भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 963, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 963
* अध्याय २४८ *९५३

| तव देहाज्जगज्जातं पुष्करद्वीपमुत्थितम्।<br>ब्रह्माणमिह लोकानां भूतानां शाश्वतं विदुः॥ १३<br>तव प्रसादाद् देवोऽयं दिवं भुङ्क्ते पुरन्दरः।<br>तव क्रोधाद्द्वि बलवान् जनार्दन जितो बलिः॥ १४<br>धाता विधाता संहर्ता त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>मनुः कृतान्तोऽधिपतिर्ज्वलनः पवनो घनः॥ १५<br>वर्णाश्चाश्रमधर्माश्च सागरास्तरवोऽचलाः।<br>नद्यो धर्मश्च कामश्च यज्ञा यज्ञस्य च क्रियाः॥ १६<br>विद्या वेद्यं च सत्त्वं च ह्रीः श्रीः कीर्तिर्धृतिः क्षमा।<br>पुराणं वेदवेदाङ्गं सांख्ययोगौ भवाभवौ॥ १७<br>जङ्गमं स्थावरं चैव भविष्यं च भवच्च यत्।<br>सर्वं तच्च त्रिलोकेषु प्रभावोपहितं तव॥ १८<br>त्रिदशोदारफलदः स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवः।<br>सर्वलोकमनःकान्तः सर्वसत्त्वमनोहरः॥ १९<br>विमानानेकविटपस्तोयदाम्बुमधुस्रवः ।<br>दिव्यलोकमहास्कन्धः सत्यलोकप्रशाखवान्॥ २०<br>सागराकारनिर्‍यासो रसातलजलाश्रयः।<br>नागेन्द्रपादपोपेतो जन्तुपक्षिनिषेवितः॥ २१ | प्रभो! आपके शरीरसे जगत् उत्पन्न हुआ है, पुष्कर द्वीपकी उत्पत्ति हुई है और ब्रह्मा प्रकट हुए हैं, आप सभी लोकों और प्राणियोंके सनातन पुरुष माने जाते हैं। आपकी कृपासे ये देवराज इन्द्र स्वर्गका उपभोग कर रहे हैं। जनार्दन! आपके क्रोधसे बलवान् बलि जीता गया है। आप धाता, विधाता और संहर्ता हैं। आपमें समस्त जगत् प्रतिष्ठित है। मनु, प्रजापति, यम, अग्नि, पवन, मेघ, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, समुद्र, वृक्ष, पर्वत, नदियाँ, धर्म, काम, यज्ञ; यज्ञकी क्रियाएँ, विद्या, जाननेयोग्य अन्य बातें, जीवगण, लज्जा, ह्री, श्री, कीर्ति, धैर्य, क्षमा, पुराण, वेद, वेदाङ्ग, सांख्य, योग, जन्म, मरण, जंगम, स्थावर, भूत और भविष्यत्—ये सभी तीनों लोकोंमें आपके प्रभावसे आच्छादित हैं। आप देवताओंको उत्तम फल देनेवाले, स्वर्गकी रमणियोंके लिये सुन्दर पल्लवरूप, सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाले, सभी जीवोंके मनके हरणकर्ता, विमानरूपी अनेक वृक्षोंसे युक्त, मेघोंके जलरूप मधु टपकानेवाले, दिव्य लोकरूप महान् स्कन्धवाले, सत्यलोकरूप शाखाओंसे युक्त, सागररूप रस, रसातलकी तरह जलके आश्रयस्थान, ऐरावतरूप वृक्षसे युक्त तथा जन्तुओं और पक्षियोंसे सुसेवित हैं॥ १२—२१॥ | | शीलाचारार्यगन्धस्त्वं सर्वलोकमयोद्रुमः।<br>द्वादशार्कमयद्वीपो रुद्रैकादशपत्तनः॥ २२<br>वस्वष्टाचलसंयुक्तस्त्रैलोक्याम्भोमहोदधिः ।<br>सिद्धसाध्योर्मिकलिलः सुपर्णानिलसेवितः॥ २३<br>दैत्यलोकमहाग्राहो रक्षोरगझषाकुलः।<br>पितामहमहाधैर्यः स्वर्गस्त्रीरत्नभूषितः॥ २४<br>धीश्रीह्रीकान्तिभिर्नित्यं नदीभिरुपशोभितः।<br>कालयोगमहापर्वप्रयागगतिवेगवान् ॥ २५ | आप शील, सदाचार और श्रेष्ठ गन्धसे युक्त, सर्वलोकमय वृक्ष, बारह आदित्योंसे युक्त द्वीप, ग्यारह रुद्ररूप नगर, आठों वसुरूप पर्वत, त्रिलोकीरूप जलसे परिपूर्ण महासागर, सिद्ध और साध्यरूप लहरोंसे युक्त, गरुडरूप वायुसे सेवित, दैत्यसमूहरूप महान् ग्राह, राक्षस और नागरूपी मछलियोंसे व्याप्त, ब्रह्मारूप महान् धैर्यसम्पन्न, स्वर्गकी अप्सरारूप रत्नसे विभूषित हैं। आप बुद्धि, लक्ष्मी, लज्जा और कान्तिरूपी नदियोंसे नित्य सुशोभित तथा कालके योगसे उत्पन्न होनेवाले महापर्वके समय वेगपूर्वक प्रयागमें गमन करनेवाले हैं। | | त्वं स्वयोगमहावीर्यो नारायण महार्णवः।<br>कालो भूत्वा प्रसन्नाभिरद्भिर्ह्लादयसे पुनः॥ २६ | नारायण! आप अपने योगरूपी महापराक्रमसे सम्पन्न महासागर हैं और पुनः आप ही काल बनकर निर्मल जलसे जगत्को आह्लादित करते हैं। | | त्वया सृष्टास्त्रयो लोकास्त्वयैव प्रतिसंहृताः।<br>विशन्ति योगिनः सर्वे त्वामेव प्रतियोगिताः॥ २७ | आपने तीनों लोकोंकी सृष्टि की है और आपसे ही उनका संहार होता है। आपके द्वारा नियुक्त किये गये सभी योगी आपमें ही प्रविष्ट होते हैं। | | युगे युगे युगान्ताग्निः कालमेघो युगे युगे।<br>मम भारावताराय देव त्वं हि युगे युगे॥ २८ | देव! आप प्रत्येक युगमें प्रलयाग्नि और प्रत्येक युगमें प्रलयकालीन मेघ हैं तथा मेरा भार उतारनेके लिये आप प्रत्येक युगमें अवतीर्ण होते हैं। |

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