मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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९४६ * मत्स्यपुराण *
| मुखं वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः।<br>हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः॥ ५९<br>पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसंधिषु।<br>सर्वसूक्तानि दशना ज्योतींषि विमलप्रभाः॥ ६० | वैश्वानर उनके मुख, प्रजापति अण्डकोष, परब्रह्म हृदय और कश्यप मुनि पुंस्त्व थे। उनके पीठ-भागमें वसुगण और संधिभागोंमें मरुद्गण थे। सभी सूक्त दाँत और निर्मल कान्ति ज्योतिर्गण थे॥ ५९-६०॥ |
| वक्षःस्थले महादेवो धैर्ये चास्य महार्णवाः।<br>उदरे चास्य गन्धर्वाः सम्भूताश्च महाबलाः॥ ६१<br>लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः।<br>सर्वज्योतींषि जानीहि तस्य तत्परमं महः॥ ६२<br>तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भूतमूत्तमम्।<br>स्तनौ कुक्षी च वेदाश्च उदरं च महामखाः॥ ६३<br>इष्टयः पशुबन्धाश्च द्विजानां चेष्टितानि च।<br>तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महाबलाः॥ ६४<br>उपासर्पन्त दैत्येन्द्राः पतङ्गा इव पावकम्।<br>प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः॥ ६५<br>कृत्वा रूपं महाकायं जहाराशु स मेदिनीम्।<br>तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे॥ ६६<br>नाभौ विक्रममाणस्य सक्थिदेशस्थितावुभौ।<br>परं विक्रमतस्तस्य जानुमूले प्रभाकरौ॥ ६७<br>विष्णोरास्तां महीपाल देवपालनकर्मणि।<br>जित्वा लोकत्रयं कृत्स्नं हत्वा चासुरपुङ्गवान्॥ ६८<br>पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः।<br>सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात्॥ ६९<br>बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः॥ ७० | उनके वक्षःस्थलमें महादेव और धैर्यमें महासागर थे। उनके उदरमें महाबली गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति और सभी विद्याएँ उनके कटिप्रदेशमें थीं। सभी ज्योतियोंको उनका परम तेज जानना चाहिये। वहाँ उन देवाधिदेवका अनुपम तेज भासमान हो रहा था। उनके स्तनों और कुक्षियोंमें वेदोंका निवास था तथा उदरमें महायज्ञ, इष्टियाँ, पशुओंके बलिदान और ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ थीं। उन विष्णुके देवमय स्वरूपको देखकर महाबली दैत्यगण अग्निमें पतंगोंकी भाँति उनपर टूट पड़े। तब सर्वव्यापी परमात्माने उन सभी असुरोंको पैरों तथा हाथोंके चपेटसे मसल डाला और शीघ्र ही विशालकाय स्वरूप धारणकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया। भूलोकको नापते समय चन्द्रमा और सूर्य भगवान्के स्तनोंके मध्यभागमें थे, अन्तरिक्षलोक नापते समय वे दोनों नाभिप्रदेशमें और उससे ऊपर जाते समय सक्थि भागमें आ गये। उससे भी ऊपर जाते समय वे दोनों प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य भगवान् विष्णुके घुटनोंके मूलभागमें स्थित हो गये। महीपाल! इस प्रकार लम्बे डगवाले भगवान् विष्णुने देवहितके लिये समूची त्रिलोकीको जीतकर और असुरश्रेष्ठोंका संहार कर तीनों लोकोंका राज्य इन्द्रको सौंप दिया। साथ ही प्रभावशाली भगवान् विष्णुने भूमितलके नीचे सुतल नामक पाताललोकका राज्य बलिको दे दिया। उस समय सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुने दैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहा॥ ६१-७०॥ |
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान् बोले— |
| यत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया।<br>कल्पप्रमाणं तस्मात् ते भविष्यत्यायुरुत्तमम्॥ ७१<br>वैवस्वते तथातीते बले मन्वन्तरे ह्यथ।<br>सावर्णि के तु सम्प्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति॥ ७२<br>साम्प्रतं देवराजाय त्रैलोक्यं सकलं मया।<br>दत्तं चतुर्युगाणां च साधिका ह्येकसप्ततिः॥ ७३<br>नियन्तव्या मया सर्वे ये तस्य परिपन्थिनः।<br>तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले॥ ७४ | दैत्यराज बलि! जो तुमने मुझे जलका दान दिया है और मैंने उसे हाथमें ग्रहण कर लिया है, उसके फलस्वरूप तुम एक कल्पतक दीर्घजीवन प्राप्त करोगे और इस वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर सावर्णि मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्र होओगे। इस समय मैंने एकहत्तर चतुर्युगीतकके लिये त्रिलोकीका सम्पूर्ण राज्य देवराज इन्द्रको दे दिया है। साथ ही इन्द्रके जितने शत्रु होंगे, उन सबका भी मुझे नियन्त्रण करना है; क्योंकि इन्द्रने पूर्वकालमें परम भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है। |