मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ९२६ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ बयालीसवाँ अध्याय
शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण
| मनुरुवाच | मनुजीने पूछा—देव! यात्राके समयके स्वप्नका वृत्तान्त कैसा है? विविध प्रकारके वैसे यों भी स्वप्न अनेक दिखायी पड़ते हैं, उनका फल कैसा होता है (बतलायें)॥ १॥ |
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| स्वप्नाख्यानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते।<br>दृश्यन्ते विविधाकाराः कथं तेषां फलं भवेत्॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा—मनो! अब मैं स्वप्नोंके शुभाशुभ लक्षणोंको बतला रहा हूँ! नाभिके अतिरिक्त अन्य अङ्गोंमें तृण एवं वृक्षका उगना, मस्तकपर कांसेका कूटा जाना, मुण्डन, नग्नता, मलिन वस्त्रोंका धारण करना, तेल लगाना, कीचमें धँसना, लेप, ऊँचे स्थानसे गिरना, झूलेपर चढ़ना, कीचड़ और लोहेको इकट्ठा करना, घोड़ोंको मारना, लाल पुष्पवाले वृक्षों, मण्डल, शूकर, रीछ, गधे और ऊँटोंपर चढ़ना, पक्षी, मछली, तेल और खिचड़ीका भोजन, नाचना, हँसना, विवाह, गायन, वीणाको छोड़कर अन्य वाद्योंका स्वागत करना, जलके सोतेमें स्नान करनेके लिये जाना, गोबर लगाकर जलमें स्नान करना, इसी प्रकार कीचड़युक्त जलमें तथा पृथ्वीके थोड़े जलमें नहाना, माताके उदरमें प्रवेश करना, चितापर चढ़ना, इन्द्रध्वजका गिरना, चन्द्रमा और सूर्यका पतन, दिव्य, अन्तरिक्ष तथा भौम उत्पातोंका दर्शन, देवता, द्विजाति, राजा और गुरुका क्रोध, कुमारी कन्याओंका आलिङ्गन, पुरुषोंके साथ सम्भोग, अपने ही शरीरका नाश, विरेचन, वमन, दक्षिण दिशाकी यात्रा, किसी व्याधिसे पीड़ित होना, फलों तथा पुष्पोंकी हानि, घरोंका गिरना, घरोंकी सफाई होना, पिशाच, मांसभक्षी जीव, वानर, रीछ और मनुष्यके साथ क्रीडा करना, शत्रुसे पराजित होना या उसकी ओरसे किसी प्रकारकी आपत्तिका प्रकट होना, काषाय वस्त्रको धारण करना अथवा वैसे वस्त्रवाली स्त्रीके साथ क्रीडा करना, तेल-पान या उसीमें स्नान करना, लाल पुष्प और लाल चन्दनको धारण करना तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दुःस्वप्न कहे गये हैं। इन्हें देखनेके बाद दूसरेसे कह देना तथा पुनः सो जाना कल्याणकारक है॥ २–१५॥ |
| इदानीं कथयिष्यामि निमित्तं स्वप्नदर्शने।<br>नाभिं विनान्यगात्रेषु तृणवृक्षसमुद्भवः॥ २ | |
| चूर्णं मूर्ध्नि कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा।<br>मलिनाम्बरधारित्वमभ्यङ्गः पङ्कदिग्धता॥ ३ | |
| उच्चात् प्रपतनं चैव दोलारोहणमेव च।<br>अर्जनं पङ्कलोहानां हयानामपि मारणम्॥ ४ | |
| रक्तपुष्पद्रुमाणां च मण्डलस्य तथैव च।<br>वराहर्क्षरक्षोष्ट्राणां तथा चारोहणक्रिया॥ ५ | |
| भक्षणं पक्षिमत्स्यानां तैलस्य कृसरस्य च।<br>नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च॥ ६ | |
| तन्त्रीवाद्यविहीनानां वाद्यानामभिवादनम्।<br>स्रोतोऽवगाहगमनं स्नानं गोमयवारिणा॥ ७ | |
| पङ्कोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ।<br>मातुः प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च॥ ८ | |
| शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसूर्ययोः।<br>दिव्यान्तरिक्षभौमानामुत्पातानां च दर्शनम्॥ ९ | |
| देवद्विजातिभूपालगुरूणां क्रोध एव च।<br>आलिङ्गनं कुमारीणां पुरुषाणां च मैथुनम्॥ १० | |
| हानिश्चैव स्वगात्राणां विरेचवमनक्रिया।<br>दक्षिणाशाभिगमनं व्याधिनाभिभवस्तथा॥ ११ | |
| फलापहानिश्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च।<br>गृहाणां चैव पातश्च गृहसम्मार्जनं तथा॥ १२ | |
| क्रीडा पिशाचक्रव्यादवानरर्क्षनरैरपि।<br>परादभिभवश्चैव तस्माच्च व्यसनोद्भवः॥ १३ | |
| काषायवस्त्रधारित्वं तद्वत् स्त्रीक्रीडनं तथा।<br>स्नेहपानावगाहौ च रक्तमाल्यानुलेपनम्॥ १४ | |
| एवमादीनि चान्यानि दुःस्वप्नानि विनिर्दिशेत्।<br>एषां संकथनं धन्यं भूयः प्रस्वापनं तथा॥ १५ |