मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| मृतसंजीवनी नाम विद्या दत्ता महाप्रभा।<br>तां तु माहेश्वरीं विद्यां महेश्वरमुखोद्गताम् ॥ ६<br>भार्गवे संस्थितां दृष्ट्वा मुमुदुः सर्वदानवाः।<br>ततोऽमरत्वं दैत्यानां कृतं शुक्रेण धीमता ॥ ७<br>या नास्ति सर्वलोकानां देवानां यक्षरक्षसाम्।<br>न नागानामृषीणां च न च ब्रह्मेन्द्रविष्णुषु ॥ ८<br>तां लब्ध्वा शंकराच्छुक्रः परां निर्वृतिमागतः।<br>ततो देवासुरो घोरः समरः सुमहानभूत् ॥ ९<br>तत्र देवैर्हतान् दैत्याञ्छुक्रो विद्याबलेन च।<br>उत्थापयति दैत्येन्द्रॉल्लीलयैव विचक्षणः॥ १०<br>एवंविधेन शक्रस्तु बृहस्पतिरुदारधीः।<br>हन्यमानास्ततो देवाः शतशोऽथ सहस्रशः॥ ११<br>विषण्णवदनाः सर्वे बभूवुर्विकलेन्द्रियाः।<br>ततस्तेषु विषण्णेषु भगवान् कमलोद्भवः।<br>मेरुपृष्ठे सुरेन्द्राणामिदमाह जगत्पतिः॥ १२<br>ब्रह्मोवाच<br>देवाः शृणुत मद्वाक्यं तत्तथैव निरूप्यताम्।<br>क्रियतां दानवैः सार्धं सख्यमैत्राभिधीयताम् ॥ १३<br>क्रियताममृतोद्योगो मथ्यतां क्षीरवारिधिः।<br>सहायं वरुणं कृत्वा चक्रपाणिर्विबोध्यताम् ॥ १४<br>मन्थानं मन्दरं कृत्वा शेषनेत्रेण वेष्टितम्।<br>दानवेन्द्रो बलिः स्वामी स्तोककालं निवेश्यताम् ॥ १५<br>प्रार्थ्यतां कूर्मरूपश्च पाताले विष्णुरव्ययः।<br>प्रार्थ्यतां मन्दरः शैलो मन्थकार्यं प्रवर्त्यताम् ॥ १६<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देवा जग्मुर्दानवमन्दिरम्।<br>अलं विरोधेन वयं भृत्यास्तव बलेऽधुना ॥ १७<br>क्रियताममृतोद्योगो व्रियतां शेषनेत्रकम्।<br>त्वया चोत्पादिते दैत्य अमृतेऽमृतमन्थने ॥ १८<br>भविष्यामोऽमराः सर्वे त्वत्प्रसादान्न संशयः।<br>एवमुक्तस्तदा देवैः परितुष्टः स दानवः॥ १९<br>यथा वदत हे देवास्तथा कार्यं मयाधुना।<br>शक्तोऽहमेक एवात्र मथितुं क्षीरवारिधिम् ॥ २० | महेश्वरके मुखसे निकली हुई माहेश्वरी विद्याको शुक्राचार्यमें संस्थित देखकर दानवगण अतिशय प्रमुदित थे। इस विद्याके प्रभावसे बुद्धिमान् शुक्राचार्यने राक्षसोंको अमर कर दिया था। जो विद्या न तो सम्पूर्ण लोकों, देवों, यक्षों और राक्षसोंमें थी, न नागों और ऋषियोंमें तथा न ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णुमें थी, उसे शंकरजीसे प्राप्तकर शुक्र परम संतुष्ट थे। इसके बाद देवताओं और राक्षसोंमें महान् भीषण युद्ध छिड़ गया। उसमें देवताओंद्वारा मारे गये दैत्येन्द्रोंको परम निपुण आचार्य शुक्र अपनी विद्याके बलसे देखते-ही-देखते तुरंत जीवित कर देते थे। इस प्रकार सैकड़ों-हजारों देवताओंको मारा जाता हुआ देखकर इन्द्र, उदारहृदय बृहस्पति तथा सभी देवताओंके मुख सूख गये और उनकी इन्द्रियाँ विकल हो गयीं। इस प्रकार उनके चिन्तित होनेपर कमलोद्भव जगत्पति भगवान् ब्रह्माने सुमेरु पर्वतपर अवस्थित देवताओंसे इस प्रकार कहा॥ ३—१२॥<br><br>ब्रह्माजी बोले—देवगण! आपलोग मेरी बात सुनिये और उसके अनुसार काम कीजिये। इस कार्यमें आप लोग दानवोंके साथ मित्रता कर लें और अमृत-प्राप्तिके लिये उपाय करें। इसके लिये चक्रपाणि भगवान् विष्णुको उद्बोधित कीजिये और वरुणको सहायक तथा शेषनागरूपी रस्सीसे परिवेष्टित मन्दराचलको मथानी बनाकर क्षीरसमुद्रका मन्थन कीजिये। थोड़े समयके लिये दानवेन्द्र बलिको अध्यक्षरूपमें नियुक्त कर दीजिये। पातालमें स्थित कूर्मरूप अव्यय भगवान् विष्णुकी और मन्दराचलकी प्रार्थना कीजिये। तत्पश्चात् समुद्र-मन्थनका कार्य प्रारम्भ कीजिये। उस कथनको सुनकर देवगण दानवराजके महलमें पहुँचे और कहने लगे—'बले! अब विरोध बंद कीजिये, हमलोग तो आपके भृत्य हैं। आप अमृत-प्राप्तिके लिये उद्योग करें और शेषनागको रस्सीके रूपमें वरण करें। दैत्य! अमृतमन्थनरूप कार्यमें आपके द्वारा अमृतके उत्पन्न हो जानेपर आपकी कृपासे हम सभी लोग निःसंदेह अमर हो जायेंगे।' देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दानवराज बलि उस समय प्रसन्न हो गया और कहने लगा—'देवगण! जैसा आपलोग कह रहे हैं, मुझे इस समय वैसा ही करना चाहिये। मैं तो अकेला ही क्षीरसागरका |