मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| शौनक उवाच | **शौनकजीने कहा—**तदनन्तर भगवान् विष्णुने मनमें दिव्य स्वरूपका चिन्तन किया और सोचने लगे कि मैं कौन-सा रूप धारणकर इस पृथ्विका उद्धार करूँ। ऐसा सोचते हुए उन्हें जलक्रीडाकी रुचि उत्पन्न हो गयी, इसलिये उन्होंने शूकरका शरीर धारण किया। वह रूप सभी प्राणियोंके लिये अजेय, वाङ्मय, ब्रह्मस्वरूप, सौ योजनोंमें विस्तृत, उससे दुगुना ऊँचा, नील मेघके समान कान्तिमान्, मेघोंकी गड़गड़ाहटके सदृश शब्दसे युक्त, पर्वतके समान सुदृढ़, भयंकर, श्वेत एवं तीखे अग्रभागवाले दाढ़ोंसे युक्त, बिजली एवं अग्निकी भाँति कान्तिमान्, सूर्यके समान तेजस्वी, मोटे एवं चौड़े कंधेसे सुशोभित, गर्वीले सिंहकी-सी चालवाला, मोटे एवं ऊँचे कटिभागसे सम्पन्न और वृषभके लक्षणोंसे युक्त था। तब अजेय भगवान् विष्णुने ऐसा विशाल वराह स्वरूप धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया। उन महातपस्वी भगवान् वराहके वेद चारों पैर थे, यज्ञ-स्तम्भ उनकी दाढ़ें थीं, यज्ञ उनके दाँत थे, यज्ञका कुण्ड उनका मुख था, अग्नि उनकी जीभ थी, कुश उनके रोएँ थे, ब्रह्म उनका मस्तक था, दिन और रात उनके नेत्र थे, वेदोंके छः अङ्ग कानके आभूषण थे, घृताहुति उनकी नासिका थी, स्रुवा उनका थूथुन था, सामवेदका उच्चस्वर शब्द था, वे सत्य और धर्मसे युक्त, श्रीसम्पन्न और कर्मरूप पराक्रमसे सत्कृत थे। प्रायश्चित्त उनके भीषण नख और पशुगण जानु भाग थे। यज्ञ उनकी आकृति थी। उद्गीथद्वारा किया गया हवन उनका लिङ्ग था, बीज और ओषधियाँ महान् फल थीं, वायु उनका अन्तरात्मा, यज्ञ अस्थिविकार, सोमरस रक्त, वेद कंधे और हवि गन्ध था। वे भगवान् हव्य तथा कव्यके विभाग करनेवाले थे। प्राग्वंश उनका शरीर था। वे कान्तिमान् और अनेकों दीक्षाओंसे दीक्षित थे। दक्षिणा उनका हृदय था, वे परम योगी और महान् यज्ञमय महापुरुष थे। उपाकर्म उनके होंठोंके फलक, प्रवर्ग्य सम्पूर्ण आभूषण, समस्त वेद गमन-मार्ग और गोपनीय उपनिषदें उनकी आसन थीं। छाया उनकी पत्नी थी, वे मणि-शृङ्गके समान ऊँचे थे। ऐसे वराहभगवान्ने रसातलमें जाकर डूबी हुई पृथ्वीका लोकहितकी कामनासे अपने दाढ़ोंके अग्रभागपर रखकर उद्धार किया॥ ६२—७४॥ | | ततो महात्मा मनसा दिव्यं रूपमचिन्तयत्।<br>किं नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेयं धरामिमाम्॥ ६२<br>जलक्रीडारुचिस्तस्माद्वाराहं वपुरास्थितः।<br>अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्म संस्थितम्॥ ६३<br>शतयोजनविस्तीर्णमुच्छ्रितं द्विगुणं ततः।<br>नीलजीमूतसंकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम्॥ ६४<br>गिरिसंहननं भीमं श्वेततीक्ष्णाग्रदंष्ट्रिणम्।<br>विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् ।<br>पीनवृत्तायतस्कन्धं दृप्तशार्दूलगामिनम्॥ ६५<br>पीनोन्नतकटीदेशे वृषलक्षणपूजितम्।<br>रूपमास्थाय विपुलं वाराहमजितो हरिः॥ ६६<br>पृथिव्युद्धरणायैव प्रविवेश रसातलम्।<br>वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदन्तश्चितीमुखः॥ ६७<br>अग्निजिह्वो दर्भलोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः।<br>अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्गश्रुतिभूषणः॥ ६८<br>आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान्।<br>सत्यधर्ममयः श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृतः॥ ६९<br>प्रायश्चित्तनखो घोरः पशुजानुर्मखाकृतिः।<br>उद्गीथहोमलिङ्गोऽथ बीजौषधिमहाफलः॥ ७०<br>वाय्वन्तरात्मा यज्ञास्थिविकृतिः सोमशोणितः।<br>वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यविभागवान्॥ ७१<br>प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः।<br>दक्षिणाहृदयो योगी महासत्रमयो महान्॥ ७२<br>उपाकर्मौष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः।<br>नानाच्छन्दोगतिपथो गुह्योपनिषदासनः।<br>छायापत्नीसहायो वै मणिशृङ्ग इवोच्छ्रितः॥ ७३<br>रसातलतले मग्नां रसातलतलं गताम्।<br>प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्राग्रेणोज्जहार ताम्॥ ७४ | |