मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय २४९ * ९५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आहरिष्येऽमृतं दिव्यममृतत्वाय वोऽधुना।<br>सुदूरादाश्रयं प्राप्तान् प्रणतानपि वैरिणः॥ २१<br>यो न पूजयते भक्त्या प्रेत्य चेह विनश्यति।<br>पालयिष्यामि वः सर्वानधुना स्नेहमास्थितः॥ २२<br>एवमुक्त्वा स दैत्येन्द्रो देवैः सह ययौ तदा।<br>मन्दरं प्रार्थयामास सहायत्वे धराधरम्॥ २३<br>मन्था भव त्वमस्माकमधुनामृतमन्थने।<br>सुरासुराणां सर्वेषां महत्कार्यमिदं यतः॥ २४<br>तथेति मन्दरः प्राह यद्याधारो भवेन्मम।<br>यत्र स्थित्वा भ्रमिष्यामि मथिष्ये वरुणालयम्॥ २५<br>कल्प्यतां नेत्रकार्ये यः शक्तः स्याद् भ्रमणे मम।<br>ततस्तु निर्गतौ देवौ कूर्मशेषौ महाबलौ॥ २६<br>विष्णोर्भागौ चतुर्थांशाद्धरण्या धारणे स्थितौ।<br>ऊचतुर्गर्वसंयुक्तं वचनं शेषकच्छपौ॥ २७ | मन्थन करनेमें समर्थ हूँ। इस समय मैं आपलोगोंकी अमरताके निमित्त दिव्य अमृत ले आऊँगा। जो सुदूरसे आश्रयके लिये आये हुए शरणागत वैरियोँको भक्तिपूर्वक सम्मानित नहीं करता, उसका यह लोक और परलोक—दोनों नष्ट हो जाते हैं। इस समय मैं आप सभी लोगोंकी स्नेहपूर्वक रक्षा करूँगा।' ऐसा कहकर दैत्येन्द्र बलि देवताओंके साथ तुरंत चल पड़ा और सहायताके लिये मन्दराचलसे प्रार्थना करते हुए बोला—'मन्दर! चूँकि इस समय हम सभी देवताओं और असुरोंका यह महान् कार्य उपस्थित हो गया है, अतः इस अमृत-मन्थनके कार्यमें तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचलने कहा—'यदि मुझे कोई आधार मिले तो मुझे स्वीकार है जिसपर स्थित होकर मैं भ्रमण करूँगा और वरुणालयको मथ डालूँगा। साथ ही मेरे भ्रमण करते समय जो समर्थ हो सके, ऐसा किसीको नेतीके कार्यके लिये चुनिये।' तदनन्तर महाबली कूर्म और शेषनाग—दोनों देवता पातालसे ऊपर आये। ये दोनों भगवान् विष्णुके चतुर्थांश भाग हैं और पृथ्वीको धारण करनेके लिये नियुक्त हैं। तब शेष और कच्छप गर्वपूर्ण वचन बोले॥ १३—२७॥ |
| कूर्म उवाच<br>त्रैलोक्यधारणेनापि न ग्लानिर्मम जायते।<br>किमु मन्दरकात् क्षुद्राद् गुटिकासंनिभादिह॥ २८ | कूर्मने कहा—मुझे तो इस त्रिलोकीको धारण करनेपर भी थकावट नहीं होती तो भला इस कार्यमें गुटिकाके समान क्षुद्र मन्दरको धारण करनेकी क्या बात है?॥ २८॥ |
| शेष उवाच<br>ब्रह्माण्डवेष्टनेनापि ब्रह्माण्डमथनेन वा।<br>न मे ग्लानिर्भवेद् देहे किमु मन्दरवर्तने॥ २९ | शेषनागने कहा—जब समस्त ब्रह्माण्डका वेष्टन बनने तथा उसका मन्थन करनेसे मेरे शरीरमें शिथिलता नहीं आती तो मन्दरके घुमानेसे कौन-सा कष्ट होगा? |
| तत उत्पाट्य तं शैलं तत्क्षणात् क्षीरसागरे।<br>चिक्षेप लीलया नागः कूर्मश्चाधःस्थितस्तदा॥ ३०<br>निराधारं यदा शैलं न शेकुर्देवदानवाः।<br>मन्दरभ्रामणं कर्तुं क्षीरोदमथने तथा॥ ३१<br>नारायणनिवासं ते जग्मुर्बलिसमन्विताः।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव जनार्दनः॥ ३२<br>तत्रापश्यन्त तं देवं सितपद्मप्रभं शुभम्।<br>योगनिद्रासुनिरतं पीतवाससमच्युतम्॥ ३३<br>हारकेयूरनद्धाङ्गमहिपर्यङ्कसंस्थितम् ।<br>पादपद्मेन पद्मायाः स्पृशन्तं नाभिमण्डलम्॥ ३४ | ऐसा कहकर नागने लीलापूर्वक उसी क्षण उस मन्दराचलको उखाड़कर क्षीरसागरमें डाल दिया। उस समय कूर्म उसके नीचे स्थित हुए। किंतु क्षीरसमुद्रका मन्थन आरम्भ होनेपर जब देवता और दानव उस आधारशून्य मन्दराचलको घुमानेमें समर्थ न हो सके, तब वे बलिको साथ लेकर भगवान् नारायणके निवासस्थानपर गये, जहाँ देवाधिदेव भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ उन्होंने श्वेत कमलके समान कान्तियुक्त एवं कल्याणकारी भगवान् अच्युतको देखा, जिनके शरीरपर पीताम्बर झलक रहा था, जो योगनिद्रामें निमग्न थे, जिनका शरीर हार और केयूरसे विभूषित था, जो शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे थे और अपने चरणकमलसे लक्ष्मीके नाभिमण्डलका स्पर्श |
| ९६० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्वपक्षव्यजनेनाथ वीज्यमानं गरुत्मता।<br>स्तूयमानं समन्ताच्च सिद्धचारणकिंनरैः ॥ ३५<br>आम्नायैर्मूर्तिमद्भिः स्तूयमानं समन्ततः।<br>सव्यबाहूपधानं तं तुष्टुवुर्देवदानवाः।<br>कृताञ्जलिपुटाः सर्वे प्रणताः सर्वतोदिशम्॥ ३६ | कर रहे थे, गरुड़ अपने डैनारूपी पंखेसे जिनपर हवा कर रहे थे, चारों ओरसे सिद्ध, चारण और किन्नर जिनकी स्तुतिमें तन्मय थे, मूर्तिमान् वेद चारों ओरसे जिनकी स्तुति कर रहे थे तथा जो अपनी बायीं भुजाको तकिया बनाये हुए थे। तब वे सभी देव-दानव सब ओरसे हाथ जोड़कर प्रणाम करके उन भगवान्की स्तुति करने लगे॥ २९—३६॥ |
| देवदानवा ऊचुः<br>नमो लोकत्रयाध्यक्ष तेजसा जितभास्कर।<br>नमो विष्णो नमो जिष्णो नमस्ते कैटभार्दन॥ ३७<br>नमः सर्गक्रियाकर्त्रे जगत्पालयते नमः।<br>रुद्ररूपाय शर्वाय नमः संहारकारिणे॥ ३८<br>नमः शूलायुधाधृष्य नमो दानवघातिने।<br>नमः क्रमत्रयाक्रान्त त्रैलोक्यायाभवाय च॥ ३९<br>नमः प्रचण्डदैत्येन्द्रकुलकालमहानल।<br>नमो नाभिह्रदोद्भूतपद्मगर्भ महाबल॥ ४०<br>पद्मभूत महाभूत कर्त्रे हर्त्रे जगत्प्रिय।<br>जनिता सर्वलोकेश क्रियाकारणकारिणे॥ ४१<br>अमरारिविनाशाय महासमरशालिने।<br>लक्ष्मीमुखाब्जमधुप नमः कीर्तिनिवासिने॥ ४२<br>अस्माकममरत्वाय ध्रियतां ध्रियतामयम्।<br>मन्दरः सर्वशैलानामयुतायुतविस्तृतः॥ ४३<br>अनन्तबलबाहुभ्यामवष्टभ्यैकपाणिना ।<br>मथ्यताममृतं देव स्वधास्वाहार्थकामिनाम्॥ ४४<br>ततः श्रुत्वा स भगवान् स्तोत्रपूर्वं वचस्तदा।<br>विहाय योगनिद्रां तामुवाच मधुसूदनः॥ ४५ | देवताओं और दैत्योंने कहा—त्रिलोकीनाथ ! आप अपने तेजसे सूर्यको पराजित करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुको प्रणाम है। जिष्णुको अभिवादन है। आप कैटभका वध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सृष्टि-कर्म करनेवालेको प्रणाम है। आप जगत्के पालनकर्ता हैं, आपको अभिवादन है। आप रुद्ररूपसे संहार करनेवाले हैं, आप शर्वको नमस्कार है। त्रिशूलरूप आयुधसे धर्षित न होनेवाले आपको प्रणाम है। दानवोंका वध करनेवाले आपको अभिवादन है। आप तीन पगसे त्रिलोकीको आक्रान्त कर लेनेवाले और अजन्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप प्रचण्ड दैत्येन्द्रोंके कुलके लिये कालरूप महान् अग्नि हैं, आपको प्रणाम है। महाबल ! आपके नाभि-कुण्डसे पद्मकी उत्पत्ति हुई है, आपको अभिवादन है। आप पद्मको उत्पन्न करनेवाले, महाभूत, जगत्के कर्ता, हर्ता और प्रिय, सभीके जनक, सभी लोकोंके स्वामी, कार्य और कारण—दोनोंका निर्माण करनेवाले, अमरोंके शत्रुओंका विनाश करनेके लिये महान् समर करनेवाले, लक्ष्मीके मुखकमलके मधुप और यशमें निवास करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप हमलोगोंकी अमरत्व-प्राप्तिके लिये सभी पर्वतोंमें विशाल मन्दराचलको, जो अयुतायुत योजन विस्तृत है, अवश्य धारण कीजिये। देव ! आप अपनी अनन्त बलशालिनी भुजाओंके द्वारा पर्वतको रोककर एक हाथसे स्वाहा-स्वधाके अभिलाषी देवताओंके उपकारार्थ अमृतका मन्थन कीजिये। तदनन्तर भगवान् मधुसूदन उस स्तुतिपूर्ण वचनको सुनकर उस योगनिद्राका परित्याग कर इस प्रकार बोले ॥ ३७-४५॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>स्वागतं विबुधाः सर्वे किमागमनकारणम्।<br>यस्मात् कार्यादिह प्राप्तास्तद् ब्रूत विगतज्वराः॥ ४६<br>नारायणेनैवमुक्ताः प्रोचुस्तत्र दिवौकसः।<br>अमरत्वाय देवेश मध्यमाने महोदधौ ॥ ४७ | श्रीभगवान्ने कहा—देवगण ! आप सब लोगोंका स्वागत है। आपलोगोंके यहाँ आगमनका क्या उद्देश्य है? आपलोग जिस कार्यके लिये यहाँ आये हैं। उसे निश्चिन्त होकर बतलाइये। नारायणके ऐसा कहनेपर देवताओंने कहा—‘देवेश ! हमलोग अमरत्व-प्राप्तिके लिये |
| * अध्याय २४९ * | ९६१ |
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| यथामृतत्वं देवेश तथा नः कुरु माधव।<br>त्वया विना न तच्छक्यमस्माभिः कैटभार्दन॥ ४८<br>प्राप्तुं तदमृतं नाथ ततोऽग्रे भव नो विभो।<br>इत्युक्तश्च ततो विष्णुरप्रधृष्योऽरिमर्दनः॥ ४९<br>जगाम देवैः सहितो यत्रासौ मन्दराचलः।<br>वेष्टितो भोगिभोगेन धृतश्चामरदानवैः॥ ५०<br>विषभीतास्ततो देवा यतः पुच्छं ततः स्थिताः।<br>मुखतो दैत्यसंघास्तु सैंहिकेयपुरःसराः॥ ५१<br>सहस्रवदनं चास्य शिरः सव्येन पाणिना।<br>दक्षिणेन बलिर्देहं नागस्याकृष्टवांस्तथा॥ ५२<br>दधारामृतमन्थानं मन्दरं चारुकन्दरम्।<br>नारायणः स भगवान् भुजयुग्मद्वयेन तु॥ ५३<br>ततो देवासुरैः सर्वैर्जयशब्दपुरःसरम्।<br>दिव्यं वर्षशतं साग्रं मथितः क्षीरसागरः॥ ५४<br>ततः श्रान्तास्तु ते सर्वे देवा दैत्यपुरःसराः।<br>श्रान्तेषु तेषु देवेन्द्रो मेघो भूत्वाम्बुशीकरान्॥ ५५<br>ववर्षामृतकल्पांस्तान् ववौ वायुश्च शीतलः।<br>भग्नप्रायेषु देवेषु शान्तेषु कमलासनः॥ ५६<br>मथ्यतां मथ्यतां सिन्धुरित्युवाच पुनः पुनः।<br>अवश्यमुद्योगवतां श्रीरपारा भवेत् सदा॥ ५७<br>ब्रह्मप्रोत्साहिता देवा ममन्थुः पुनरम्बुधिम्।<br>भ्राम्यमाणे ततः शैले योजनायुतशेखरे॥ ५८<br>निपेतुर्हस्तियूथानि वराहशरभादयः।<br>श्वापदायुतलक्षाणि तथा पुष्पफलद्रुमाः॥ ५९<br>ततः फलानां वीर्येण पुष्पौषधिरसेन च।<br>क्षीरमम्बुधिजं सर्वं दधिरूपमजायत॥ ६०<br>ततस्तु सर्वजीवेषु चूर्णितेषु सहस्रशः।<br>तदम्बुमेदसोत्सर्गाद् वारुणी समपद्यत॥ ६१<br>वारुणीगन्धमाघ्राय मुमुदुर्देवदानवाः।<br>तदास्वादेन बलिनो देवदैत्यादयोऽभवन्॥ ६२ | समुद्रका मन्थन करना चाहते हैं। भगवान् माधव! हमें जिस उपायसे अमरत्वकी प्राप्ति हो सके, आप वैसा करें। कैटभशत्रो! आपके बिना हमलोग उस अमृतको प्राप्त नहीं कर सकते, अतः सर्वव्यापी नाथ! आप हमलोगोंके अग्रणी बनें।' उनके ऐसा कहनेपर शत्रुनाशक अजेय भगवान् विष्णु देवताओंके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ मन्दराचल था। उस समय वह मन्दराचल शेषनागके फणोंसे लिपटा हुआ था तथा देवता और दानवगण उसे पकड़े हुए थे। उस समय विषके भयसे डरकर देवगण तो नागकी पूँछकी ओर और राहुको अगुआ बनाकर दैत्यगण मुखकी ओर स्थित थे। बलि शेषनागके हजार मुखवाले सिरको बायें हाथसे तथा देहको दाहिने हाथसे पकड़कर खींच रहा था। भगवान् नारायणने सुन्दर कन्दराओंसे सुशोभित अमृतके मन्थन-दण्डस्वरूप मन्दराचलको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़ा। इस प्रकार सभी देवताओं तथा दैत्योंने मिलकर जय-जयकार करते हुए सौ दिव्य वर्षोंसे भी अधिक कालतक क्षीरसागरका मन्थन करते रहे, तब दैत्योंसहित वे सभी देवता थक गये। उन लोगोंके थक जानेपर देवराज इन्द्र मेघरूप धारणकर उनके ऊपर अमृतके समान जलकणोंकी वृष्टि करने लगे और शीतल वायु बहने लगी॥ ४६–५५ १/२ ॥<br><br>उस समय प्रायः सभी देवताओंके शिथिल एवं शान्त हो जानेपर ब्रह्मा पुनः-पुनः इस प्रकार कहने लगे—'अरे! समुद्रका मन्थन करते चलो। उद्योगी पुरुषोंको सदा अपार लक्ष्मी अवश्य प्राप्त होती है।' ब्रह्माद्वारा इस प्रकार उत्साहित किये जानेपर देवासुरगण पुनः समुद्रका मन्थन करने लगे। इसके बाद दस हजार योजन विस्तृत शिखरवाले मन्दराचलके घुमाये जानेपर (उसके शिखरोंपरसे) हाथियोंके समूह, शूकर, अष्टापद शरभ करोड़ों हिंसक पशु आदि तथा पुष्पों और फलोंसे लदे हुए वृक्ष समुद्रमें गिरने लगे। उन गिरे हुए फलोंके सारभाग तथा पुष्पों और ओषधियोंके रससे क्षीरसागरका जल दहीके रूपमें परिवर्तित हो गया। तदनन्तर उन सभी जीवोंके हजारों प्रकारसे चूर्ण हो जानेपर उनकी मज्जा और जलके संयोगसे वारुणी उत्पन्न हुई। उस वारुणीकी गन्धको सूँघकर देवता और दानव परम प्रसन्न हुए और उसके आस्वादनसे वे बलवान् हो गये। |
| ९६२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततोऽतिवेगाज्जगृहुर्नागेन्द्रं सर्वतोऽसुराः ।<br>मन्थानं मन्थयष्टिस्तु मेरुस्तत्राचलोऽभवत् ॥ ६३<br>अभवच्चाग्रतो विष्णुर्भुजमन्दरबन्धनः ।<br>सवासुकिफणालग्नपाणिः कृष्णो व्यराजत ॥ ६४<br>यथा नीलोत्पलैर्युक्तो ब्रह्मदण्डोऽतिविस्तरः ।<br>ध्वनिर्मेघसहस्रस्य जलधेरुत्थितस्तदा ॥ ६५ | तब असुरोंने अत्यन्त वेगपूर्वक मथानी और शेषनागको चारों ओरसे पुनः पकड़ा। उस समय सुमेरु पर्वत मथानीका डंडा बना। भगवान् विष्णुने अग्रसर होकर अपनी भुजासे मन्दराचलको बाँध लिया। उस समय वासुसिके फणोंपर रखा हुआ उनका साँवला हाथ ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो नीले कमलोंसे युक्त अत्यन्त विशाल ब्रह्माण्ड हो। तत्पश्चात् समुद्रसे हजारों मेघकी-सी गर्जना उद्भूत हुई ॥ ५६—६५ ॥ |
| भागे द्वितीये मघवानादित्यस्तु ततः परम् ।<br>ततो रुद्रा महोत्साहा वसवो गुह्यकादयः ॥ ६६<br>पुरतो विप्रचित्तिश्च नमुचिर्वृत्रशम्बरौ ।<br>द्विमूर्धा वज्रदंष्ट्रश्च सैंहिकेयो बलिस्तथा ॥ ६७<br>एते चान्ये च बहवो मुखभागमुपस्थिताः ।<br>ममन्थुरम्बुधिं दृप्ता बलतेजोविभूषिताः ॥ ६८<br>बभूवात्र महाघोषो महामेघरवोपमः ।<br>उदधेर्मथ्यमानस्य मन्दरेण सुरासुरैः ॥ ६९<br>तत्र नानाजलचरा विनिर्धूता महाद्रिणा ।<br>विलयं समुपाजग्मुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७०<br>वारुणानि च भूतानि विविधानि महीधरः ।<br>पातालतलवासीनि विलयं समुपानयत् ॥ ७१<br>तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्रौ संघृष्टाश्च परस्परम् ।<br>न्यपतन् पतगोपेताः पर्वताग्रान्महाद्रुमाः ॥ ७२<br>तेषां संघर्षणाच्चाग्निरर्चिर्भिः प्रज्वलन् मुहुः ।<br>विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमवृणोन्मन्दरं गिरिम् ॥ ७३<br>ददाह कुञ्जरांश्चैव सिंहांश्चैव विनिःसृतान् ।<br>विगतासूनि सर्वाणि सत्त्वानि विविधानि च ॥ ७४ | शेषनागके दूसरे भागमें इन्द्र, उसके बाद आदित्य, उसके बाद महान् उत्साही रुद्रगण, वसुगण तथा गुह्यक आदि थे। आगेकी ओर विप्रचित्ति, नमुचि, वृत्र, शम्बर, द्विमूर्धा, वज्रदंष्ट्र, राहु तथा बलि थे। ये तथा इनके सिवा अन्य बहुत-से राक्षस मुखभागमें उपस्थित थे। बल और तेजसे विभूषित एवं गर्वसे भरे हुए वे सभी समुद्रका मन्थन कर रहे थे। देवताओं और दानवोंद्वारा मन्दराचलकी मथानीसे मन्थन किये जाते हुए समुद्रसे मेघगर्जनके समान भीषण ध्वनि निकलने लगी। वहाँ उस महान् मन्दराचलसे पिसे हुए नाना प्रकारके सैकड़ों-हजारों जलचर नष्ट हो गये। उस पर्वतने वरुणलोकके पाताललोकवासी अनेकों प्रकारके प्राणियोंको विनाशके पथपर पहुँचा दिया। उस पर्वतके घुमाये जाते समय उस मन्दराचलके ऊपर उगे हुए विशाल वृक्ष पक्षियोंसहित परस्परके संघर्षणसे टूट-टूटकर गिर रहे थे। उनके संघर्षणसे उत्पन्न हुई अग्निने बारंबार प्रज्वलित होकर अपनी लपटोंसे मन्दराचलको उसी प्रकार आच्छादित कर लिया, जैसे बिजलियाँ नीले मेघको ढक लेती हैं। उस अग्निने पर्वतसे निकले हुए सिंहों और हाथियोंको तथा अनेकों प्रकारके प्राणरहित सभी जीवोंको भस्म कर दिया ॥ ६६—७४ ॥ |
| तमग्निममरश्रेष्ठः प्रदहन्तमितस्ततः ।<br>वारिणा मेघजेनेन्द्रः शमयामास सर्वतः ॥ ७५ | तब देवश्रेष्ठ इन्द्रने इधर-उधर जलाती हुई उस अग्निको बादलके जलसे चारों ओरसे शान्त कर दिया। |
| ततो नानारसास्तत्र सुस्रुवुः सागराम्भसि ।<br>महाद्रुमाणां निर्यासा बहवश्चौषधीरसाः ॥ ७६<br>तेषाममृतवीर्याणां रसानां पयसैव च ।<br>अमरत्वं सुरा जग्मुः काञ्चनच्छविसंनिभाः ॥ ७७<br>अथ तस्य समुद्रस्य तज्जातमुदकं पयः ।<br>रसान्तरैर्विमिश्रश्च ततः क्षीरादभूद् घृतम् ॥ ७८ | तदनन्तर उस समुद्रके जलमें नाना प्रकारके रस, विशाल वृक्षोंके रस और ओषधियोंके रस अधिक मात्रामें टपकने लगे। उन अमृतके समान गुणकारी रसोंसे युक्त जलसे सुवर्णकी भाँति देदीप्यमान देवगण अमरताको प्राप्त हो गये। समुद्रका जल दुग्धके रूपमें परिणत हो गया था, पुनः अनेक प्रकारके रसोंके मिश्रणसे वह दुग्धसे घृतके |
| * अध्याय २५० * | ९६३ |
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| ततो ब्रह्माणमासीनं देवा वचनमब्रुवन् ।<br>श्रान्ताः स्म सुभृशं ब्रह्मन् नोद्भवत्यमृतं च यत् ॥ ७९<br>ऋते नारायणात् सर्वे दैत्या देवोत्तमास्तथा ।<br>चिरायितमिदं चापि सागरस्य तु मन्थनम् ॥ ८०<br>ततो नारायणं देवं ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ।<br>विधत्स्वैषां बलं विष्णो भवानेव परायणम् ॥ ८१<br><br>विष्णुरुवाच<br>बलं ददामि सर्वेषां कर्मैतद् ये समास्थिताः ।<br>क्षुभ्यतां क्रमशः सर्वैर्मन्दरः परिवर्त्यताम् ॥ ८२ | रूपमें परिवर्तित हो गया। तब वहाँ बैठे हुए ब्रह्मासे देवताओने इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्! हमलोग बहुत थक गये हैं, किंतु जो अभीतक अमृत नहीं निकला, इसका कारण यह है कि भगवान् विष्णुको छोड़कर हम सभी देवगण तथा दैत्यगण समुद्रको मथनेमें देरी कर रहे हैं।' तब ब्रह्माने भगवान् विष्णुसे इस प्रकार कहा—'विष्णो! इन सबको बल प्रदान कीजिये; क्योंकि आप ही इनके शरणदाता हैं' ॥ ७५–८१ ॥<br><br>भगवान् विष्णु बोले—इस मन्थन-कार्यमें जितने लोग सम्मिलित हैं, उन सबको मैं बल प्रदान करता हूँ। अब सभी लोग मिलकर क्रमशः मन्दर पर्वतको घुमायें और सागरको क्षुब्ध करें॥ ८२ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थने एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अमृत-मन्थन नामक दो सौ उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४९ ॥
दो सौ पचासवाँ अध्याय
अमृतार्थ समुद्र-मन्थन करते समय चन्द्रमासे लेकर विषतकका प्रादुर्भाव
| सूत उवाच<br>नारायणवचः श्रुत्वा बलिनस्ते महोदधौ ।<br>तत्पयः सहिता भूत्वा चक्रिरे भृशमाकुलम् ॥ १<br>ततः शतसहस्त्रांशुसमान इव सागरात् ।<br>प्रसन्नाभः समुत्पन्नः सोमः शीतांशुरुज्ज्वलः ॥ २<br>श्रीरनन्तरमुत्पन्ना घृतात् पाण्डुरवासिनी ।<br>सुरादेवी समुत्पन्ना तुरगः पाण्डुरस्तथा ॥ ३<br>कौस्तुभश्च मणिर्दिव्यश्रोत्पन्नोऽमृतसम्भवः ।<br>मरीचिविकचः श्रीमान् नारायण उरोगतः ॥ ४<br>पारिजातश्च विकचकुसुमस्तबकाञ्चितः ।<br>अनन्तरमपश्यंस्ते धूममम्बरसंनिभम् ॥ ५<br>आपूरितदिशाभागं दुःसहं सर्वदेहिनाम् ।<br>तमाघ्राय सुराः सर्वे मूर्च्छिताः परिलम्बिताः ॥ ६ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवान् विष्णुकी बात सुनकर वे बलवान् सम्मिलित होकर उस महासमुद्रमें उसकी जलराशिको अत्यन्त क्षुभित करने लगे। इसके बाद समुद्रसे सौ सूर्योंकी भाँति दीप्तिशाली शीतरश्मि उज्ज्वल चन्द्रमा उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् समुद्रके जलसे* पीले वस्त्रोंसे शोभित लक्ष्मी उत्पन्न हुईं, फिर सुरादेवी तथा पीले रंगका घोड़ा उत्पन्न हुआ। तदनन्तर नारायणके वक्षःस्थलपर शोभित होनेवाली किरणोंसे व्याप्त, शोभा-सम्पन्न तथा अमृतसे उत्पन्न होनेवाली दिव्य कौस्तुभमणि उत्पन्न हुई। पुनः अनेक खिले हुए पुष्पोंके गुच्छोंसे व्याप्त पारिजात प्रकट हुआ। तदुपरान्त देवताओं और दैत्योंने आकाशके समान नीले रंगके धुएँको निकलते हुए देखा, जो सभी दिशाओंमें परिव्याप्त और सभी प्राणियोंके लिये दुःसह था। उसे सँूघकर देवगण मूच्छित |
* निरुक्त ७। २४ और निघण्टु, १। १२ के अनुसार घृतका जल अर्थ वेदोंमें बहुधा युक्त हुआ है। लक्ष्मीके प्राकट्यके समय इसका प्रयोग आवश्यक था।
९६४ * मत्स्यपुराण *
| उपाविशन्नब्धितटे शिरः संगृह्य पाणिना। <br> ततः क्रमेण दुर्वारः सोऽनलः प्रत्यदृश्यत ॥ ७ <br> ज्वालामालाकुलाकारः समन्ताद् भीषणोऽर्चिषा। <br> तेनाग्निना परिक्षिप्ताः प्रायशस्तु सुरासुराः ॥ ८ <br> दग्धाश्चाप्यर्धदग्धाश्च बभ्रमुः सकला दिशः। <br> प्रधाना देवदैत्याश्च भीषितास्तेन वह्निना ॥ ९ <br> अनन्तरं समुद्भूतास्तस्माड्डुण्डुभजातयः। <br> कृष्णसर्पा महादंष्ट्रा रक्ताश्च पवनाशनाः ॥ १० <br> श्वेतपीतास्तथा चान्ये तथा गोनसजातयः। <br> मशका भ्रमरा दंशा मक्षिकाः शलभास्तथा ॥ ११ <br> कर्णशल्याः कृकलासा अनेके चैव बभ्रमुः। <br> प्राणिनो दंष्ट्रिणो रौद्रास्तथा हि विषजातयः ॥ १२ <br> शार्ङ्गहालाहलामुस्तवत्साकागुरुभस्मगाः । <br> नीलपत्रादयश्चान्ये शतशो बहुभेदिनः। <br> येषां गन्धेन दह्यन्ते गिरिशृङ्गाण्यपि द्रुतम्॥ १३ | होकर गिरने लगे और हाथसे सिरको पकड़कर समुद्र-तटपर बैठ गये। तदनन्तर क्रमशः वह दुःसह अग्नि दिखायी पड़ी। उसका आकार ज्वालाओंसे व्याप्त था तथा चारों ओर फैली हुई लपटोंसे वह भीषण लग रही थी। उस अग्निसे प्रायः सभी देवता और दानवगण विक्षिप्त हो उठे और कुछ जले तथा कुछ अधजले हुए सभी दिशाओंमें घूमने लगे। इस प्रकार सभी प्रधान देव तथा दैत्यगण उस अग्निसे भयभीत हो गये। कुछ देरके बाद उस अग्निसे डुण्डुभ जातिके सर्प उत्पन्न हुए। उसी प्रकार काले, विशाल दाढ़ोंवाले, लाल, वायु पीकर रहनेवाले, श्वेत, पीले तथा अन्य गोनस जातिवाले सर्प तथा मशक, भ्रमर, डाँसा, मक्खियाँ, पतंगे, कर्णशल्य, गिरगिट आदि अनेकों जीव उत्पन्न होकर इधर-उधर घूमने लगे। इनके अतिरिक्त अति भीषण दाढ़ोंवाले बहुत-से जीव तथा विषकी अनेकों जातियाँ उत्पन्न हुईं—जैसे शार्ङ्ग, हालाहल, मुस्त, वत्स, अगुरु, भस्म और नील-पत्र आदि। इसी प्रकार अन्य सैकड़ों भेदोपभेदवाले विष उत्पन्न हुए, जिनकी गन्धसे पर्वतोंके शिखर भी तुरंत ही जलने लगे॥ १—१३॥ | | अनन्तरं नीलरसौघभृङ्ग- <br> भिन्नाञ्जनाभं विषमं श्वसन्तम्। <br> कायेन लोकान्तरपूरकेण <br> केशैश्च वह्निप्रतिमैर्ज्वलद्भिः ॥ १४ <br> सुवर्णमुक्ताफलभूषिताङ्गं <br> किरीटिनं पीतदुकूलजुष्टम्। <br> नीलोत्पलाभं कुसुमैः कृतार्थं <br> गर्जन्तमम्भोधरभीमवेगम् ॥ १५ <br> अद्राक्षुरम्भोनिधिमध्यसंस्थं <br> सविग्रहं देहिभयाश्रयं तम्। <br> विलोक्य तं भीषणमुग्रनेत्रं <br> भूताश्च वित्र्रेसुरथापि सर्वे ॥ १६ <br> केचिद् विलोक्यैव गता ह्यभावं <br> निःसंज्ञतां चाप्यपरे प्रपन्नाः। <br> वेमुर्मुखेभ्योऽपि च फेनमन्ये <br> केचित् त्ववाप्ता विषमामवस्थाम् ॥ १७ <br> श्वासेन तस्य निर्दग्धास्ततो विष्ण्विन्द्रदानवाः। <br> दग्धाङ्गारनिभा जाता ये भूता दिव्यरूपिणः। <br> ततस्तु सम्भ्रमाद् विष्णुस्तमुवाच सुरात्मकम्॥ १८ | तदनन्तर देवताओं और दानवोंने सागरके मध्यमें स्थित एक ऐसा स्वरूप देखा, जिसकी शरीर-कान्ति नीलरस, भ्रमर और घिसे हुए अञ्जनके समान काली थी, जो विषमरूपसे श्वास ले रहा था और शरीरसे लोकान्तरको व्याप्त कर लिया था, जिसके केश जलती हुई अग्निके समान दिखायी पड़ रहे थे, जिसका शरीर सुवर्ण और मोतियोंसे विभूषित था, जो किरीट धारण किये हुए था, जिसके शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था और देहकी कान्ति नीले कमलके समान थी, जो पुष्पोंद्वारा अलंकृत और मेघकी तरह अत्यन्त भयंकर रूपसे गर्जना कर रहा था तथा प्राणियोंके लिये शरीरधारी भयका आश्रयस्थान था। उस भीषण एवं उग्र नेत्रवाले स्वरूपको देखकर सभी प्राणी भयभीत हो उठे। कितने तो देखते ही चल बसे, कितने मूर्च्छित हो गये, कुछ मुखसे फेन उगलने लगे और कुछ लोग विषम अवस्थाको प्राप्त हो गये। उसकी श्वाससे विष्णु, इन्द्र और दानव—सभी जलने लगे। थोड़ी देर पहले जो दिव्य रूपवाले थे, वे जले हुए अंगारके समान हो गये। तब भगवान् विष्णुने भयभीत होकर उस सुरात्मकसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १४—१८॥ |
| * अध्याय २५० * | ९६५ |
|---|
| श्रीभगवानुवाच | श्रीभगवान्ने पूछा— यमराजके समान आप कौन हैं? क्या चाहते हैं? और कहाँसे आ रहे हैं? क्या करनेसे आपकी कामना पूर्ण होगी? ये सभी बातें मुझे बताइये। भगवान् विष्णुकी वह बात सुनकर कालाग्निके समान भयंकर एवं फटी हुई दुन्दुभिके समान बोलनेवाला कालकूट बोला॥ १९-२०॥ | | को भवानन्तकप्रख्यः किमिच्छसि कुतोऽपि च।<br>किं कृत्वा ते प्रियं जायेदेवमाचक्ष्व मेऽखिलम्॥ १९<br>तच्च तस्य वचः श्रुत्वा विष्णोः कालाग्निसंनिभः।<br>उवाच कालकूटस्तु भिन्नदुन्दुभिनिःस्वनः॥ २० | | | कालकूट उवाच | कालकूटने कहा— विष्णो! मैं समुद्रसे उत्पन्न हुआ कालकूट नामक विष हूँ। जब परस्पर एक-दूसरेके वधके अभिलाषी देवता तथा दैत्योंद्वारा उग्र वेगसे अद्भुत क्षीरसागर मथा गया, तब मैं उन सभी देवताओं और दानवोंका संहार करनेके लिये उत्पन्न हुआ हूँ। मैं क्षणभरमें ही सभी शरीरधारियोंका संहार कर सकता हूँ। अतः ये सभी लोग या तो मुझे निगल जायें अथवा शंकरकी शरणमें जायें। कालकूटकी वह बात सुनकर देवता और असुर भयभीत हो गये, तब वे ब्रह्मा और विष्णुको आगे करके शंकरजीके पास जानेके लिये प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचनेपर द्वारपाल गणेश्वरोंने जाकर शिवजीसे देवताओं और दैत्योंके आगमनकी सूचना दी। तब शंकरजीसे आज्ञा पाकर वे लोग शिवजीके निकट मन्दराचलकी उस सुवर्णमयी गुफामें गये, जो मुक्तामणयोंसे विभूषित थी, जिसमें स्वच्छ मणिजटित सीढ़ियाँ लगी थीं और जो वैदूर्य मणिके स्तम्भसे शोभायमान थी। वहाँ ब्रह्माजीको आगे कर सभी देवताओं और असुरोंने पृथिवीपर घुटने टेककर शिवजीको (पञ्चाङ्ग) नमस्कार किया और फिर वे इस स्तोत्रका पाठ करने लगे॥ २१-२७॥ | | अहं हि कालकूटाख्यो विषोऽम्बुधिसमुद्भवः।<br>यदा तीव्रतरारम्भैः परस्परवधैषिभिः॥ २१<br>सुरासुरैर्विमथितो दुग्धाम्भोनिधिरद्भुतः।<br>सम्भूतोऽहं तदा सर्वान् हन्तुं देवान् सदानवान्॥ २२<br>सर्वानिह हनिष्यामि क्षणमात्रेण देहिनः।<br>मां वा ग्रसत वै सर्वे यात वा गिरिशान्तिकम्॥ २३<br>श्रुत्वैतद् वचनं तस्य ततो भीताः सुरासुराः।<br>ब्रह्मविष्णू पुरस्कृत्य गतास्ते शङ्करान्तिकम्॥ २४<br>निवेदितास्ततो द्वाःस्थैस्ते गणैशैः सुरासुराः।<br>अनुज्ञाताः शिवेनाथ विविशुर्गिरिशान्तिकम्॥ २५<br>मन्दरस्य गुहां हैमीं मुक्तामणिविभूषिताम्।<br>सुस्वच्छमणिसोपानां वैदूर्यस्तम्भमण्डिताम्॥ २६<br>तत्र देवासुरैः सर्वैर्जानुभिर्धरणिं गतैः।<br>ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा इदं स्तोत्रमुदाहृतम्॥ २७ | | | देवदानवा ऊचुः | देवताओं और दानवोंने कहा— विरूपाक्ष! आपको नमस्कार है। दिव्य नेत्रधारी आपको प्रणाम है। आप अपने हाथोंमें पिनाक, वज्र और धनुष धारण करनेवाले हैं, आपको अभिवादन है। हाथमें त्रिशूल और दण्ड धारण करनेवाले जटाधारीको नमस्कार है। आप त्रिलोकीनाथ और प्राणिसमूहके शरीररूप हैं, आपको प्रणाम है। देव-शत्रुओंका संहार करनेवाले तथा चन्द्रमा, अग्नि और सूर्यरूप नेत्र धारण करनेवालेको अभिवादन है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप आपको नमस्कार है। आप ब्रह्मस्वरूप, वेदस्वरूप और देवरूप हैं, आपको प्रणाम है। आप सांख्ययोगस्वरूप और प्राणियोंका कल्याण करनेवाले हैं, आपको अभिवादन है। कामदेवके शरीरके विनाशक और कालके क्षयकर्ता आपको नमस्कार है। आप वेगशाली, देवाधिदेव और वसुरेता हैं, आपको प्रणाम है। सर्वश्रेष्ठ | | नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्ते दिव्यचक्षुषे।<br>नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय धन्विने॥ २८<br>नमस्त्रिशूलहस्ताय दण्डहस्ताय धूर्जटे।<br>नमस्त्रैलोक्यनाथाय भूतग्रामशरीरिणे॥ २९<br>नमः सुरारिहन्त्रे च सोमाग्न्यर्काग्र्यचक्षुषे।<br>ब्रह्मणे चैव रुद्राय नमस्ते विष्णुरूपिणे॥ ३०<br>ब्रह्मणे वेदरूपाय नमस्ते देवरूपिणे।<br>सांख्ययोगाय भूतानां नमस्ते शम्भवाय ते॥ ३१<br>मन्मथाङ्गविनाशाय नमः कालक्षयंकर।<br>रंहसे देवदेवाय नमस्ते वसुरेतसे॥ ३२ | |
९६६ * मत्स्यपुराण *
| एकवीराय शर्वाय नमः पिङ्गकपर्दिने।<br>उमाभर्त्रे नमस्तुभ्यं यज्ञत्रिपुरघातिने॥ ३३<br>शुद्धबोधप्रबुद्धाय मुक्तकैवल्यरूपिणे।<br>लोकत्रयविधात्रे च वरुणोन्द्राग्निरूपिणे॥ ३४<br>ऋग्यजुःसामरूपाय पुरुषायेश्वराय च।<br>अग्र्याय चैव चोग्राय विप्राय श्रुतिचक्षुषे॥ ३५<br>रजसे चैव सत्त्वाय तमसे तिमिरात्मने।<br>अनित्यनित्यभावाय नमो नित्यचरात्मने॥ ३६<br>व्यक्ताय चैवाव्यक्ताय व्यक्ताव्यक्ताय वै नमः।<br>भक्तानामार्तिनाशाय प्रियनारायणाय च॥ ३७<br>उमाप्रियाय शर्वाय नन्दिवक्त्राञ्चिताय च।<br>ऋतुमन्वन्तरकल्पाय पक्षमासदिनात्मने॥ ३८<br>नानारूपाय मुण्डाय वरूथपृथुदण्डिने।<br>नमः कपालहस्ताय दिग्वासाय शिखण्डिने॥ ३९<br>धन्विने रथिने चैव यतये ब्रह्मचारिणे।<br>इत्येवमादिचरितैः स्तुतं तुभ्यं नमो नमः॥ ४०<br>एवं सुरासुरैः स्थाणुः स्तुतस्तोषमुपागतः।<br>उवाच वाक्यं भीतानां स्मितान्वितशुभाक्षरम्॥ ४१ | वीर, सर्वस्वरूप और पीले रंगकी जटा धारण करनेवालेको अभिवादन है। उमाके पति तथा यज्ञ एवं त्रिपुरका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप शुद्ध ज्ञानसे परिपूर्ण, मुक्त कैवल्यरूप, तीनों लोकोंके विधाता, वरुण, इन्द्र और अग्निके स्वरूप, ऋक्, यजुः और सामवेदरूप, पुरुषोत्तम, परमेश्वर, सर्वश्रेष्ठ, भयंकर, ब्राह्मणस्वरूप, श्रुतिरूप नेत्रवाले, सत्त्व, रजस्, तमस्—तीनों गुणोंसे युक्त अन्धकारस्वरूप, अनित्य और नित्य भावसे सम्पन्न तथा नित्यचरात्मा हैं। आपको प्रणाम है। आप व्यक्त, अव्यक्त और व्यक्ताव्यक्त हैं, आपको अभिवादन है। आप भक्तोंकी पीड़ाके विनाशक, नारायणके मित्र, उमाके प्रियतम, संहारकर्ता, नन्दीके मुखसे सुशोभित, मन्वन्तर-कल्प-ऋतु-मास-पक्ष-दिनरूप, अनेक रूपधारी, मुण्डित सिरवाले, स्थूल दण्ड और कवच धारण करनेवाले, खप्परधारी, दिगम्बर, चूडाधारी, धनुषधारी, महारथी, संन्यासी और ब्रह्मचारी हैं, आपको नमस्कार है। इस प्रकारके अनेकों चरित्रोंसे स्तुत होनेवाले आपको बारंबार प्रणाम है। इस प्रकार देवासुरोंद्वारा स्तवन किये जानेपर शंकरजी प्रसन्न हो गये। तब वे उन भयभीत देवासुरोंसे मुसकराते हुए सुन्दर अक्षरोंसे युक्त वचन बोले॥ २८-४१॥ |
| श्रीशंकर उवाच<br>किमर्थमागता ब्रूत त्रासम्लानमुखाम्बुजाः।<br>किं वाभीष्टं ददाम्यद्य कामं प्रब्रूत मा चिरम्।<br>इत्युक्तास्ते तु देवेन प्रोचुस्तं ससुरासुराः॥ ४२ | **भगवान् श्रीशंकरने कहा—**देवता एवं दानवो! तुम्हारे मुखकमल भयके कारण मलिन दीख रहे हैं, बतलाओ, तुमलोग यहाँ किसलिये आये हो? मैं आज तुमलोगोंको कौन-सी अभीष्ट वस्तु दूँ, यह निर्भय होकर बतलाओ, देर मत करो। भगवान् शंकरद्वारा ऐसा कहे जानेपर देवासुरोंने उनसे इस प्रकार कहा॥ ४२॥ |
| सुरासुरा ऊचुः<br>अमृतार्थे महादेव मथ्यमाने महोदधौ।<br>विषमद्भुतमुद्भूतं लोकसंक्षयकारकम्॥ ४३<br>स उवाचाथ सर्वेषां देवानां भयकारकः।<br>सर्वान् वो भक्षयिष्यामि अथवा मां पिबन्त्वथ॥ ४४<br>तमशक्ता वयं ग्रस्तुं सोऽस्माञ्शक्तो बलोत्कटः।<br>एष निःश्वासमात्रेण शतपर्वसमद्युतिः॥ ४५<br>विष्णुः कृष्णः कृतस्तेन यमश्च विषमात्मवान्।<br>मूर्च्छिताः पतिताश्चान्ये विप्रणाशं गताः परे॥ ४६ | **देवासुर बोले—**महादेव! अमृतके लिये महासागरको मथते समय अद्भुत विष उत्पन्न हुआ है, जो सभी लोकोंका विनाश करनेवाला है। सभी देवताओंको भयभीत करनेवाले उस विषने स्वयं कहा है कि 'मैं तुम सभीको खा जाऊँगा, अन्यथा तुमलोग मुझे पी जाओ।' ऐसी दशामें हमलोग उस विषको पान करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं, किंतु वह महाबली विष हमलोगोंको खा सकता है। उसने अपने निःश्वासमात्रसे सैकड़ों चन्द्रमाके समान कान्तिमान् भगवान् विष्णुको कृष्णवर्ण तथा यमराजको विक्षिप्त कर दिया है। कुछ लोग मूर्छित हो गये हैं और कुछ नष्ट हो गये। |
* अध्याय २५० * ९६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अर्थोऽनर्थक्रियां याति दुर्भागाणां यथा विभो।<br>दुर्बलानां च संकल्पो यथा भवति चापदि ॥ ४७<br>विषमेतत् समुद्भूतं तस्माद् वामृतकाङ्क्षया।<br>अस्माद् भयान्मोचय त्वं गतिस्त्वं च परायणम् ॥ ४८<br>भक्तानुकम्पी भावज्ञो भुवनादीश्वरो विभुः।<br>यज्ञाग्रभुक् सर्वहविः सौम्यः सोमः स्मरान्तकृत् ॥ ४९<br>त्वमेको नो गतिर्देव गीर्वाणगणशर्मकृत्।<br>रक्षास्मान् भक्षसंकल्पाद् विरूपाक्ष विषज्वरात् ॥ ५०<br>तच्छ्रुत्वा भगवानाह भगनेत्रान्तकृद् भवः ॥ ५१ | भगवन् ! जिस प्रकार अभागोंके अर्थ भी अनर्थके कारण बन जाते हैं तथा आपत्तिकालमें दुर्बलोंके संकल्प विपरीत फल देनेवाले हो जाते हैं, उसी प्रकार अमृतकी अभिलाषासे युक्त हमलोगोंके लिये यह विष उत्पन्न हुआ है। अतः आप इस भयसे हमलोगोंको मुक्त कीजिये, आप ही एकमात्र हम सबके शरणदाता हैं। आप भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले, मनके भावोंके ज्ञाता, सभी भुवनोंके ईश्वर, सर्वव्यापक, यज्ञोंमें सर्वप्रथम भाग ग्रहण करनेवाले, सकल हवनीय द्रव्यस्वरूप, सौम्य, उमाके साथ स्थित और कामदेवके विनाशक हैं। देवताओंका कल्याण करनेवाले देव ! एकमात्र आप ही हमलोगोंके शरणदाता हैं। विरूपाक्ष! (सबको) खा लेनेके विचारवाले इस विषके कष्टसे हमलोगोंकी रक्षा कीजिये। यह सुनकर भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले भगवान् शंकरने कहा॥ ४७—५१॥ |
| देवदेव उवाच<br>भक्षयिष्याम्यहं घोरं कालकूटं महाविषम्।<br>तथान्यदपि यत्कृत्यं कृच्छ्रसाध्यं सुरासुराः।<br>तच्चापि साधयिष्यामि तिष्ठध्वं विगतज्वराः ॥ ५२ | **देवाधिदेव बोले—**देवासुरगण! मैं उस कालकूट नामक महान् भयंकर विषको तो पी ही जाऊँगा, इसके अतिरिक्त तुमलोगोंका जो कोई अन्य भी कष्टसाध्य कार्य होगा, उसे भी सिद्ध कर दूँगा, तुम लोग चिन्तारहित हो जाओ। |
| इत्युक्ता हृष्टरोमाणो वाष्पगद्गदकण्ठिनः।<br>आनन्दाश्रुपरीताक्षाः सनाथा इव मेनिरे।<br>सुरा ब्रह्मादयः सर्वे समाश्वस्ताः सुमनासाः ॥ ५३ | इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंका मन प्रसन्न हो गया, वे भलीभाँति आश्वस्त हो गये, उनके शरीर रोमाञ्चित हो उठे, कण्ठ आँसुओंसे गद्गद हो गये, नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छलक आये और वे उस समय अपनेको सनाथ मानने लगे। |
| ततोऽव्रजद् द्रुतगतिना ककुद्मिना<br>हरोऽम्बरे पवनगतिर्जगत्पतिः।<br>प्रधावितैरसुरसुरेन्द्रनायकैः<br>स्ववाहनैर्विचलितशुभ्रचामरैः।<br>पुरःसरैः स तु शुशुभे शुभाश्रयैः<br>शिवो वशी शिखिकपिशोर्ध्वजूतकः ॥ ५४ | तदनन्तर जगत्पति भगवान् शंकर वेगशाली नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ होकर वायुके समान वेगसे आकाशमार्गसे उस ओर चले। उस समय असुरों तथा सुरोंके अधिपतिगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो चमर डुलाते हुए उनके आगे-आगे दौड़ रहे थे। इस प्रकार अग्निकी ज्वालासे भूरे रंगवाली जटासे युक्त इन्द्रियजयी भगवान् शिव मङ्गलके आधारस्वरूप उन देवताओंके साथ शोभायमान हो रहे थे। |
| आसाद्य दुग्धसिन्धुं तं कालकूटं विषं यतः।<br>ततो देवो महादेवो विलोक्य विषमं विषम् ॥ ५५<br>छायास्थानकमास्थाय सोऽपिबद् वामपाणिना।<br>पीयमाने विषे तस्मिंस्ततो देवा महासुराः ॥ ५६<br>जगुश्च ननृतुश्चापि सिंहनादांश्च पुष्कलान्।<br>चक्रुः शक्रमुखाद्याश्च हिरण्याक्षादयस्तथा ॥ ५७ | तदनन्तर वे जहाँसे कालकूट विष उत्पन्न हुआ था, उस क्षीरसागरपर पहुँचे। तत्पश्चात् भगवान् महादेवने उस विषम विषको देखकर एक छायायुक्त स्थानमें बैठकर अपने बायें हाथसे उसे पी लिया। उस विषके पी लिये जानेपर इन्द्रादि देव तथा हिरण्याक्ष प्रभृति असुर हर्षपूर्वक नाचने-गाने और भयंकर सिंहनाद |
९६८ * मत्स्यपुराण *
| स्तुवन्तश्चैव देवेशं प्रसन्नाश्चाभवंस्तदा।<br>कण्ठदेशे ततः प्राप्ते विषे देवमथाब्रुवन्॥ ५८<br>विरिञ्चिप्रमुखा देवा बलिप्रमुखतोऽसुराः।<br>शोभते देव कण्ठस्ते गात्रे कुन्दनिभप्रभे॥ ५९<br>भृङ्गमालानिभं कण्ठेऽप्यत्रैवास्तु विषं तव।<br>इत्युक्तः शंकरो देवस्तथा प्राह पुरान्तकृत्॥ ६०<br>पीते विषे देवगणान् विमुच्य<br>गतो हरो मन्दरशैलमेव।<br>तस्मिन् गते देवगणाः पुनस्तं<br>ममन्थुरब्धिं विविधप्रकारैः॥ ६१॥ | करने लगे तथा देवेशकी स्तुति करते हुए प्रसन्न हो गये। उस समय विषके भगवान् शंकरके गलेमें पहुँचनेपर ब्रह्मादि देवता और बलि आदि असुरोंने उनसे इस प्रकार कहा—'देव! कुन्दकी-सी उज्ज्वल कान्तिवाले आपके शरीरमें कण्ठकी विचित्र शोभा हो रही है। अब यह भृङ्गावलीकी भाँति काला विष यहीं आपके कण्ठमें स्थित रहे।' इस प्रकार कहे जानेपर त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरने 'तथास्तु—वैसा ही हो' यों कहकर उसे स्वीकार कर लिया। इस प्रकार विषपान कर लेनेके बाद शंकरजी देवताओंको वहीं छोड़ पुनः मन्दराचलको चले गये। उनके चले जानेपर देवगण पुनः उस समुद्रको विविध प्रकारसे मथने लगे॥ ५२–६१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थने कालकूटोत्पत्तिर्नाम पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अमृतमन्थन-प्रसंगमें कालकूटोत्पत्ति नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५०॥
दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय
अमृतका प्राकट्य, मोहिनीरूपधारी भगवान् विष्णुद्वारा देवताओंका अमृत-पान तथा देवासुरसंग्राम
| सूत उवाच<br>मथ्यमाने पुनस्तस्मिञ्जलधौ समदृश्यत।<br>धन्वन्तरिः स भगवानायुर्वेदप्रजापतिः॥ १<br>मदिरा चायताक्षी सा लोकचित्तप्रमाथिनी।<br>ततोऽमृतं च सुरभिः सर्वभूतभयापहा॥ २<br>जग्राह कमलां विष्णुः कौस्तुभं च महामणिम्।<br>गजेन्द्रं च सहस्राक्षो हयरत्नं च भास्करः॥ ३<br>धन्वन्तरिं च जग्राह लोकारोग्यप्रवर्तकम्।<br>छत्रं जग्राह वरुणः कुण्डले च शचीपतिः॥ ४<br>पारिजाततरुं वायुर्जग्राह मुदितस्तथा।<br>धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत॥ ५<br>श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति।<br>एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा दानवानां समुत्थितः॥ ६<br>अमृतार्थे महानादो ममेदमिति जल्पताम्।<br>ततो नारायणो मायामास्थितो मोहिनीं प्रभुः॥ ७<br>स्त्रीरूपमतुलं कृत्वा दानवानभिसंसृतः।<br>ततस्तदमृतं तस्यै ददुस्ते मूढचेतनाः।<br>स्त्रियै दानवदैतेयाः सर्वे तद्गतमानसाः॥ ८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पुनः उस समुद्रके मथे जानेपर आयुर्वेदके प्रजापति भगवान् धन्वन्तरि दीख पड़े। पुनः लोगोंके चित्तको उन्मत्त कर देनेवाली एवं बड़ी आँखोंवाली मदिरा उत्पन्न हुई। तदनन्तर अमृत प्रकट हुआ, फिर सभी प्राणियोंके भयको दूर करनेवाली कामधेनु उत्पन्न हुई। उस समय भगवान् विष्णुने लक्ष्मी और महामणि कौस्तुभको तथा हजार नेत्रोंवाले इन्द्रने गजराज ऐरावतको ग्रहण किया। सूर्यने अश्वरत्न उच्चैःश्रवा और लोकमें आरोग्यके प्रवर्तक धन्वन्तरिको स्वीकार किया। वरुणने छत्रको और शचीपति इन्द्रने दोनों कुण्डलोंको ग्रहण किया। वायुदेवने बड़ी प्रसन्नतासे पारिजात वृक्षको ग्रहण किया। इसके बाद शरीरधारी धन्वन्तरि उठकर खड़े हुए। वे एक श्वेतवर्णका कमण्डलु धारण किए हुए थे, जिसमें अमृत भरा था। उस अत्यन्त अद्भुत पात्रको देखकर अमृतके लिये 'यह मेरा है, यह मेरा है' ऐसा बकनेवाले दानवोंके दलमें महान् कोलाहल मच गया। तब भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय लिया। वे स्त्रीका अनुपम रूप धारण कर दानवोंके समीप उपस्थित हुए। तब उन मुग्ध चित्तवाले दैत्योंनं उस अमृतको उस स्त्रीके हाथोंमें समर्पित कर दिया; क्योंकि उन सभी |
| * अध्याय २५१ * | ९६९ |
|---|---|
| अथास्त्राणि च मुख्यानि महाप्रहरणानि च।<br>प्रगृह्याभ्यद्रवन् देवान् सहिता दैत्यदानवाः॥ ९<br><br>ततस्तदमृतं देवो विष्णुरादाय वीर्यवान्।<br>जहार दानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः॥ १० | दैत्यों और दानवोंका मन उसपर मोहित हो गया था। तदनन्तर वे सभी दैत्य-दानव संगठित होकर मुख्य-मुख्य महान् शस्त्रास्त्रोंको लेकर देवताओंपर टूट पड़े। इस समय नरके साथ-साथ पराक्रमी एवं सामर्थ्यशाली भगवान् विष्णुने उस अमृतको दानवेन्द्रोंसे छीन लिया॥ ९-१०॥ |
| ततो देवगणाः सर्वे पपुस्तदमृतं तदा।<br>विष्णोः सकाशात् सम्प्राप्य संग्रामे तुमुले सति॥ ११ | तदनन्तर सभी देवता उस तुमुल युद्धके बीच ही विष्णु भगवान्से उस अमृतको लेकर पान करने लगे। |
| ततः पिबत्सु तत्कालं देवेष्वमृतमीप्सितम्।<br>राहुर्विबुधरूपेण दानवोऽप्यपिबत् तदा॥ १२ | उस अभिलषित अमृतको पीते समय देवताओंके मध्यमें देवरूपधारी राहु नामक दानव भी अमृतका पान करने लगा। |
| तस्य कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा।<br>आख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया॥ १३ | वह अमृत उसके कण्ठदेशतक ही पहुँच पाया था कि देवताओंकी कल्याण-भावनासे प्रेरित होकर चन्द्रमा और सूर्यने उसके भेदको प्रकट कर दिया। |
| ततो भगवता तस्य शिरश्छिन्नमलंकृतम्।<br>चक्रायुधेन चक्रेण पिबतोऽमृतमोजसा॥ १४ | तब अमृत पीते हुए उस दानवके अलंकृत सिरको भगवान्ने अपने पराक्रमसे चक्रद्वारा काट दिया। |
| तच्छैलशृङ्गप्रतिमं दानवस्य शिरो महत्।<br>चक्रेणोत्कृत्तमपतच्चालयद् वसुधातलम्॥ १५ | फिर तो उस दानवका चक्रसे कटा हुआ पर्वतशिखरकी भाँति विशाल मस्तक वसुधातलको कँपाता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। |
| ततो वैरविनिर्बन्धः कृतो राहुमुखेन वै।<br>शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां प्रसह्माद्यापि बाधते॥ १६ | तभीसे राहुके उस मुखने चन्द्रमा और सूर्यके साथ अटूट वैर निश्चित कर दिया, जो आज भी उन्हें पीड़ा पहुँचाता है। |
| विहाय भगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः।<br>नानाप्रहरणैर्भीमैर्दानवान् समकम्पयत्।<br>प्रासाः सुविपुलास्तीक्ष्णाः पतन्तश्च सहस्रशः॥ १७ | तत्पश्चात् विष्णु भी उस अनुपम स्त्रीरूपको त्यागकर विविध प्रकारके भयंकर शस्त्रास्त्रोंद्वारा दानवोंको प्रकम्पित करने लगे। उस समय विशाल और तीखी धारवाले हजारों भाले दानवोंपर गिरने लगे। |
| तेऽसुराश्चक्रनिर्भिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु।<br>अशिशक्तिगदाभिन्ना निपेतुर्धरणीतले॥ १८ | भगवान्के चक्रसे छिन्न-भिन्न अङ्गोंवाले राक्षसगण अत्यधिक रक्त वमन करते हुए तलवार और गदाके प्रहारसे घायल होकर पृथ्वीतलपर गिरने लगे। |
| भिन्नानि पट्टिशैश्चापि शिरांसि युधि दारुणैः।<br>तप्तकाञ्चनमाल्यानि निपेतुर्निशं तदा॥ १९ | उस समय उस युद्धमें तपाये हुए स्वर्णकी मालाओंसे सुशोभित असुरोंके सिर भीषण पट्टिशोंके प्रहारसे विदीर्ण होकर निरन्तर गिर रहे थे। |
| रुधिरेणावलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः।<br>अद्रिणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते॥ २० | वहाँ रक्तसे लथपथ हुए अङ्गोंवाले मारे गये महान् असुर गेरूसे रँगे हुए पर्वतोंके शिखरोंकी भाँति सो रहे थे। |
| ततो हलहलाशब्दः सम्बभूव समन्ततः।<br>अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति॥ २१ | तदनन्तर सूर्यके लाल हो जानेपर परस्पर एक-दूसरेको शस्त्रोंद्वारा काटनेवालोंका महान् कोलाहल चारों ओर गूँज उठा। |
| परिघैश्चायसैः पातैः सन्निकर्षैश्च मुष्टिभिः।<br>निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत्॥ २२ | उस समरमें लोहनिर्मित परिघों और मुष्टियोंके प्रहारसे एक-दूसरेको मारनेवालोंका शब्द आकाश-मण्डलका स्पर्श-सा कर रहा था। |
| छिन्धि भिन्धि प्रधावेति पातयाभिसरेति वै।<br>विश्रूयन्ते महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः॥ २३ | उस समय वहाँ चारों ओर 'काट डालो, विदीर्ण कर दो, दौड़ो, गिरा दो, आगे बढ़ो'— इस प्रकारके महान् भयंकर शब्द सुनायी पड़ रहे थे। |
९७० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये।<br>नरनारायणौ देवौ समाजग्मतुराहवम्॥ २४<br>तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि।<br>चिन्तयामास वै चक्रं विष्णुर्दानवसूदनः॥ २५ | इस प्रकार महान् भयंकारक घमासान युद्धके चलते समय भगवान् नर-नारायण युद्धस्थलमें उपस्थित हुए। वहाँ नरके दिव्य धनुषको देखकर दैत्यसूदन भगवान् नारायणने भी अपने सुदर्शन चक्रका स्मरण किया॥ १९–२५॥ |
| ततोऽम्बराच्चिन्तितमात्रमागतं<br>महाप्रभं चक्रममित्रनाशनम्।<br>विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं<br>सुदर्शनं भीममसह्यविक्रमम् ॥ २६ | तदनन्तर स्मरण करते ही वह असह्य प्रभावशाली, अत्यन्त कान्तिमान्, शत्रुनाशक, सूर्यके समान तेजस्वी, विस्तृत मण्डलोंवाला भयंकर सुदर्शन चक्र आकाशमार्गसे नीचे उतरा। |
| तदागतं ज्वलितहुताशनप्रभं<br>भयंकरः करिकरबाहुरच्युतः।<br>महाप्रभं दनुकुलदैत्यदारणं<br>तथोज्ज्वलज्ज्वलनसमानविग्रहम् ॥ २७ | तब हाथीकी शुण्डके समान बाहुवाले उग्र वेगशाली भगवान् विष्णुने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी दानवकुलसंहारक धधकती हुई अग्निके सदृश शरीरवाले परम कान्तिशाली भयंकर चक्रको आया हुआ देखकर उसे दैत्यसेनापर चला दिया। फिर तो रिपुके |
| मुमोच वै तदतुलमुग्रवेगवान्<br>महाप्रभं रिपुनगरावदारणम्।<br>संवर्तकज्वलनसमानवर्चसं<br>पुनःपुनर्न्यपतत वेगवत् तदा॥ २८ | नगरोंका विध्वंस करनेवाला, संवर्तक नामक प्रलयाग्निके समान तेजस्वी, अनुपम कान्तिमान् वह सुदर्शन चक्र बारंबार वेगपूर्वक शत्रुओंपर प्रहार करने लगा। |
| व्यदारयद् दितितनयान् सहस्रशः<br>करेरितं पुरुषवरेण संयुगे।<br>दहत् क्वचिज्ज्वलन इवानिलेरितः<br>प्रसह्य तानसुरगणानकृन्तत ॥ २९ | युद्धभूमिमें पुरुषोत्तमके हाथसे छोड़े गये उस चक्रने हजारों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उसने वायुसे प्रेरित अग्निकी भाँति कहीं सेनाओंको भस्म कर दिया तो कहीं उन असुरोंको बलपूर्वक काट डाला। |
| तत्प्रेरितं वियति मुहुः क्षितौ तदा<br>पपौ रणे रुधिरमथो पिशाचवत्।<br>अथासुरा गिरिभिरदीनमानसा<br>मुहुर्मुहुः सुरगणममर्दयंस्तदा ॥ ३० | रणभूमिमें भगवान्के हाथसे प्रेरित वह सुदर्शन चक्र बारंबार आकाशमें तथा पृथ्वीतलपर पिशाचके समान रक्तपान करने लगा। इसके बाद निर्भय चित्तवाले असुर पर्वतोंद्वारा बारंबार देवताओंकी सेनाको नष्ट करने लगे। |
| महाबला विगलितमेघवर्चसः<br>सहस्रशो गगनमहाप्रपातिनः।<br>अथासुरा भयजननाः प्रपेदिरे<br>सपादपा बहुविधमेघरूपिणः ॥ ३१ | हजारों महाबलवान् असुर जलरहित मेघोंके समान आकाशमण्डलसे नीचे गिर रहे थे, जिससे वे अतिशय भयंकर हो गये थे। उनके द्वारा फेंके गये वृक्ष मेघोंके समान दिखायी पड़ते थे। |
| महाद्रयः प्रविगलिताग्रसानवः<br>परस्परं द्रुतमभिपत्य सस्वराः।<br>ततो मही प्रचलितसाद्रिकानना<br>तदाद्रिपाताभिहता समन्ततः ॥ ३२ | विशाल पर्वत, जिनकी चोटियाँ छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, शब्द करते हुए एक-दूसरेसे टकरा रहे थे। उन पर्वतोंके गिरनेसे अभिहत हुई पर्वत-वनोंसहित सारी पृथ्वी कम्पायमान हो गयी। |
| परस्परं समभिनिगर्जतां मुहू<br>रणाजिरे भृशमभिसम्प्रवर्तिते।<br>नरस्ततो वरकनकाग्रभूषणै-<br>र्महेषुभिः पवनपथं समावृणोत्॥ ३३ | इस प्रकार जब युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर भीषण गर्जन करते हुए बारंबार घात-प्रतिघात होने लगा और दानवोंने देव-सेनाओंको आतंकित कर दिया, तब नरने सुन्दर सुवर्णजटित अग्रभागवाले अपने विशाल बाणोंसे वायुमार्गको अवरुद्ध |
- अध्याय २५२ * | ९७१
| विदारयन् गिरिशिखराणि पत्रिभि- <br> र्महाभये सुरगणविग्रहे तदा । <br> ततो महीं लवणजलं च सागरं <br> महासुराः प्रविविशुरर्दिताः सुरैः ॥ ३४ <br> वियद्गतं ज्वलितहुताशनप्रभं <br> सुदर्शनं परिकुपितं निशम्य च । <br> ततः सुरैर्विजयमवाप्य मन्दरः <br> स्वमेव देशं गमितः सुपूजितः ॥ ३५ <br> वितत्य खं दिवमथ चैव सर्वश- <br> स्ततो गताः सलिलधरा यथागतम् । <br> ततोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे <br> सुराः परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम् । <br> ददुश्च तं निधिममृतस्य रक्षितं <br> किरीटिने बलिभिरथामरैः सह ॥ ३६ | कर दिया और बाणोंके प्रहारसे पर्वत-शिखरोंको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार देवताओंद्वारा ताड़ित किये गये बड़े-बड़े असुर योद्धा पाताल एवं खारे समुद्रमें प्रविष्ट हो गये। जलती हुई अग्निके समान कान्तिमान् एवं अतिशय कोपमें भरे हुए सुदर्शन चक्रको आकाशमें गया हुआ सुनकर देवगण विजयी हुए। तदनन्तर मन्दराचलको आदरपूर्वक अपने स्थानपर स्थापित कर दिया गया और सभी दिशाओं तथा आकाशमें फैले हुए बादसमूह भी जैसे आये थे वैसे ही चले गये। तत्पश्चात् देवगण परम हर्षपूर्वक अमृतको सुरक्षित कर लिये और उसकी संचित निको बलवान् देवताओंके साथ किरीटधारी भगवान्को सुरक्षाके लिये सौंप दिया गया ॥ २६-३६ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थनं नामैकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अमृतमन्थन नामक दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५१ ॥
दो सौ बावनवाँ अध्याय
वास्तुके प्रादुर्भावकी कथा
| ऋषय ऊचुः <br> प्रासादभवनादीनां निवेशं विस्तराद् वद। <br> कुर्यात् केन विधानेन कश्च वस्तुरुदाहृतः ॥ १ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! अब आप हमलोगोंको राजभवन आदिके संनिवेशकी और उनके बनाये जानेकी विधि विस्तारपूर्वक बतलाइये। साथ ही वास्तु क्या कहलाता है, इसपर भी प्रकाश डालिये ॥ १ ॥ | | सूत उवाच <br> भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। <br> नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरंदरः ॥ २ <br> ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। <br> वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥ ३ <br> अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशकाः। <br> संक्षेपेणोपदिष्टं यन्मनवे मत्स्यरूपिणा ॥ ४ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित्, भगवान् शंकर, इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति—ये अठारह वास्तुशास्त्रके* उपदेष्टा माने गये हैं। जिसे मत्स्यरूपधारी भगवान्ने संक्षेपमें मनुके प्रति उपदेश किया था, |
* वास्तुके अर्थ बसनेकी जगह, घर, गाँव, नींव आदि हैं। इसपर समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, वृहत्संहिता, शिल्परत्न, गृहरत्नभूषण आदि ग्रन्थोंमें पूर्ण विचार है। पुराणोंमें अग्नि, विष्णुधर्म आदिमें ऐसी ही चर्चा है। इस विद्याका संक्षिप्त उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्रों एवं मनु० ३।८९ आदिमें भी है। इसके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता-कर्ता विश्वकर्मा एवं मयदानव हैं।
| ९७२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तदिदानीं प्रवक्ष्यामि वास्तुशास्त्रमनुत्तमम्।<br>पुरान्धकवधे घोरे घोररूपस्य शूलिनः॥ ५<br>ललाटस्वेदसलिलमपतद् भुवि भीषणम्।<br>करालवदनं तस्माद् भूतमुद्भूतमुल्यणम्॥ ६<br>ग्रसमानमिवाकाशं सप्तद्वीपां वसुंधराम्।<br>ततोऽन्धकानां रुधिरमपिबत् पतितं क्षितौ॥ ७<br>तेन तत् समरे सर्वं पतितं यन्महीतले।<br>तथापि तृप्तिमगमन्न तद् भूतं यदा तदा॥ ८<br>सदाशिवस्य पुरतस्तपश्चक्रे सुदारुणम्।<br>क्षुधाविष्टं तु तद् भूतमाहर्तुं जगतीतत्रयम्॥ ९<br>ततः कालेन संतुष्टो भैरवस्तस्य चाह वै।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते यदभीष्टं तवानघ॥ १० | उसी श्रेष्ठ वास्तुशास्त्रको मैं आपलोगोंसे बतला रहा हूँ। प्राचीन कालमें भयंकर अन्धक-वधके समय विकराल रूपधारी भगवान् शंकरके ललाटसे पृथ्वीपर स्वेदबिन्दु गिरे थे। उससे एक भीषण एवं विकराल मुखवाला उत्कट प्राणी उत्पन्न हुआ। वह ऐसा प्रतीत होता था मानो सातों द्वीपोंसहित वसुंधरा तथा आकाशको निगल जायगा। तत्पश्चात् वह पृथ्वीपर गिरे हुए अन्धकोंके रक्तका पान करने लगा। इस प्रकार वह उस युद्धमें पृथ्वीपर गिरे हुए सारे रक्तको पान कर गया। किंतु इतनेपर भी जब वह तृप्त न हुआ, तब भगवान् सदाशिवके सम्मुख अत्यन्त घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। भूखसे व्याकुल होनेपर जब वह पुनः त्रिलोकीको भक्षण करनेके लिये उद्यत हुआ, तब उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर भगवान् शंकर उससे बोले—'निष्पाप! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह वर माँग लो'॥ २—१०॥ |
| तमुवाच ततो भूतं त्रैलोक्यग्रसनक्षमम्।<br>भवामि देवदेवेश तथेत्युक्तं च शूलिना॥ ११ | तब उस प्राणीने शिवजीसे कहा—'देवदेवेश! मैं तीनों लोकोंको ग्रस लेनेके लिये समर्थ होना चाहता हूँ।' इसपर त्रिशूलधारी शिवजीने कहा—'ऐसा ही होगा'। |
| ततस्तत् त्रिदिवं सर्वं भूमण्डलमशेषतः।<br>स्वदेहेनान्तरिक्षं च रुन्धानं प्रपतद् भुवि॥ १२ | फिर तो वह प्राणी अपने विशाल शरीरसे स्वर्ग, सम्पूर्ण भूमण्डल और आकाशको अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वीपर आ गिरा। |
| भीतभीतैस्ततो देवैर्ब्रह्माणा चाथ शूलिना।<br>दानवासुररक्षोभिरवष्टब्धं समन्ततः॥ १३<br>येन यत्रैव चाक्रान्तं स तत्रैवावसत् पुनः।<br>निवासात् सर्वदेवानां वास्तुरीत्यभिधीयते॥ १४ | तब भयभीत हुए देवताओं तथा ब्रह्मा, शिव, दानव, दैत्य और राक्षसोंद्वारा वह स्तम्भित कर दिया गया। उस समय जिसने उसे जहाँपर आक्रान्त कर रखा था, वह वहीं निवास करने लगा। इस प्रकार सभी देवताओंके निवास करनेके कारण वह वास्तु नामसे विख्यात हुआ। |
| अवष्टब्धेन तेनापि विज्ञप्ताः सर्वदेवताः।<br>प्रसीदध्वं सुराः सर्वे युष्माभिर्निश्चलीकृतः॥ १५<br>स्थास्याम्यहं किमाकारो ह्यवष्टब्धो ह्यधोमुखः।<br>ततो ब्रह्मादिभिः प्रोक्तं वास्तुमध्ये तु यो बलिः॥ १६ | तब उस दबे हुए प्राणीने भी सभी देवताओंसे निवेदन किया—'देवगण! आपलोग मुझपर प्रसन्न हों। आपलोगोंद्वारा मैं दबाकर निश्चल बना दिया गया हूँ। भला इस प्रकार अवरुद्ध कर दिये जानेपर नीचे मुख किये हुए मैं किस तरह कबतक स्थित रह सकूँगा।' उसके ऐसा निवेदन करनेपर ब्रह्मा आदि देवताओंने कहा— |
| आहारो वैश्वदेवान्ते नूनमस्य भविष्यति।<br>वास्तूपशमनो यज्ञस्तवाहारो भविष्यति॥ १७ | 'वास्तुके प्रसङ्गमें तथा वैश्वदेवके अन्तमें जो बलि दी जायगी, वह निश्चय ही तुम्हारा आहार होगी। वास्तु-शान्तिके लिये जो यज्ञ होगा, वह भी तुम्हें आहारके रूपमें प्राप्त होगा। |
| यज्ञोत्सवादौ च बलिस्तवाहारो भविष्यति।<br>वास्तूपूजामकुर्वाणस्तवाहारो भविष्यति॥ १८ | यज्ञोत्सवमें दी गयी बलि भी तुम्हें आहाररूपमें प्राप्त होगी। वास्तु-पूजा न करनेवाले भी तुम्हारे आहार होंगे। |
* अध्याय २५३ * । ९७३
| अज्ञानात् तु कृतो यज्ञस्तवाहारो भविष्यति।<br>एवमुक्तस्ततो हृष्टः स वास्तुर्भवत् तदा।<br>वास्तुयज्ञः स्मृतस्तस्मात् ततः प्रभृति शान्तये ॥ १९ | अज्ञानसे किया गया यज्ञ भी तुम्हें आहाररूपमें प्राप्त होगा।' ऐसा कहे जानेपर वह वास्तु नामक प्राणी प्रसन्न हो गया। इसी कारण तबसे शान्तिके लिये वास्तु-यज्ञका प्रवर्तन हुआ॥ १९—१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुभूतोद्भवो नाम द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तु-प्रादुर्भाव नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५२॥
दो सौ तिरपनवाँ अध्याय
वास्तु-चक्रका वर्णन
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि गृहकालविनिर्णयम्।<br>यथा कालं शुभं ज्ञात्वा सदा भवनमारभेत्॥ १ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं गृहनिर्माणके उस समयका निर्णय बतला रहा हूँ, जिस शुभ समयको जानकर मनुष्यको सर्वदा भवनका आरम्भ करना चाहिये। |
| चैत्रे व्याधिमवाप्नोति यो गृहं कारयेन्नरः।<br>वैशाखे धेनुरत्नानि ज्येष्ठे मृत्युं तथैव च॥ २ | जो मनुष्य चैत्रमासमें घर बनाता है, वह व्याधि, वैशाखमें घर बनानेवाला धेनु और रत्न तथा ज्येष्ठमें मृत्युको प्राप्त होता है। |
| आषाढे भृत्यरत्नानि पशुवर्गमवाप्नुयात्।<br>श्रावणे भृत्यलाभं तु हानिं भाद्रपदे तथा॥ ३ | आषाढ़में नौकर, रत्न और पशु समूहकी और श्रावणमें नौकरोंकी प्राप्ति तथा भाद्रपदमें हानि होती है। |
| पत्नीनाशोऽश्विने विद्यात् कार्तिके धनधान्यकम्।<br>मार्गशीर्षे तथा भक्तं पौषे तस्करतो भयम्॥ ४ | आश्विनमें घर बनानेसे पत्नीका नाश होता है। कार्तिक-मासमें धन-धान्यादिकी तथा मार्गशीर्षमें श्रेष्ठ भोज्यपदार्थोंकी प्राप्ति होती है। पौषमें चोरोंका भय और माघमासमें |
| लाभं च बहुशो विन्द्यादग्निं माघे विनिर्दिशेत्।<br>फाल्गुने काञ्चनं पुत्रानिति कालबलं स्मृतम्॥ ५ | अनेक प्रकारके लाभ होते हैं, किंतु अग्निका भी भय रहता है। फाल्गुनमें सुवर्ण तथा अनेक पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार समयका फल एवं बल बतलाया जाता है। |
| अश्विनी रोहिणी मूलमुत्तरात्रयमैन्दवम्।<br>स्वाती हस्तोऽनुराधा च गृहारम्भे प्रशस्यते॥ ६ | गृहारम्भमें अश्विनी, रोहिणी, मूल, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और अनुराधा—ये नक्षत्र प्रशस्त कहे गये हैं। |
| आदित्यभौमवर्ज्यास्तु सर्वे वाराः शुभावहाः।<br>वर्ज्यं व्याघातशूले च व्यतीपातातिगण्डयोः॥ ७ | रविवार और मङ्गलवारको छोड़कर शेष सभी दिन शुभदायक हैं। व्याघात, शूल, व्यतीपात; अतिगण्ड, |
| विष्कम्भगण्डपरिघवज्रयोगे न कारयेत्।<br>श्वेते मैत्रेऽथ माहेन्द्रे गान्धर्वाभिजिति रौहिणे॥ ८ | विष्कम्भ, गण्ड, परिघ और वज्र—इन योगोंमें गृहारम्भ नहीं करना चाहिये। श्वेत, मैत्र, माहेन्द्र, गान्धर्व, अभिजित्, रौहिण, वैराज और सावित्र—इन |
| तथा वैराजसावित्रे मुहूर्ते गृहमारभेत्।<br>चन्द्रादित्यबलं लब्ध्वा शुभलग्नं निरीक्षयेत्॥ ९ | मुहूर्तोंमें गृहारम्भ करना चाहिये। चन्द्रमा और सूर्यके बलके साथ-ही-साथ शुभ लग्नका भी निरीक्षण करना चाहिये। |
| स्तम्भोच्छ्रायादि कर्तव्यमन्यत्तु परिवर्जयेत्।<br>प्रासादेष्वेवमेवं स्यात् कूपवापीषु चैव हि॥ १० | सर्वप्रथम अन्य कार्योंको छोड़कर स्तम्भारोपण करना चाहिये। यही विधि प्रासाद, कूप एवं बावलियोंके लिये भी मानी गयी है॥ १—१०॥ |
| ९७४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पूर्वं भूमिं परीक्षेत पश्चाद्वास्तुं प्रकल्पयेत् ।<br>श्वेता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैवानुपूर्वशः ॥ ११<br><br>विप्रादः शस्यते भूमिरतः कार्यं परीक्षणम् ।<br>विप्राणां मधुरास्वादा कटुका क्षत्रियस्य तु ॥ १२<br><br>तिक्ता कषाया च तथा वैश्यशूद्रेषु शस्यते ।<br>अरत्निमात्रे वै गर्ते स्वनुलिप्ते च सर्वशः ॥ १३<br><br>घृतमामशरावस्थं कृत्वा वर्त्तिचतुष्टयम् ।<br>ज्वालयेद् भूपरीक्षार्थं तत्पूर्णं सर्वदिङ्मुखम् ॥ १४<br><br>दीप्तौ पूर्वादि गृह्णीयाद् वर्णानामनुपूर्वशः ।<br>वास्तुः सामूहिको नाम दीप्यते सर्वतस्तु यः ॥ १५<br><br>शुभदः सर्ववर्णानां प्रासादेषु गृहेषु च ।<br>रत्निमात्रमधोगर्ते परीक्ष्यं खातपूरणे ॥ १६<br><br>अधिके श्रियमाप्नोति न्यूने हानिं समे समम् ।<br>फालकृष्टेऽथवा देशे सर्वबीजानि वापयेत् ॥ १७<br><br>त्रिपञ्चसप्तरात्रे च यत्रारोहन्ति तान्यपि ।<br>ज्येष्ठोत्तमा कनिष्ठा भूर्वर्जनीयतरा सदा ॥ १८<br><br>पञ्चगव्यौषधिजलैः परीक्ष्यित्वा च सेचयेत् ।<br>एकाशीतिपदं कृत्वा रेखाभिः कनकेन च ॥ १९<br><br>पश्चात् पिष्टेन चालिप्य सूत्रेणालोड्य सर्वतः ।<br>दश पूर्वायता लेखा दश चैवोत्तरायताः ॥ २०<br><br>सर्ववास्तुविभागेषु विज्ञेया नवका नव ।<br>एकाशीतिपदं कृत्वा वास्तुवित् सर्ववास्तुषु ॥ २१ | पहले भूमिकी परीक्षाकर फिर बादमें वहाँ गृहका निर्माण करना चाहिये। श्वेत, लाल, पीली और काली—इन चार वर्णोंवाली पृथिवी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये प्रशंसित मानी गयी है। इसके बाद उसके स्वादकी परीक्षा करनी चाहिये। ब्राह्मणके लिये मधुर स्वादवाली, क्षत्रियके लिये कड़वी, वैश्यके लिये तिक्त तथा शूद्रके लिये कसैली स्वादवाली पृथ्वी उत्तम मानी गयी है। तत्पश्चात् भूमिकी पुनः परीक्षाके लिये एक हाथ गहरा गड्डा खोदकर उसे सब ओरसे भलीभाँति लीप-पोतकर स्वच्छ कर दे। फिर एक कच्चे पुरवेमें घी भरकर उसमें चार बत्तियाँ जला दे और उसे उसी गड्ढेमें रख दे। उन बत्तियोंकी लौ क्रमशः चारों दिशाओंकी ओर हों। यदि पूर्व दिशाकी बत्ती अधिक कालतक जलती रहे तो ब्राह्मणके लिये उसका फल शुभ होता है। इसी प्रकार क्रमशः उत्तर, पश्चिम और दक्षिणकी बत्तियोंको क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रोंके लिये कल्याणकारक समझना चाहिये। यदि वह वास्तुदीपक चारों दिशाओंमें जलता रहे तो प्रासाद एवं साधारण गृह-निर्माणके लिये वहाँकी भूमि सभी वर्णोंके लिये शुभदायिनी है। एक हाथ गहरा गड्डा खोदकर उसे उसी मिट्टीसे पूर्ण करते समय इस प्रकार परीक्षा करे कि यदि मिट्टी शेष रह जाय तो श्रीकी प्राप्ति होती है, न्यून हो जाय तो हानि होती है तथा सम रहनेसे समभाव होता है। अथवा भूमिको हलद्वारा जुतवाकर उसमें सभी प्रकारके बीज बो दे। यदि वे बीज तीन, पाँच तथा सात रातोंमें अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये। तीन रातवाली भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली कनिष्ठ है। कनिष्ठ भूमिको सर्वथा त्याग देना चाहिये। इस प्रकार भूमि-परीक्षा कर पञ्चगव्य और ओषधियोंके जलसे भूमिको सींच दे और सुवर्णकी सलाईद्वारा रेखा खींचकर इक्यासी कोष्ठ बनावे। (कोष्ठ बनानेका ढंग इस प्रकार है—) पिष्टकसे चुपड़े हुए सूतसे दस रेखाएँ पूर्वसे पश्चिम तथा दस रेखाएँ उत्तरसे दक्षिणकी ओर खींचे। सभी प्रकारके वास्तु-विभागोंमें इस नव-नव (९x९) अर्थात् इक्यासी* कोष्ठका वास्तु जानना चाहिये। वास्तुशास्त्रको जाननेवाला सभी प्रकारके वास्तुसम्बन्धी कार्योंमें इसका उपयोग करे ॥ ११—२१ ॥ |
| पदस्थान् पूजयेद् देवांस्त्रिंशत् पञ्चदशैव तु ।<br>द्वात्रिंशद् बाह्यतः पूज्याः पूज्याश्चान्तस्त्रयोदश ॥ २२ | फिर उन कोष्ठोंमें स्थित पैंतालीस देवताओंकी पूजा करे। उनमें बत्तीसकी बाहरसे तथा तेरहकी भीतरसे पूजा |
* वास्तुचक्र तीन प्रकारके होते हैं—एक सौ पदका, दूसरा ८१ पदका और तीसरा ६४ पदका। यहाँ ८१ पदका ही वर्णन है।
| * अध्याय २५३ * | १७५ |
|---|
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नामस्तस्तान् प्रवक्ष्यामि स्थानानि च निबोधत।<br>ईशानकोणादिषु तान् पूजयेद्धविषा नरः॥ २३<br>शिखी चैवाथ पर्जन्यो जयन्तः कुलिशायुधः।<br>सूर्यसत्यौ भृशश्चैव आकाशो वायुरेव च॥ २४<br>पूषा च वितथश्चैव बृहत्क्षतयमावुभौ*।<br>गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः पितृगणस्तथा॥ २५<br>दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः।<br>असुरः शोषपापौ च रोगोऽहिमुख्य एव च॥ २६<br>भल्लाटः सोमसर्पौ च अदितिश्च दितिस्तथा।<br>बहिर्द्वात्रिंशदेते तु तदन्तस्तु ततः शृणु॥ २७<br>ईशानादिचतुष्कोणसंस्थितान् पूजयेद् बुधः।<br>आपश्चैवाथ सावित्रो जयो रुद्रस्तथैव च॥ २८<br>मध्ये नवपदे ब्रह्मा तस्याष्टौ च समीपगान्।<br>साध्यानेकान्तरान् विद्यात् पूर्वाद्यान् नामतः शृणु॥ २९<br>अर्यमा सविता चैव विवस्वान् विबुधाधिपः।<br>मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधरः स्मृतः॥ ३०<br>अष्टमश्चापवत्सस्तु परितो ब्रह्मणः स्मृताः।<br>आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निर्दितिस्तथा॥ ३१<br>पदिकानां तु वर्गोऽयमेवं कोणेष्वशेषतः।<br>तन्मध्ये तु बहिर्विंशद् द्विपदास्ते तु सर्वशः॥ ३२<br>अर्यमा च विवस्वांश्च मित्रः पृथ्वीधरस्तथा।<br>ब्रह्मणः परितो दिक्षु त्रिपदास्ते तु सर्वशः॥ ३३ | करनी चाहिये। मैं उनके नाम और स्थान बतला रहा हूँ, आपलोग सुनिये। (इन्हें जानकर) मनुष्यको ईशान आदि कोणोंमें हविष्यद्वारा उन-उन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। शिखी, पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, अन्तरिक्ष, वायु, पूषा, वितथ, बृहत्क्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप, असुर, शोष, पाप, रोग, अहि, मुख्य, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति और दिति—ये बत्तीस बाह्य देवता हैं। बुद्धिमान् पुरुषको ईशान आदि चारों कोणोंमें स्थित इन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। अब वास्तु चक्रके भीतरी देवताओंके नाम सुनिये—आप, सावित्र, जय, रुद्र—ये चार चारों ओरसे तथा मध्यके नौ कोष्ठोंमें ब्रह्मा और उनके समीप अन्य आठ देवताओंकी भी पूजा करनी चाहिये। (ये सब मिलकर मध्यके तेरह देवता होते हैं।) ब्रह्माके चारों ओर स्थित ये आठ देवता, जो क्रमशः पूर्वादि दिशाओंमें दो-दोके क्रमसे स्थित रहते हैं, साध्यनामसे कहे जाते हैं। उनके नाम सुनिये—अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर तथा आठवें आपवत्स। आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि तथा दिति—ये पाँच देवताओंके वर्ग हैं। (इनकी पूजा अग्निकोणमें करनी चाहिये।) उनके बाहर बीस देवता हैं जो दो पदोंमें रहते हैं। अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर—ये चार ब्रह्माके चारों ओर तीन-तीन पदोंमें स्थित रहते हैं॥ २२–३३॥ |
| वंशानिदानीं वक्ष्यामि ऋजूनपि पृथक् पृथक्।<br>वायुं यावत् तथा रोगात् पितृभ्यः शिखिनं पुनः॥ ३४<br>मुख्याद् भृशं तथा शोषाद् वितथं यावदेव तु।<br>सुग्रीवाददितिं यावन्मृगात् पर्जन्यमेव च॥ ३५<br>एते वंशाः समाख्याताः क्वचिच्च जयमेव तु।<br>एतेषां यस्तु सम्पातः पदं मध्यं समं तथा॥ ३६<br>मर्म चैतत् समाख्यातं त्रिशूलं कोणगं च यत्।<br>स्तम्भं न्यासेषु वर्ज्यानि तुलाविधिषु सर्वदा॥ ३७<br>कीलोच्छिष्टोपघातादि वर्जयेद् यत्नतो जनः।<br>सर्वत्र वास्तुनिर्दिष्टो पितृवैश्वानरायतः॥ ३८ | अब मैं उनके वंशोंको पृथक्-पृथक् संक्षेपमें कह रहा हूँ। वायुसे लेकर रोगपर्यन्त, पितृगणसे शिखीपर्यन्त, मुख्यसे भृशपर्यन्त, शोषसे वितथपर्यन्त, सुग्रीवसे अदितिपर्यन्त तथा मृगसे पर्जन्यपर्यन्त—ये ही वंश कहे जाते हैं। कहीं-कहीं मृगसे लेकर जयपर्यन्त वंश कहा गया है। पदके मध्यमें इनका जो सम्पात है, वह पद, मध्य तथा सम नामसे प्रसिद्ध है। त्रिशूल और कोणगामी मर्मस्थल कहे जाते हैं, जो सर्वदा स्तम्भन्यास और तुलाकी विधिमें वर्जित माने गये हैं। मनुष्यके लिये यत्नपूर्वक देवताके पदोंपर कीलें गाड़ना, जूठन फेंकना तथा चोटें पहुँचाना वर्जित है। यह वास्तु-चक्र, सर्वत्र पितृवर्गीय वैश्वानरके अधीन माना गया है। |
* 'बृहत्क्षत' इति बृहत्संहितायां ५३।५४ स्थः पाठः।
९७६ * मत्स्यपुराण *
| मूर्ध्न्यग्निः समादिष्टो मुखे चापः समाश्रितः।<br>पृथ्वीधरोऽर्यमा चैव स्कन्धयोस्तावधिष्ठितौ॥ ३९<br>वक्षःस्थले चापवत्सः पूजनीयः सदा बुधैः।<br>नेत्रयोर्दितिपर्जन्यौ श्रोत्रेऽदितिजयन्तकौ॥ ४०<br>सर्पेन्द्रावंससंस्थौ तु पूजनीयौ प्रयत्नतः।<br>सूर्यसोमादयस्तद्वद् बाह्वोः पञ्च च पञ्च च॥ ४१<br>रुद्रश्च राजयक्ष्मा च वामहस्ते समास्थितौ।<br>सावित्रः सविता तद्वद्धस्तं दक्षिणमास्थितौ॥ ४२<br>विवस्वानाथ मित्रश्च जठरे संव्यवस्थितौ।<br>पूषा च पापयक्ष्मा च हस्तयोर्मणिबन्धने॥ ४३<br>तथैवासुरशोषौ च वामपार्श्वं समाश्रितौ।<br>पार्श्वे तु दक्षिणे तद्वद् वितथः सबृहत्क्षतः॥ ४४<br>ऊर्वोर्यमाम्बुपौ ज्ञेयौ जान्वोर्गन्धर्वपुष्पकौ।<br>जङ्घयोर्भृङ्गसुग्रीवौ स्फिकस्थौ दौवारिको मृगः॥ ४५<br>जयशक्रौ तथा मेढ्रे पादयोः पितरस्तथा।<br>मध्ये नवपदे ब्रह्मा हृदये स तु पूज्यते॥ ४६ | उसके मस्तकपर अग्नि और मुखमें जलका निवास है, दोनों स्कन्धोंपर पृथ्वीधर तथा अर्यमा अधिष्ठित हैं। बुद्धिमान्को वक्षःस्थलपर आपवत्सकी पूजा करनी चाहिये। नेत्रोंमें दिति और पर्जन्य तथा कानोंमें अदिति और जयन्त हैं। कंधोंपर सर्प और इन्द्रकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार बाहुओंमें सूर्य और चन्द्रमासे लेकर पाँच-पाँच देवता स्थित हैं। रुद्र और राजयक्ष्मा—ये दोनों बायें हाथपर अवस्थित हैं। उसी प्रकार सावित्र और सविता दाहिने हाथपर स्थित हैं। विवस्वान् और मित्र—ये उदरमें तथा पूषा और पापयक्ष्मा—ये हाथोंके मणिबन्धोंमें स्थित हैं। उसी प्रकार असुर और शोष—ये बायें पार्श्वमें तथा दाहिने पार्श्वमें वितथ और बृहत्क्षत स्थित हैं। ऊरुभागोंपर यम और वरुण, घुटनोंपर गन्धर्व और पुष्पक, दोनों जंघोंपर क्रमशः भृङ्ग और सुग्रीव, दोनों नितम्बोंपर दौवारिक और मृग, लिङ्गस्थानपर जय और शक्र तथा पैरोंपर पितृगण स्थित हैं। मध्यके नौ पदोंमें, जो हृदय कहलाता है, ब्रह्माकी पूजा होती है॥ ३४—४६॥ |
| चतुःषष्टिपदो वास्तुः प्रासादे ब्रह्मणा स्मृतः।<br>ब्रह्मा चतुष्पदस्तत्र कोणेष्वर्धपदस्तथा॥ ४७<br>बहिष्कोणेषु वास्तौ तु सार्धाश्चोभयसंस्थिताः।<br>विंशतिद्विपदाश्चैव चतुःषष्टिपदे स्मृताः॥ ४८<br>गृहारम्भेषु कण्डूतिः स्वाम्यङ्गे यत्र जायते।<br>शल्यं त्वपनयेत् तत्र प्रासादे भवने तथा॥ ४९<br>सशल्यं भयदं यस्मादशल्यं शुभदायकम्।<br>हीनाधिकाङ्गतां वास्तोः सर्वथा तु विवर्जयेत्॥ ५०<br>नगरग्रामदेशेषु सर्वत्रैवं विवर्जयेत्।<br>चतुःशालं त्रिशालं च द्विशालं चैकशालकम्।<br>नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि स्वरूपेण द्विजोत्तमाः॥ ५१ | ब्रह्माने प्रासादके निर्माणमें चौंसठ पदोंवाले वास्तुको श्रेष्ठ बतलाया है। उसके चार पदोंमें ब्रह्मा तथा उनके कोणोंमें आपवत्स, सविता आदि आठ देवगण स्थित हैं। वास्तुके बाहरवाले कोणोंमें भी अग्नि आदि आठ देवताओंका निवास है तथा दो पदोंमें जयन्त आदि बीस देवता स्थित हैं। इस प्रकार चौंसठ पदवाले वास्तुचक्रमें देवताओंकी स्थिति बतलायी गयी है। गृहारम्भके समय गृहपतिके जिस अङ्गमें खुजली जान पड़े, महल तथा भवनमें वास्तुके उसी अङ्गपर गड़ी हुई शल्य या कीलको निकाल देना चाहिये; क्योंकि शल्यसहित गृह भयदायक और शल्यरहित कल्याणकारक होता है। वास्तुका अधिक एवं हीन अङ्गका होना सर्वथा त्याज्य है। इसी प्रकार नगर, ग्राम और देश—सभी जगहपर इन दोषोंका परित्याग करना चाहिये। द्विजवरो! अब मैं चतुःशाल, त्रिशाल, द्विशाल तथा एकशालवाले भवनोंके नाम और स्वरूपका वर्णन करूँगा॥ ४७—५१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे एकाशीतिपदवास्तुनिर्णयो नाम त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें इक्यासीपद-निर्णय नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५३॥
| * अध्याय २५४ * | ९७७ |
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दो सौ चौवनवाँ अध्याय
वास्तुशास्त्रके अन्तर्गत राजप्रासाद आदिकी निर्माण-विधि
| सूत उवाच | |
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| चतुःशालं प्रवक्ष्यामि स्वरूपान्नामतस्तथा।<br>चतुःशालं चतुर्द्वारैरलिन्दैः सर्वतोमुखम्॥ १<br><br>नाम्ना तत् सर्वतोभद्रं शुभं देवनृपालये।<br>पश्चिमद्वारहीनं च नन्द्यावर्तं प्रचक्षते॥ २<br><br>दक्षिणद्वारहीनं तु वर्धमानमुदाहृतम्।<br>पूर्वद्वारविहीनं तत् स्वस्तिकं नाम विश्रुतम्॥ ३<br><br>रुचकं चोत्तरद्वारविहीनं तत् प्रचक्षते।<br>सौम्यशालाविहीनं यत् त्रिशालं धान्यकं च तत्॥ ४<br><br>क्षेमवृद्धिकरं नृणां बहुपुत्रफलप्रदम्।<br>शालया पूर्वया हीनं सुक्षेत्रमिति विश्रुतम्॥ ५<br><br>धन्यं यशस्यमायुष्यं शोकमोहविनाशनम्।<br>शालया याम्यया हीनं यद् विशालं तु शालया॥ ६<br><br>कुलक्षयकरं नृणां सर्वव्याधिभयावहम्।<br>हीनं पश्चिमया यत् तु पक्षघ्नं नाम तत् पुनः॥ ७<br><br>मित्रबन्धुसुतान् हन्ति तथा सर्वभयावहम्।<br>याम्यापराभ्यां शालाभ्यां धनधान्यफलप्रदम्॥ ८<br><br>क्षेमवृद्धिकरं नृणां तथा पुत्रफलप्रदम्।<br>यमसूर्यं च विज्ञेयं पश्चिमोत्तरशालकम्॥ ९<br><br>राजाग्निभयदं नृणां कुलक्षयकरं च यत्।<br>उदक्पूर्वे तु शाले दण्डाख्ये यत्र तद् भवेत्॥ १० | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं चतुःशाल* (त्रिशाल, द्विशाल आदि) भवनोंके स्वरूप, उनके विशिष्ट नामोंके साथ बतला रहा हूँ। जो चतुःशाल चारों ओर भवन, द्वार तथा बरामदोंसे युक्त हो, उसे 'सर्वतोभद्र' कहा जाता है। वह देव-मन्दिर तथा राजभवनके लिये मङ्गलकारक होता है। वह चतुःशाल यदि पश्चिम द्वारसे हीन हो तो 'नन्द्यावर्त', दक्षिणद्वारसे हीन हो तो 'वर्धमान', पूर्वद्वारसे रहित हो तो 'स्वस्तिक', उत्तरद्वारसे विहीन हो तो 'रुचक' कहा जाता है। (अब त्रिशाल भवनोंके भेद बतलाते हैं।) उत्तर दिशाकी शालासे रहित जो त्रिशाल भवन होता है, उसे 'धान्यक' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याण एवं वृद्धि करनेवाला तथा अनेक पुत्ररूप फल देनेवाला होता है। पूर्वकी शालासे विहीन त्रिशाल भवनको 'सुक्षेत्र' कहते हैं। वह धन, यश और आयु प्रदान करनेवाला तथा शोक-मोहका विनाशक होता है। जो दक्षिणकी शालासे विहीन होता है, उसे 'विशाल' कहते हैं। वह मनुष्योंके कुलका क्षय करनेवाला तथा सब प्रकारकी व्याधि और भय देनेवाला होता है। जो पश्चिमशालासे हीन होता है, उसका नाम 'पक्षघ्न' है, वह मित्र, बन्धु और पुत्रोंका विनाशक तथा सब प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। (अब 'द्विशालों'के भेद कहते हैं—) दक्षिण एवं पश्चिम—दो शालाओंसे युक्त भवनको धनधान्यप्रद कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याणका वर्धक तथा पुत्रप्रद कहा गया है। पश्चिम और उत्तरशालावाले भवनको 'यमसूर्य' नामक शाल जानना चाहिये। वह मनुष्योंके लिये राजा और अग्निसे भयदायक और कुलका विनाशक होता है। जिस भवनमें केवल पूर्व और उत्तरकी ही दो शालाएँ हों, उसे 'दण्ड' कहते हैं। |
* रावणादिके ऐसे चतुःशाल, त्रिशाल आदि भवनोंका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण, सुन्दरकाण्ड, राजतरङ्गिणी ३। १२, मृच्छकटिकनाटक ३। ७ तथा बृहत्संहिता अ० ५३ आदिमें आता है। शिल्परत्न, समराङ्गण, काश्यपशिल्पादिमें इनकी रचनाका विस्तृत विधान है।
९७८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अकालमृत्युभयदं परचक्रभयावहम्।<br>धनाख्यं पूर्वयाम्यभ्यां शालाभ्यां यद् शालकम्॥ ११ | वह अकालमृत्यु तथा शत्रुपक्षसे भय उत्पन्न करनेवाला होता है। जो पूर्व और दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन हो, उसे 'धन' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये शस्त्र तथा पराजयका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। |
| तच्छस्त्रभयदं नृणां पराभवभयावहम्।<br>चुल्ली पूर्वापराभ्यां तु सा भवेन्मृत्युसूचनी॥ १२ | इसी प्रकार केवल पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बना हुआ 'चुल्ली' नामक द्विशालभवन मृत्युसूचक है। वह स्त्रियोंको विधवा करनेवाला तथा अनेकों प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। |
| वैधव्यदायकं स्त्रीणामनेकभयकारकम्।<br>कार्यमुत्तरयाम्यभ्यां शालाभ्यां भयदं नृणाम्॥ १३ | केवल उत्तर एवं दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन मनुष्योंके लिये भयदायक होता है। अतः ऐसे भवनको नहीं बनवाना चाहिये। |
| सिद्धार्थवज्रवर्ज्याणि द्विशालानि सदा बुधैः।<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि भवनं पृथिवीपतेः॥ १४ | बुद्धिमानोंको सदा सिद्धार्थ$^१$ और वज्रसे$^२$ भिन्न द्विशालभवन बनवाना चाहिये॥ १-१३$\frac{१}{२}$॥<br><br>अब मैं राजभवनके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ। |
| पञ्चप्रकारं तत् प्रोक्तमुत्तमादिविभेदतः।<br>अष्टोत्तरं हस्तशतं विस्तरश्चोत्तमो मतः॥ १५ | वह उत्तम आदि भेदसे पाँच प्रकारका कहा गया है। एक सौ आठ हाथके विस्तारवाला राजभवन उत्तम माना गया है। |
| चतुर्ष्वन्येषु विस्तारो हीयते चाष्टभिः करैः।<br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते॥ १६ | अन्य चार प्रकारके भवनोंमें विस्तार क्रमशः आठ-आठ हाथ कम होता जाता है; किंतु पाँचों प्रकारके भवनोंमें लम्बाई विस्तारके चतुर्थांशसे अधिक होती है। |
| युवराजस्य वक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्।<br>षड्भिः षड्भिस्तथाशीतिर्हीयते तत्र विस्तरात्॥ १७ | अब मैं युवराजके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। उसमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अस्सी हाथकी होती है। अन्य चारकी चौड़ाई क्रमशः छः-छः हाथ कम होती जाती है। |
| त्र्यंशेन चाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते।<br>सेनापतेः प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्॥ १८ | इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईसे एक तिहाई अधिक कही गयी है। इसी प्रकार अब मैं सेनापतिके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। |
| चतुःषष्टिस्तु विस्तारात् षड्भिः षड्भिस्तु हीयते।<br>पञ्चस्वेतेषु दैर्घ्यं च षड्भागेनाधिकं भवेत्॥ १९ | उसके उत्तम भवनकी चौड़ाई चौंसठ हाथकी मानी गयी है। अन्य चार भवनोंकी चौड़ाई क्रमशः छः-छः हाथ कम होती जाती है। इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके षष्ठांशसे अधिक होनी चाहिये। |
| मन्त्रिणामथ वक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्।<br>चतुश्र्चतुर्भिर्हीना स्यात् करषष्टिः प्रविस्तरे॥ २० | अब मैं मन्त्रियोंके भी पाँच प्रकारके भवन बतला रहा हूँ। उनमें उत्तम भवनका विस्तार साठ हाथ होता है तथा अन्य चार क्रमशः चार-चार हाथ कम चौड़े होते हैं। |
| अष्टांशेनाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते।<br>सामन्तामात्यलोकानां वक्ष्ये भवनपञ्चकम्॥ २१ | इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके अष्टांशसे अधिक कही गयी है। अब मैं सामन्त, छोटे राजा और अमात्य (छोटे मन्त्री) लोगोंके पाँच प्रकारके भवनोंको बतलाता हूँ। |
| चत्वारिंशत् तथाष्टौ च चतुर्भिर्हीयते क्रमात्।<br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वेतेषु शस्यते॥ २२ | इनमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अड़तालीस हाथकी होनी चाहिये तथा अन्य चारोंकी चौड़ाई क्रमशः चार-चार हाथ कम कही गयी है। इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईकी अपेक्षा सवाया अधिक कही गयी है। |
१. एक प्रकारका स्तम्भ जिसमें ८ पहल या कोण होते हैं।
२. जिस द्विशालमें केवल दक्षिण और पश्चिमकी ओर भवन हों (वृहत्संहिता ५३। ३९)।