रधनुषका आलिङ्गन करना या उसे ऊपर उठाना, पृथ्वी और समुद्रोंको निगलना, शत्रुओंका संहार करना, संग्राम, विवाद और जूएमें जीतना, कच्चा मांस, मछली और खीरका खाना, रक्तका दर्शन या रक्तसे स्नान, मदिरा, रक्त, मद्य अथवा दुग्धका पीना, अपनी आँतोंसे पृथ्वीको बाँधना, निर्मल आकाशको देखना, भैंस, गाय, सिंहिनी, हथिनी तथा घोड़ियोंको मुखसे दुहना, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी प्रसन्नता—ये स्वप्न शुभदायक होते हैं॥ २१—२८॥ | | अम्भसा त्वभिषेकस्तु गवां शृङ्गस्रुतेन वा।<br>चन्द्राद् भ्रष्टेन वा राजन्ज्ञेयो राज्यप्रदोहि सः॥ २९<br>राज्याभिषेकश्च तथा छेदनं शिरसस्तथा।<br>मरणं वह्निदाहश्च वह्निदाहो गृहादिषु॥ ३०<br>लब्धिश्च राज्यलिङ्गानां तन्त्रीवाद्याभिवादनम्।<br>तथोदकानां तरणं तथा विषमल्लङ्घनम्॥ ३१ | राजन्! गौओंके सींगसे चूनेवाले अथवा चन्द्रमासे गिरे हुए जलसे अभिषेक होना राज्यप्रद समझना चाहिये। राज्याभिषेक, सिरका कटना, मृत्यु, अग्निका प्रज्वलित होना या घरमें आग लगना, राज्यचिह्नोंकी प्राप्ति, वीणाका स्वर सुनायी पड़ना, जलमें तैरना, दुर्गम स्थानोंको पार करना, |