भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९६८ * मत्स्यपुराण *


स्तुवन्तश्चैव देवेशं प्रसन्नाश्चाभवंस्तदा।<br>कण्ठदेशे ततः प्राप्ते विषे देवमथाब्रुवन्॥ ५८<br>विरिञ्चिप्रमुखा देवा बलिप्रमुखतोऽसुराः।<br>शोभते देव कण्ठस्ते गात्रे कुन्दनिभप्रभे॥ ५९<br>भृङ्गमालानिभं कण्ठेऽप्यत्रैवास्तु विषं तव।<br>इत्युक्तः शंकरो देवस्तथा प्राह पुरान्तकृत्॥ ६०<br>पीते विषे देवगणान् विमुच्य<br>गतो हरो मन्दरशैलमेव।<br>तस्मिन् गते देवगणाः पुनस्तं<br>ममन्थुरब्धिं विविधप्रकारैः॥ ६१॥करने लगे तथा देवेशकी स्तुति करते हुए प्रसन्न हो गये। उस समय विषके भगवान् शंकरके गलेमें पहुँचनेपर ब्रह्मादि देवता और बलि आदि असुरोंने उनसे इस प्रकार कहा—'देव! कुन्दकी-सी उज्ज्वल कान्तिवाले आपके शरीरमें कण्ठकी विचित्र शोभा हो रही है। अब यह भृङ्गावलीकी भाँति काला विष यहीं आपके कण्ठमें स्थित रहे।' इस प्रकार कहे जानेपर त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरने 'तथास्तु—वैसा ही हो' यों कहकर उसे स्वीकार कर लिया। इस प्रकार विषपान कर लेनेके बाद शंकरजी देवताओंको वहीं छोड़ पुनः मन्दराचलको चले गये। उनके चले जानेपर देवगण पुनः उस समुद्रको विविध प्रकारसे मथने लगे॥ ५२–६१॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थने कालकूटोत्पत्तिर्नाम पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अमृतमन्थन-प्रसंगमें कालकूटोत्पत्ति नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५०॥


दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय

अमृतका प्राकट्य, मोहिनीरूपधारी भगवान् विष्णुद्वारा देवताओंका अमृत-पान तथा देवासुरसंग्राम

सूत उवाच<br>मथ्यमाने पुनस्तस्मिञ्जलधौ समदृश्यत।<br>धन्वन्तरिः स भगवानायुर्वेदप्रजापतिः॥ १<br>मदिरा चायताक्षी सा लोकचित्तप्रमाथिनी।<br>ततोऽमृतं च सुरभिः सर्वभूतभयापहा॥ २<br>जग्राह कमलां विष्णुः कौस्तुभं च महामणिम्।<br>गजेन्द्रं च सहस्राक्षो हयरत्नं च भास्करः॥ ३<br>धन्वन्तरिं च जग्राह लोकारोग्यप्रवर्तकम्।<br>छत्रं जग्राह वरुणः कुण्डले च शचीपतिः॥ ४<br>पारिजाततरुं वायुर्जग्राह मुदितस्तथा।<br>धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत॥ ५<br>श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति।<br>एतदत्यद्भुतं दृष्ट्वा दानवानां समुत्थितः॥ ६<br>अमृतार्थे महानादो ममेदमिति जल्पताम्।<br>ततो नारायणो मायामास्थितो मोहिनीं प्रभुः॥ ७<br>स्त्रीरूपमतुलं कृत्वा दानवानभिसंसृतः।<br>ततस्तदमृतं तस्यै ददुस्ते मूढचेतनाः।<br>स्त्रियै दानवदैतेयाः सर्वे तद्गतमानसाः॥ ८**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पुनः उस समुद्रके मथे जानेपर आयुर्वेदके प्रजापति भगवान् धन्वन्तरि दीख पड़े। पुनः लोगोंके चित्तको उन्मत्त कर देनेवाली एवं बड़ी आँखोंवाली मदिरा उत्पन्न हुई। तदनन्तर अमृत प्रकट हुआ, फिर सभी प्राणियोंके भयको दूर करनेवाली कामधेनु उत्पन्न हुई। उस समय भगवान् विष्णुने लक्ष्मी और महामणि कौस्तुभको तथा हजार नेत्रोंवाले इन्द्रने गजराज ऐरावतको ग्रहण किया। सूर्यने अश्वरत्न उच्चैःश्रवा और लोकमें आरोग्यके प्रवर्तक धन्वन्तरिको स्वीकार किया। वरुणने छत्रको और शचीपति इन्द्रने दोनों कुण्डलोंको ग्रहण किया। वायुदेवने बड़ी प्रसन्नतासे पारिजात वृक्षको ग्रहण किया। इसके बाद शरीरधारी धन्वन्तरि उठकर खड़े हुए। वे एक श्वेतवर्णका कमण्डलु धारण किए हुए थे, जिसमें अमृत भरा था। उस अत्यन्त अद्भुत पात्रको देखकर अमृतके लिये 'यह मेरा है, यह मेरा है' ऐसा बकनेवाले दानवोंके दलमें महान् कोलाहल मच गया। तब भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय लिया। वे स्त्रीका अनुपम रूप धारण कर दानवोंके समीप उपस्थित हुए। तब उन मुग्ध चित्तवाले दैत्योंनं उस अमृतको उस स्त्रीके हाथोंमें समर्पित कर दिया; क्योंकि उन सभी