भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 947
* अध्याय २४५ *९३७

| न घ्राणचक्षुःश्रवणादिभिर्यः<br>सर्वेश्वरो वेदितुमक्षयात्मा।<br>शक्यस्तमीड्यं मनसैव देवं<br>ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारम्॥ २७<br>अंशावतीर्णेन च येन गर्भे<br>हतानि तेजांसि महासुराणाम्।<br>नमामि तं देवमनन्तमीश-<br>मशेषसंसारतरोः कुठारम्॥ २८<br>देवो जगद्योनिरयं महात्मा<br>स षोडशांशेन महासुरेन्द्र।<br>स देवमातुर्जठरं प्रविष्टो<br>हतानि वस्तेन बलाद् वपूंषि॥ २९ | जो अक्षयात्मा सर्वेश्वर नासिका, नेत्र और कान आदि इन्द्रियोंद्वारा जाने नहीं जा सकते, जिन्हें केवल मनद्वारा ग्रहण किया जा सकता है उन पूज्य परमेश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने गर्भमें अपने अंशमात्रसे अवतीर्ण होकर बड़े-बड़े दैत्योंके तेजोंका हरण कर लिया है, जो समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप हैं उन अनन्त परमात्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। महासुरेन्द्र! जो ये महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं जगत्के उत्पत्तिस्थान भगवान् विष्णु हैं, ये अपने सोलह अंशोंसे माता अदितिके उदरमें प्रविष्ट हुए हैं, उन्होंने ही बलपूर्वक तुमलोगोंके शरीरको निस्तेज कर दिया है॥ २३—२९॥ | | बलिरुवाच<br>तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्।<br>सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः॥ ३०<br>विप्रचित्तिः शिविः शङ्कुरायःशङ्कुस्तथैव च।<br>अयःशिराश्चाश्वशिरा भङ्गकारी महाहनुः॥ ३१<br>प्रतापः प्रघसः शुम्भः कुकुरश्च सुदुर्जयः।<br>एते चान्ये च मे सन्ति दैतेया दानवास्तथा॥ ३२<br>महाबला महावीर्या भूभारोद्धरणक्षमाः।<br>एषामेकैकशः कृष्णो न वीर्यार्धेन सम्मितः॥ ३३ | **बलिने कहा—**तात! यह हरि कौन है जिससे हम लोगोंको भय प्राप्त हो गया है? मेरे पास तो उस वासुदेवसे भी अधिक बलवान् सैकड़ों दैत्य हैं। विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कु, अयःशङ्कु, अयःशिरा, अश्वशिरा, भङ्गकारी, महाहनु, प्रताप, प्रघस, शुम्भ, अत्यन्त कठिनाईसे जीतने योग्य कुकुर—ये तथा इनके अतिरिक्त और भी दैत्य एवं दानव मेरे अधिकारमें हैं। ये सभी महाबली, महान् पराक्रमी तथा पृथ्वीके भारको उठानेमें समर्थ हैं। इनमेंसे एक-एकके आधे पराक्रमसे भी कृष्णकी कोई समानता नहीं है॥ ३०—३३॥ | | शौनक उवाच<br>पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादो दैत्यपुंगवः।<br>धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्॥ ३४ | **शौनकजी बोले—**दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद अपने पौत्रकी यह बात सुनकर भगवान्‌की निन्दा करनेवाले उस बलिको धिक्कारते हुए बोले॥ ३४॥ | | प्रह्लाद उवाच<br>विनाशमुपयास्यन्ति मन्ये दैतेयदानवाः।<br>येषां त्वमीदृशो राजा दुर्बुद्धिरविवेकवान्॥ ३५<br>देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्।<br>त्वामृते पापसंकल्पः कोऽन्य एवं वदिष्यति॥ ३६<br>य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता दैत्यदानवाः।<br>सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरानन्तभूमयः॥ ३७<br>त्वं चाहं च जगच्चेदं साद्रिद्रुमनदीनदम्।<br>समुद्रद्वीपलोकाश्च न समं केशवस्य हि॥ ३८ | **प्रह्लादने कहा—**मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जिनका तुम-जैसा अविवेकी एवं दुर्बुद्धि राजा है, उन दैत्यों और दानवोंका विनाश हो जायगा। तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन ऐसा पापी होगा जो देवाधिदेव, महाभाग, अजन्मा एवं सर्वव्यापी वासुदेवको ऐसा कहेगा? तुमने जिनका नाम गिनाया है ये सभी दैत्य-दानव, ब्रह्मसहित देवगण, चराचर जगत्, तुम, मैं, पर्वत, वृक्ष, नदी और नदोंसहित यह संसार, समुद्र, द्वीप और लोक—ये सभी भगवान् केशवकी समानता नहीं कर सकते। |