मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २४९ * ९५७
| ततः स्वस्थानमानीय वराहः पृथिवीधरः।<br>मुमोच पूर्वं मनसा धारितां च वसुंधराम्॥ ७५<br>ततो जगाम निर्वाणं मेदिनी तस्य धारणात्।<br>चकार च नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे॥ ७६<br>एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना।<br>उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुगता पुरा॥ ७७<br>अथोद्धृत्य क्षितिं देवो जगतः स्थापनेच्छया।<br>पृथिवीप्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः॥ ७८<br>रसां गतामेवमचिन्त्यविक्रमः<br>सुरोत्तमः प्रवरवराहरूपधृक्।<br>वृषाकपिः प्रसभमथैकदंष्ट्रया<br>समुद्धरद्धरणिमतुल्यपौरुषः ॥ ७९ | इसके बाद पृथिवीको धारण करनेवाले वराहभगवान्ने पहले मनसे धारण की हुई वसुंधराको अपने स्थानपर लाकर छोड़ दिया। उनके धारण करनेसे पृथ्वीने भी शान्ति-लाभ किया और उन कल्याणकारी भगवान्को नमस्कार किया। इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान्ने प्राणियोंके हित करनेकी इच्छासे यज्ञवराहरूप धारणकर सागरके जलमें निमग्न हुई पृथ्वीदेवीका उद्धार किया था। इस प्रकार पृथ्वीका उद्धार कर कमलनयन भगवान् विष्णुने जगत्की स्थापनाके लिये पृथ्वीको विभक्त करनेका विचार किया। इस प्रकार अचिन्त्य पराक्रमी, अनुपम पुरुषार्थी, सुरश्रेष्ठ, श्रेष्ठ वराहका रूप धारण करनेवाले भगवान् वृषाकपिने* रसातलमें गयी हुई पृथ्वीका बलपूर्वक अपनी एक दाढ़द्वारा उद्धार किया था॥ ७५-७९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वराहप्रादुर्भावो नामाष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वराहप्रादुर्भाव नामक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४८॥
दो सौ उनचासवाँ अध्याय
अमृत-प्राप्तिके लिये समुद्र-मन्थनका उपक्रम और वारुणी (मदिरा)-का प्रादुर्भाव
| ऋषय ऊचुः<br>नारायणस्य माहात्म्यं श्रुत्वा सूत यथाक्रमम्।<br>न तृप्तिर्जायतेऽस्माकमतः पुनरिहोच्यताम्॥ १<br>कथं देवा गताः पूर्वममरत्वं विचक्षणाः।<br>तपसा कर्मणा वापि प्रसादात् कस्य तेजसा॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! भगवान् नारायणके माहात्म्यको क्रमशः सुनकर हमलोगोंकी तृप्ति नहीं हो रही है, अतः उसे पुनः बतलाइये। प्राचीनकालमें चतुर देवतालोग तपस्या या कर्मसे अथवा किस देवताकी कृपासे किस प्रकार अमरत्वको प्राप्त हुए थे?॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>यत्र नारायणो देवो महादेवश्च शूलधृक्।<br>तत्रामरत्वे सर्वेषां सहायौ तत्र तौ स्मृतौ॥ ३<br>पुरा देवासुरे युद्धे हताश्च शतशः सुरैः।<br>पुनः संजीवनीं विद्यां प्रयोज्य भृगुनन्दनः॥ ४<br>जीवापयति दैत्येन्द्रान् यथा सुप्तोत्थितानिव।<br>तस्य तुष्टेन देवेन शंकरेण महात्मना॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! जहाँ भगवान् विष्णु और शूलधारी शंकरजी वर्तमान हैं, वहाँ वे ही दोनों सभी देवताओंकी अमरत्व-प्राप्तिमें सहायक माने गये हैं। प्राचीनकालमें देवासुर-संग्राममें देवताओंद्वारा मारे गये सैकड़ों राक्षसोंको भृगुनन्दन शुक्राचार्य संजीवनी-विद्याका प्रयोग करके जीवित कर देते थे। तब वे दैत्येन्द्र फिर सोकर उठे हुएकी तरह उठकर लड़ने लगते थे। परम कान्तिमती मृत-संजीवनी विद्या शुक्राचार्यको उनपर प्रसन्न हुए भगवान् शंकरने दी थी। |
* निरुक्तादिके अनुसार वृषाकपिका अर्थ महादेव, वाराहावतार विष्णु तथा (हनुमान्) आदि हैं। निरुक्त एवं अन्य वैदिक तथा व्याकरणादि ग्रन्थोंके अनुसार इनकी पत्नी 'वृषाकपायी' कही गयी हैं।