मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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- अध्याय २४९ * ९५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आहरिष्येऽमृतं दिव्यममृतत्वाय वोऽधुना।<br>सुदूरादाश्रयं प्राप्तान् प्रणतानपि वैरिणः॥ २१<br>यो न पूजयते भक्त्या प्रेत्य चेह विनश्यति।<br>पालयिष्यामि वः सर्वानधुना स्नेहमास्थितः॥ २२<br>एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्रो देवैः सह ययौ तदा।<br>मन्दरं प्रार्थयामास सहायत्वे धराधरम्॥ २३<br>मन्था भव त्वमस्माकमधुनामृतमन्थने।<br>सुरासुराणां सर्वेषां महत्कार्यमिदं यतः॥ २४<br>तथेति मन्दरः प्राह यद्याधारो भवेन्मम।<br>यत्र स्थित्वा भ्रमिष्यामि मथिष्ये वरुणालयम्॥ २५<br>कल्प्यतां नेत्रकार्ये यः शक्तः स्याद् भ्रमणे मम।<br>ततस्तु निर्गतौ देवौ कूर्मशेषौ महाबलौ॥ २६<br>विष्णोर्भागौ चतुर्थांशाद्धरण्या धारणे स्थितौ।<br>ऊचतुर्गर्वसंयुक्तं वचनं शेषकच्छपौ॥ २७ | मन्थन करनेमें समर्थ हूँ। इस समय मैं आपलोगोंकी अमरताके निमित्त दिव्य अमृत ले आऊँगा। जो सुदूरसे आश्रयके लिये आये हुए शरणागत वैरियोँको भक्तिपूर्वक सम्मानित नहीं करता, उसका यह लोक और परलोक—दोनों नष्ट हो जाते हैं। इस समय मैं आप सभी लोगोंकी स्नेहपूर्वक रक्षा करूँगा।' ऐसा कहकर दैत्येन्द्र बलि देवताओंके साथ तुरंत चल पड़ा और सहायताके लिये मन्दराचलसे प्रार्थना करते हुए बोला—'मन्दर! चूँकि इस समय हम सभी देवताओं और असुरोंका यह महान् कार्य उपस्थित हो गया है, अतः इस अमृत-मन्थनके कार्यमें तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचलने कहा—'यदि मुझे कोई आधार मिले तो मुझे स्वीकार है जिसपर स्थित होकर मैं भ्रमण करूँगा और वरुणालयको मथ डालूँगा। साथ ही मेरे भ्रमण करते समय जो समर्थ हो सके, ऐसा किसीको नेतीके कार्यके लिये चुनिये।' तदनन्तर महाबली कूर्म और शेषनाग—दोनों देवता पातालसे ऊपर आये। ये दोनों भगवान् विष्णुके चतुर्थांश भाग हैं और पृथ्वीको धारण करनेके लिये नियुक्त हैं। तब शेष और कच्छप गर्वपूर्ण वचन बोले॥ १३—२७॥ |
| कूर्म उवाच<br>त्रैलोक्यधारणेनापि न ग्लानिर्मम जायते।<br>किमु मन्दरकात् क्षुद्राद् गुटिकासंनिभादिह॥ २८ | कूर्मने कहा—मुझे तो इस त्रिलोकीको धारण करनेपर भी थकावट नहीं होती तो भला इस कार्यमें गुटिकाके समान क्षुद्र मन्दरको धारण करनेकी क्या बात है?॥ २८॥ |
| शेष उवाच<br>ब्रह्माण्डवेष्टनेनापि ब्रह्माण्डमथनेन वा।<br>न मे ग्लानिर्भवेद् देहे किमु मन्दरवर्तने॥ २९ | शेषनागने कहा—जब समस्त ब्रह्माण्डका वेष्टन बनने तथा उसका मन्थन करनेसे मेरे शरीरमें शिथिलता नहीं आती तो मन्दरके घुमानेसे कौन-सा कष्ट होगा? |
| तत उत्पाट्य तं शैलं तत्क्षणात् क्षीरसागरे।<br>चिक्षेप लीलया नागः कूर्मश्चाधःस्थितस्तदा॥ ३०<br>निराधारं यदा शैलं न शेकुर्देवदानवाः।<br>मन्दरभ्रामणं कर्तुं क्षीरोदमथने तथा॥ ३१<br>नारायणनिवासं ते जग्मुर्बलिसमन्विताः।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव जनार्दनः॥ ३२<br>तत्रापश्यन्त तं देवं सितपद्मप्रभं शुभम्।<br>योगनिद्रासुनिरतं पीतवाससमच्युतम्॥ ३३<br>हारकेयूरनद्धाङ्गमहिपर्यङ्कसंस्थितम् ।<br>पादपद्मेन पद्मायाः स्पृशन्तं नाभिमण्डलम्॥ ३४ | ऐसा कहकर नागने लीलापूर्वक उसी क्षण उस मन्दराचलको उखाड़कर क्षीरसागरमें डाल दिया। उस समय कूर्म उसके नीचे स्थित हुए। किंतु क्षीरसमुद्रका मन्थन आरम्भ होनेपर जब देवता और दानव उस आधारशून्य मन्दराचलको घुमानेमें समर्थ न हो सके, तब वे बलिको साथ लेकर भगवान् नारायणके निवासस्थानपर गये, जहाँ देवाधिदेव भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ उन्होंने श्वेत कमलके समान कान्तियुक्त एवं कल्याणकारी भगवान् अच्युतको देखा, जिनके शरीरपर पीताम्बर झलक रहा था, जो योगनिद्रामें निमग्न थे, जिनका शरीर हार और केयूरसे विभूषित था, जो शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे थे और अपने चरणकमलसे लक्ष्मीके नाभिमण्डलका स्पर्श |