भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 964
९५४* मत्स्यपुराण *

| त्वं हि शुक्लः कृतयुगे त्रेतायां चम्पकप्रभः।<br>द्वापरे रक्तसंकाशः कृष्णः कलियुगे भवान्॥ २९<br>वैवर्ण्यमभिधत्से त्वं प्राप्तेषु युगसंधिषु।<br>वैवर्ण्यं सर्वधर्माणामुत्पादयसि वेदवित्॥ ३०<br>भासि वासि प्रतपसि त्वं च पासि विचेष्टसे।<br>क्रुद्ध्यसि क्षान्तिमायासि त्वं दीपयसि वर्षसि॥ ३१<br>त्वं हास्यसि न निर्यासि निर्वापयसि जाग्रसि।<br>निःशेषयसि भूतानि कालो भूत्वा युगक्षये॥ ३२<br>शेषमात्मानमालोक्य विशेषयसि त्वं पुनः।<br>युगान्ताग्न्यवलीढेषु सर्वभूतेषु किञ्चन॥ ३३<br>यातेषु शेषो भवसि तस्माच्छेषोऽसि कीर्तितः।<br>च्यवनोत्पत्तियुक्तेषु ब्रह्मेन्द्रवरुणादिषु॥ ३४<br>यस्मान्न च्यवसे स्थानात्तस्मात् संकीर्त्यसेऽच्युतः।<br>ब्रह्माणमिन्द्रं च यमं रुद्रं वरुणमेव च॥ ३५<br>निगृह्य हरसे यस्माद् तस्माद्धरिरिहोच्यसे।<br>संतानयसि भूतानि वपुषा यशसा श्रिया॥ ३६<br>परेण वपुषा देव तस्माच्चासि सनातनः।<br>यस्माद् ब्रह्मादयो देवा मुनयश्चोग्रतेजसः॥ ३७<br>न तेऽन्तं त्वधिगच्छन्ति तेनानन्तस्त्वमुच्यसे।<br>न क्षीयसे न क्षरसे कल्पकोटिशतैरपि॥ ३८<br>तस्मात् त्वमक्षरत्वाच्च अक्षरश्च प्रकीर्तितः।<br>विष्टब्धं यत्त्वया सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३९<br>जगद्विष्टम्भनाच्चैव विष्णुरेवेति कीर्त्यसे।<br>विष्टभ्य तिष्ठसे नित्यं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४०<br>यक्षगन्धर्वनगरं सुमहद्भूतपन्नगम्।<br>व्याप्तं त्वयैव विशता त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४१<br>तस्माद् विष्णुरिति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा।<br>नारा इत्युच्यते ह्यापो हृषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४२<br>अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।<br>युगे युगे प्रनष्टां गां विष्णो विन्दसि तत्त्वतः॥ ४३<br>गोविन्देति ततो नाम्ना प्रोच्यसे ऋषिभिस्तथा।<br>हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तत्त्वज्ञानविशारदाः॥ ४४<br>ईशिता च त्वमेतेषां हृषीकेशस्तथोच्यसे। | आप कृतयुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें चम्पक-पुष्प-सदृश पीतवर्ण, द्वापरमें रक्तवर्ण और कलियुगमें श्यामवर्ण हो जाते हैं। वेदज्ञ! युग-संधियोंके प्राप्त होनेपर आप विवर्णताको धारण करते हैं और सभी धर्मोंमें विपरीतता उत्पन्न कर देते हैं। आप प्रकाशित होते, प्रवाहित होते, तपते, रक्षा करते और चेष्टा करते हैं। आप क्रोध करते, शान्ति धारण करते, उद्दीप्त करते और वर्षा करते हैं। आप हँसते, स्थिर रहते, मारते और जागते रहते हैं तथा प्रलयकालमें काल बनकर सभी जीवोंको निःशेष कर देते हैं॥ २२—३२॥<br><br>फिर अपनेको शेष बचा हुआ देखकर पुनः आप उसकी वृद्धि करते हैं। युगान्तकी अग्निमें सभी भूतोंके दग्ध हो जानेपर एकमात्र आप शेष रहते हैं, इसलिये आप 'शेष' नामसे पुकारे जाते हैं। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण आदि देवता उत्पत्ति और पतनसे युक्त हैं, किंतु आप अपने स्थानसे च्युत नहीं होते, इसलिये 'अच्युत' कहलाते हैं। चूँकि आप ब्रह्मा, इन्द्र, यम, रुद्र और वरुणका निग्रहपूर्वक हरण करते हैं, इसलिये यहाँ 'हरि' कहे जाते हैं। देव! आप अपने शरीर, यश, श्री और विराट् शरीरद्वारा सभी जीवोंका विस्तार करते हैं, इसलिये 'सनातन' हैं। चूँकि ब्रह्मा आदि देवगण और उग्र तेजस्वी मुनिगण आपका अन्त नहीं जान पाते, इसीलिये आप 'अनन्त' कहे जाते हैं। सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी न तो आप क्षीण होते हैं और न नष्ट होते हैं, इसलिये विनाशरहित होनेके कारण आप 'अक्षर' कहे गये हैं। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्को स्तम्भित किये रहते हैं, इसीलिये जगत्का विष्टम्भन करनेके कारण 'विष्णु' कहे जाते हैं। आप सचराचर त्रिलोकीको नित्य अवरुद्ध करके स्थित रहते हैं तथा आप ही यक्षों एवं गन्धर्वोंके नगरोंसे सम्पन्न और महान् नागोंसे युक्त चराचरसहित त्रिलोकीमें प्रवेश करके उसे व्याप्त किये रहते हैं, इसीलिये स्वंय ब्रह्माने आपको 'विष्णु' नामसे अभिहित किया है। तत्त्वदर्शी ऋषियोंने जलका नाम 'नारा' कहा है और वह पूर्वकालमें आपका निवासस्थान था, इसीसे आप 'नारायण' कहे जाते हैं। विष्णो! प्रत्येक युगमें नष्ट हुई गोरूपिणी पृथ्वीको तत्त्वतः आप ही प्राप्त करते हैं, इसीलिये ऋषिगण आपको 'गोविन्द' नामसे पुकारते हैं। तत्त्वज्ञानमें निपुणजन इन्द्रियोंको हृषीक कहते हैं और आप उन इन्द्रियोंके शासक हैं, अतः 'हृषीकेश' कहे जाते हैं॥ ३३—४४ ½॥ |