भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 948, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 948
९३८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यस्यातिवन्द्यवन्द्यस्य व्यापिनः परमात्मनः।<br>एकांशेन जगत् सर्वं कस्तमेवं प्रवक्ष्यति॥ ३९<br><br>ऋते विनाशाभिमुखं त्वामेकमविवेकिनम्।<br>कुबुद्धिमजितात्मानं वृद्धानां शासनातिगम्॥ ४०<br><br>शोच्योऽहं यस्य मे गेहे जातस्तव पिताधमः।<br>यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवस्य निन्दकः॥ ४१<br><br>तिष्ठत्वेषा हि संसारसम्भृताघविनाशिनी।<br>कृष्णे भक्तिरहं तावदवेक्ष्यो भवता न किम्॥ ४२जिन सर्वव्यापी एवं वन्दनीयोंके भी वन्दनीय परमात्माके एक अंशसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, उन्हें अकेले तुम-जैसे अविवेकी, विनाशोन्मुख, कुबुद्धि, अजितात्मा, वृद्धोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवालेके सिवा दूसरा कौन ऐसा कहेगा ? अब तो शोचनीय मैं हुआ, जिसके घरमें तुम्हारा नीच पिता उत्पन्न हुआ, जिसके तुम इस प्रकार देवाधिदेव विष्णुकी निन्दा करनेवाले पुत्र हुए। संसारमें जन्म लेकर उपार्जित किये गये पापोंको नष्ट करनेवाली भगवान् कृष्णके चरणोंमें हमारी भक्ति अक्षुण्ण बनी रहे, भले ही मैं तुम्हारे द्वारा अपमानित क्यों न होऊँ ? ॥ ३५-४२ ॥
न मे प्रियतमः कृष्णादपि देहो महात्मनः।<br>इति जानात्ययं लोको न भवान् दितिजाधम॥ ४३<br><br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम॥ ४४<br><br>विरोचनस्तव गुरुर्गुरुस्तस्याप्यहं बले।<br>ममापि सर्वजगतां गुरोर्नारायणो गुरुः॥ ४५<br><br>निन्दां करोषि यस्तस्मिन् कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौ।<br>यस्मात्तस्मादिहैश्वर्यादचिराद् भ्रंशमेष्यसि॥ ४६<br><br>मम देवो जगन्नाथो बले तावज्जनार्दनः।<br>भवत्वहमुपेक्ष्यस्ते प्रीतिमानस्तु मे गुरुः॥ ४७<br><br>एतावन्मात्रमप्येवं निन्दितस्त्रिजगद्गुरुः।<br>नावेक्षितं त्वया यस्मात् तस्माच्छापं ददामि ते॥ ४८<br><br>यथा मे शिरसश्छेदादिदं गुरुतरं वचः।<br>त्वयोक्तमच्युताक्षेपि राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ४९<br><br>यथा च कृष्णान्न परं परित्राणं भवार्णवे।<br>तथाचिरेण पश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ५०दैत्याधम! भगवान् (विष्णु)-से बढ़कर मुझे अपना शरीर भी प्रिय नहीं है, इसे यह संसार जानता है, किंतु तुम्हें विदित नहीं है। मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भगवान् विष्णुको जानते हुए भी तुम मेरे गौरवकी रक्षा न करते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु विरोचन है और मैं उसका भी गुरु हूँ तथा मेरे एवं समस्त संसारके गुरुके भी गुरु नारायण हैं। चूँकि तुम उन गुरुओंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इसलिये इस लोकमें शीघ्र ही ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! जगदीश्वर जनार्दन मेरे देवता हैं। वे मेरे गुरु मुझपर प्रसन्न रहें, भले ही मैं तुम्हारे द्वारा उपेक्षित हो जाऊँ। (मुझे इसकी परवा नहीं है।) चूँकि तुमने बिना विचारे त्रिलोकीके गुरु भगवान्‌की जो इस प्रकार इतनी निन्दा की है, इसीलिये मैं तुम्हें शाप दे रहा हूँ। जिस प्रकार तुमने मेरा सिर काट लेनेसे भी बढ़कर यह भगवान् अच्युतकी निन्दा करनेवाला वचन कहा है, उसी प्रकार तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर (अवनतिके गर्तमें) गिर जाओ। जिस प्रकार इस संसारसागरमें विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई शरणदाता नहीं है, (मेरी यह बात सत्य है तो) मैं शीघ्र ही तुम्हें राज्यसे च्युत हुआ देखूँ ॥ ४३-५० ॥
शौनक उवाचशौनकजी बोले—
इति दैत्यपतिः श्रुत्वा गुरोर्वचनमप्रियम्।<br>प्रसादयामास गुरुं प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ ५१दैत्यराज बलिने अपने पितामह प्रह्लादकी ऐसी अप्रिय बात सुनकर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर सभी प्रकारसे प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ ५१ ॥
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