मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २४६ * | ९४७ |
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| सुतलं नाम पातालं त्वमासाद्य मनोरमम्।<br>वसासुर ममादेशं यथावत् परिपालयन्॥ ७५<br>तत्र दिव्यवनोपेते प्रासादशतसंकुले।<br>प्रोत्फुल्लपद्मसरसि स्रवच्छुद्धसरिद्वरे॥ ७६<br>सुगन्धिधूपस्रग्वस्त्रवराभरणभूषितः ।<br>स्रक्चन्दनादिमुदितो गेयनृत्यमनोरमे॥ ७७<br>पानान्नभोगान् विविधानुपभुङ्क्ष्व महासुर।<br>ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः॥ ७८<br>यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं करिष्यसि।<br>तावदेतान् महाभोगानवाप्स्यसि महासुर॥ ७९<br>यदा च देवविप्राणां विरोधं त्वं करिष्यसि।<br>बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणास्त्वामसंशयम्॥ ८०<br>एतद् विदित्वा भवता मयाऽऽज्ञप्तमशेषतः।<br>न विरोधः सुरैः कार्यो विप्रैर्वा दैत्यसत्तम॥ ८१ | असुर! तुम सुतल नामक मनोहर पाताललोकमें जाकर मेरे आदेशका ठीक-ठीक पालन करते हुए निवास करो। महासुर! जो दिव्य वनोंसे युक्त एवं सैकड़ों महलोंसे समन्वित है, जिसके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं, जहाँ शुद्ध एवं श्रेष्ठ नदियाँ बह रही हैं, जो नाच-गानसे मनको लुभानेवाला है, उस सुतललोकमें तुम सुगन्धित धूप, माला, वस्त्र और उत्तम आभूषणोंसे विभूषित तथा माला और चन्दनादिसे हर्षित होकर विविध प्रकारके अन्न-पान आदिका उपभोग करो और मेरी आज्ञासे सैकड़ों स्त्रियोंके साथ उतने समयतक निवास करो। महासुर! जबतक तुम देवताओं और ब्राह्मणोंसे विरोध नहीं करोगे, तबतक तुम इन सभी महाभोगोंको प्राप्त करते रहोगे। जब तुम देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करोगे, तब तुम्हें वरुणके पाश बाँध लेंगे—इसमें संदेह नहीं है। दैत्यश्रेष्ठ! ऐसा जानकर तुम मेरी आज्ञाओंका पूर्णरूपसे पालन करो! तुम्हें देवताओं अथवा ब्राह्मणोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये॥ ७५—८१॥ | | शौनक उवाच<br>इत्येवमुक्तो देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>बलिः प्राह महाराज प्रणिपत्य मुदा युतः॥ ८२ | शौनकजी बोले—महाराज! प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बलि प्रमुदित हो प्रणाम करके बोला॥ ८२॥ | | बलिरुवाच<br>तत्रासतो मे पाताले भगवन् भवदाज्ञया।<br>किं भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादकम्॥ ८३ | बलिने पूछा—भगवन्! आपके आदेशसे उस पाताललोकमें निवास करते समय मेरे लिये सुखभोगोंको प्राप्त करानेवाले कौन-से उपादान कारण होंगे?॥ ८३॥ | | श्रीभगवानुवाच<br>दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च।<br>हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम्॥ ८४<br>अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृताः।<br>फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च॥ ८५ | श्रीभगवान्ने कहा—जो विधानसे रहित किये गये दान, बिना श्रोत्रिय ब्राह्मणके किये गये श्राद्ध और श्रद्धारहित किये हुए हवन हैं, ये सब तुम्हें अपना फल प्रदान करेंगे। दक्षिणाहीन यज्ञ, बिना विधिके की हुई क्रियाएँ और ब्रह्मचर्य-व्रतसे रहित अध्ययन—ये सभी तुम्हें अपना फल देंगे॥ ८४-८५॥ | | शौनक उवाच<br>बलेर्वरमिमं दत्त्वा शक्राय त्रिदिवं तथा।<br>व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरिः॥ ८६<br>प्रशशास यथापूर्वमिन्द्रस्त्रैलोक्यपूजितः।<br>सिषेवे च परान् कामान् बलिः पातालसंस्थितः॥ ८७<br>इहैव देवदेवेन बद्धोऽसौ दानवोत्तमः।<br>देवानां कार्यकारणे भूयोऽपि जगति स्थितः॥ ८८<br>सम्बन्धी ते महाभाग द्वारकायां व्यवस्थितः।<br>दानवानां विनाशाय भारावतरणाय च॥ ८९ | शौनकजीने कहा—बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्गका राज्य देकर भगवान् विष्णु अपने उस सर्वव्यापक रूपके साथ अदृश्य हो गये। तत्पश्चात् इन्द्र तीनों लोकोंमें पूजित होकर पूर्ववत् शासन करने लगे तथा बलि पातालमें स्थित होकर उत्तम मनोरथोंका सेवन करने लगे। महाभाग! वह दानवराज बलि भगवान् विष्णुद्वारा यहीं बाँधा गया था। वे भगवान् देवताओंका कार्य करनेके लिये फिर इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं, जो दानवोंका विनाश तथा पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये |