मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २५१ * | ९६९ |
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| अथास्त्राणि च मुख्यानि महाप्रहरणानि च।<br>प्रगृह्याभ्यद्रवन् देवान् सहिता दैत्यदानवाः॥ ९<br><br>ततस्तदमृतं देवो विष्णुरादाय वीर्यवान्।<br>जहार दानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः॥ १० | दैत्यों और दानवोंका मन उसपर मोहित हो गया था। तदनन्तर वे सभी दैत्य-दानव संगठित होकर मुख्य-मुख्य महान् शस्त्रास्त्रोंको लेकर देवताओंपर टूट पड़े। इस समय नरके साथ-साथ पराक्रमी एवं सामर्थ्यशाली भगवान् विष्णुने उस अमृतको दानवेन्द्रोंसे छीन लिया॥ ९-१०॥ |
| ततो देवगणाः सर्वे पपुस्तदमृतं तदा।<br>विष्णोः सकाशात् सम्प्राप्य संग्रामे तुमुले सति॥ ११ | तदनन्तर सभी देवता उस तुमुल युद्धके बीच ही विष्णु भगवान्से उस अमृतको लेकर पान करने लगे। |
| ततः पिबत्सु तत्कालं देवेष्वमृतमीप्सितम्।<br>राहुर्विबुधरूपेण दानवोऽप्यपिबत् तदा॥ १२ | उस अभिलषित अमृतको पीते समय देवताओंके मध्यमें देवरूपधारी राहु नामक दानव भी अमृतका पान करने लगा। |
| तस्य कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा।<br>आख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया॥ १३ | वह अमृत उसके कण्ठदेशतक ही पहुँच पाया था कि देवताओंकी कल्याण-भावनासे प्रेरित होकर चन्द्रमा और सूर्यने उसके भेदको प्रकट कर दिया। |
| ततो भगवता तस्य शिरश्छिन्नमलंकृतम्।<br>चक्रायुधेन चक्रेण पिबतोऽमृतमोजसा॥ १४ | तब अमृत पीते हुए उस दानवके अलंकृत सिरको भगवान्ने अपने पराक्रमसे चक्रद्वारा काट दिया। |
| तच्छैलशृङ्गप्रतिमं दानवस्य शिरो महत्।<br>चक्रेणोत्कृत्तमपतच्चालयद् वसुधातलम्॥ १५ | फिर तो उस दानवका चक्रसे कटा हुआ पर्वतशिखरकी भाँति विशाल मस्तक वसुधातलको कँपाता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। |
| ततो वैरविनिर्बन्धः कृतो राहुमुखेन वै।<br>शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां प्रसह्माद्यापि बाधते॥ १६ | तभीसे राहुके उस मुखने चन्द्रमा और सूर्यके साथ अटूट वैर निश्चित कर दिया, जो आज भी उन्हें पीड़ा पहुँचाता है। |
| विहाय भगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः।<br>नानाप्रहरणैर्भीमैर्दानवान् समकम्पयत्।<br>प्रासाः सुविपुलास्तीक्ष्णाः पतन्तश्च सहस्रशः॥ १७ | तत्पश्चात् विष्णु भी उस अनुपम स्त्रीरूपको त्यागकर विविध प्रकारके भयंकर शस्त्रास्त्रोंद्वारा दानवोंको प्रकम्पित करने लगे। उस समय विशाल और तीखी धारवाले हजारों भाले दानवोंपर गिरने लगे। |
| तेऽसुराश्चक्रनिर्भिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु।<br>अशिशक्तिगदाभिन्ना निपेतुर्धरणीतले॥ १८ | भगवान्के चक्रसे छिन्न-भिन्न अङ्गोंवाले राक्षसगण अत्यधिक रक्त वमन करते हुए तलवार और गदाके प्रहारसे घायल होकर पृथ्वीतलपर गिरने लगे। |
| भिन्नानि पट्टिशैश्चापि शिरांसि युधि दारुणैः।<br>तप्तकाञ्चनमाल्यानि निपेतुर्निशं तदा॥ १९ | उस समय उस युद्धमें तपाये हुए स्वर्णकी मालाओंसे सुशोभित असुरोंके सिर भीषण पट्टिशोंके प्रहारसे विदीर्ण होकर निरन्तर गिर रहे थे। |
| रुधिरेणावलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः।<br>अद्रिणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते॥ २० | वहाँ रक्तसे लथपथ हुए अङ्गोंवाले मारे गये महान् असुर गेरूसे रँगे हुए पर्वतोंके शिखरोंकी भाँति सो रहे थे। |
| ततो हलहलाशब्दः सम्बभूव समन्ततः।<br>अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति॥ २१ | तदनन्तर सूर्यके लाल हो जानेपर परस्पर एक-दूसरेको शस्त्रोंद्वारा काटनेवालोंका महान् कोलाहल चारों ओर गूँज उठा। |
| परिघैश्चायसैः पातैः सन्निकर्षैश्च मुष्टिभिः।<br>निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत्॥ २२ | उस समरमें लोहनिर्मित परिघों और मुष्टियोंके प्रहारसे एक-दूसरेको मारनेवालोंका शब्द आकाश-मण्डलका स्पर्श-सा कर रहा था। |
| छिन्धि भिन्धि प्रधावेति पातयाभिसरेति वै।<br>विश्रूयन्ते महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः॥ २३ | उस समय वहाँ चारों ओर 'काट डालो, विदीर्ण कर दो, दौड़ो, गिरा दो, आगे बढ़ो'— इस प्रकारके महान् भयंकर शब्द सुनायी पड़ रहे थे। |