भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९७० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये।<br>नरनारायणौ देवौ समाजग्मतुराहवम्॥ २४<br>तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि।<br>चिन्तयामास वै चक्रं विष्णुर्दानवसूदनः॥ २५इस प्रकार महान् भयंकारक घमासान युद्धके चलते समय भगवान् नर-नारायण युद्धस्थलमें उपस्थित हुए। वहाँ नरके दिव्य धनुषको देखकर दैत्यसूदन भगवान् नारायणने भी अपने सुदर्शन चक्रका स्मरण किया॥ १९–२५॥
ततोऽम्बराच्चिन्तितमात्रमागतं<br>महाप्रभं चक्रममित्रनाशनम्।<br>विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं<br>सुदर्शनं भीममसह्यविक्रमम् ॥ २६तदनन्तर स्मरण करते ही वह असह्य प्रभावशाली, अत्यन्त कान्तिमान्, शत्रुनाशक, सूर्यके समान तेजस्वी, विस्तृत मण्डलोंवाला भयंकर सुदर्शन चक्र आकाशमार्गसे नीचे उतरा।
तदागतं ज्वलितहुताशनप्रभं<br>भयंकरः करिकरबाहुरच्युतः।<br>महाप्रभं दनुकुलदैत्यदारणं<br>तथोज्ज्वलज्ज्वलनसमानविग्रहम् ॥ २७तब हाथीकी शुण्डके समान बाहुवाले उग्र वेगशाली भगवान् विष्णुने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी दानवकुलसंहारक धधकती हुई अग्निके सदृश शरीरवाले परम कान्तिशाली भयंकर चक्रको आया हुआ देखकर उसे दैत्यसेनापर चला दिया। फिर तो रिपुके
मुमोच वै तदतुलमुग्रवेगवान्<br>महाप्रभं रिपुनगरावदारणम्।<br>संवर्तकज्वलनसमानवर्चसं<br>पुनःपुनर्न्यपतत वेगवत् तदा॥ २८नगरोंका विध्वंस करनेवाला, संवर्तक नामक प्रलयाग्निके समान तेजस्वी, अनुपम कान्तिमान् वह सुदर्शन चक्र बारंबार वेगपूर्वक शत्रुओंपर प्रहार करने लगा।
व्यदारयद् दितितनयान् सहस्रशः<br>करेरितं पुरुषवरेण संयुगे।<br>दहत् क्वचिज्ज्वलन इवानिलेरितः<br>प्रसह्य तानसुरगणानकृन्तत ॥ २९युद्धभूमिमें पुरुषोत्तमके हाथसे छोड़े गये उस चक्रने हजारों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उसने वायुसे प्रेरित अग्निकी भाँति कहीं सेनाओंको भस्म कर दिया तो कहीं उन असुरोंको बलपूर्वक काट डाला।
तत्प्रेरितं वियति मुहुः क्षितौ तदा<br>पपौ रणे रुधिरमथो पिशाचवत्।<br>अथासुरा गिरिभिरदीनमानसा<br>मुहुर्मुहुः सुरगणममर्दयंस्तदा ॥ ३०रणभूमिमें भगवान्‌के हाथसे प्रेरित वह सुदर्शन चक्र बारंबार आकाशमें तथा पृथ्वीतलपर पिशाचके समान रक्तपान करने लगा। इसके बाद निर्भय चित्तवाले असुर पर्वतोंद्वारा बारंबार देवताओंकी सेनाको नष्ट करने लगे।
महाबला विगलितमेघवर्चसः<br>सहस्रशो गगनमहाप्रपातिनः।<br>अथासुरा भयजननाः प्रपेदिरे<br>सपादपा बहुविधमेघरूपिणः ॥ ३१हजारों महाबलवान् असुर जलरहित मेघोंके समान आकाशमण्डलसे नीचे गिर रहे थे, जिससे वे अतिशय भयंकर हो गये थे। उनके द्वारा फेंके गये वृक्ष मेघोंके समान दिखायी पड़ते थे।
महाद्रयः प्रविगलिताग्रसानवः<br>परस्परं द्रुतमभिपत्य सस्वराः।<br>ततो मही प्रचलितसाद्रिकानना<br>तदाद्रिपाताभिहता समन्ततः ॥ ३२विशाल पर्वत, जिनकी चोटियाँ छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, शब्द करते हुए एक-दूसरेसे टकरा रहे थे। उन पर्वतोंके गिरनेसे अभिहत हुई पर्वत-वनोंसहित सारी पृथ्वी कम्पायमान हो गयी।
परस्परं समभिनिगर्जतां मुहू<br>रणाजिरे भृशमभिसम्प्रवर्तिते।<br>नरस्ततो वरकनकाग्रभूषणै-<br>र्महेषुभिः पवनपथं समावृणोत्॥ ३३इस प्रकार जब युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर भीषण गर्जन करते हुए बारंबार घात-प्रतिघात होने लगा और दानवोंने देव-सेनाओंको आतंकित कर दिया, तब नरने सुन्दर सुवर्णजटित अग्रभागवाले अपने विशाल बाणोंसे वायुमार्गको अवरुद्ध