भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 949
* अध्याय २४५ *९३९

| बलिरुवाच | बलिने कहा— तात! प्रसन्न हो जाइये। अज्ञानसे मारे हुए मुझपर क्रोध मत कीजिये। मैंने बलके गर्वसे उन्मत्त होकर ऐसी बात कह दी है। दैत्यश्रेष्ठ! मेरा सारा ज्ञान मोहसे नष्ट हो गया है, मैं पापी और दुराचारी हूँ। अतः आपने जो मुझे यह शाप दिया है, वह अच्छा ही किया है। तात! मैं राज्यसे च्युत और सम्पत्तिसे रहित हो जाऊँगा—इससे मैं उतना दुःखी नहीं हूँ जितना आपके साथ अविनयपूर्ण व्यवहार करनेसे मुझे कष्ट हो रहा है। त्रिलोकीका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य कोई भी वस्तु अत्यन्त दुर्लभ नहीं है, परंतु आपके समान जो गुरुजन हैं, वे विश्वमें अवश्य दुर्लभ हैं। इसलिये दैत्योंके पालक! आप प्रसन्न हो जाइये, मुझपर क्रोध न कीजिये। तात! मैं आपकी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे दुःखी हो रहा हूँ, शापसे नहीं॥ ५२-५६॥ | | प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि।<br>बलावलेपमत्तेन मयैतद् वाक्यमीरितम्॥ ५२<br>मोहोपहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम।<br>यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम्॥ ५३<br>राज्यभ्रंशं वसुभ्रंशं सम्प्राप्स्यामीति न त्वहम्।<br>विषण्णोऽस्मि यथा तात तवैवाविनये कृते॥ ५४<br>त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नाति दुर्लभम्।<br>संसारे दुर्लभास्ते तु गुरवो ये भवद्विधाः॥ ५५<br>तत् प्रसीद न मे कोपं कर्तुमर्हसि दैत्यप।<br>त्वत्कोपदृष्ट्या ताताहं परितप्ये न शापतः॥ ५६ | | | प्रह्लाद उवाच | प्रह्लाद बोले— वत्स! कोपके कारण मुझे मोह उत्पन्न हो गया, जिससे अभिभूत होकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया; क्योंकि मोहने मेरे विवेकको नष्ट कर दिया था। महासुर! यदि मोहके द्वारा मेरा ज्ञान नष्ट न हुआ होता तो भगवान् विष्णुको सर्वव्यापी जानता हुआ मैं शाप क्यों देता? असुरश्रेष्ठ! मैंने तुम्हें जो यह शाप दिया है, यह तुम्हारे लिये अवश्य घटित होगा, अतः तुम विषाद मत करो। आजसे जो देवेश्वर, कभी च्युत न होनेवाले और शास्ता हैं, उन भगवान् श्रीहरिके प्रति तुम भक्तिमान् हो जाओ। वे ही तुम्हारे रक्षक होंगे। वीर! इस शापके घटित होनेपर तुम मेरा स्मरण करना। तुम जैसे स्मरण करोगे वैसे ही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि जिससे तुम कल्याणके भागी होओगे। दैत्यराज बलिसे ऐसा कहकर महामतिमान् प्रह्लाद चुप हो गये। उधर भगवान् गोविन्द वामनरूपमें प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी उन जगन्नाथके अवतरित होनेपर देवगण तथा देवमाता अदिति दुःखसे विमुक्त हो गयीं। उस समय सुख-स्पर्शी वायु बहने लगी, आकाश निर्मल हो गया और सभी प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें संलग्न हो गयी। तभीसे राजाओं और राक्षसोंके तथा पृथ्वी, आकाश और स्वर्गमें निवास करनेवाले सभी जीवोंके मनोंमें उद्वेग नहीं हुआ। राजन्! भगवान्‌के उत्पन्न होते ही लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने उनका जातकर्म आदि संस्कार किया। तत्पश्चात् उन देवदेवेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन कर वे ऋषियोंके सुनते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥ ५७–६६॥ | | वत्स कोपेन मोहो मे जनितस्तेन ते मया।<br>शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम॥ ५७<br>यदि मोहेन मे ज्ञानं नाक्षिप्तं स्यान्महासुर।<br>तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं किंचिच्छपाम्यहम्॥ ५८<br>योऽयं शापो मया दत्तो भवतोऽसुरपुङ्गव।<br>भाव्यमेतेन नूनं ते तस्मान्मा त्वं विषीद वै॥ ५९<br>अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ।<br>भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति॥ ६०<br>शापं प्राप्याथ मां वीर संस्मरेथाः स्मृतस्त्वया।<br>यथा तथा यतिष्येऽहं श्रेयसा योज्यसे यथा॥ ६१<br>एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्रं विरराम महामतिः।<br>अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः॥ ६२<br>अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वार्मरेश्वरे।<br>देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमातादितिस्तथा॥ ६३<br>ववुर्वाताः सुखस्पर्शा विरजस्कमभून्नभः।<br>धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत॥ ६४<br>नोद्वेगश्चाप्यभूत् तत्र मनुजेन्द्रासुरेष्वपि।<br>तदादि सर्वभूतानां भूम्यम्बरदिवौकसाम्॥ ६५<br>तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>जातकर्मादिकं कृत्वा कृष्णं दृष्ट्वा च पार्थिव।<br>तुष्टाव देवदेवेशमृषीणां चैव शृण्वताम्॥ ६६ | |