भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९७६ * मत्स्यपुराण *


मूर्ध्न्यग्निः समादिष्टो मुखे चापः समाश्रितः।<br>पृथ्‍वीधरोऽर्यमा चैव स्कन्धयोस्तावधिष्ठितौ॥ ३९<br>वक्षःस्थले चापवत्सः पूजनीयः सदा बुधैः।<br>नेत्रयोर्दिति‍पर्जन्यौ श्रोत्रेऽदितिजयन्तकौ॥ ४०<br>सर्पेन्द्रावंससंस्थौ तु पूजनीयौ प्रयत्नतः।<br>सूर्यसोमादयस्तद्वद् बाह्वोः पञ्च च पञ्च च॥ ४१<br>रुद्रश्च राजयक्ष्मा च वामहस्ते समास्थितौ।<br>सावित्रः सविता तद्वद्धस्तं दक्षिणमास्थितौ॥ ४२<br>विवस्वानाथ मित्रश्च जठरे संव्यवस्थितौ।<br>पूषा च पापयक्ष्मा च हस्तयोर्मणिबन्धने॥ ४३<br>तथैवासुरशोषौ च वामपार्श्वं समाश्रितौ।<br>पार्श्वे तु दक्षिणे तद्वद् वितथः सबृहत्क्षतः॥ ४४<br>ऊर्वोर्यमाम्बुपौ ज्ञेयौ जान्वोर्गन्धर्वपुष्पकौ।<br>जङ्घयोर्भृङ्गसुग्रीवौ स्फिकस्थौ दौवारिको मृगः॥ ४५<br>जयशक्रौ तथा मेढ्रे पादयोः पितरस्तथा।<br>मध्ये नवपदे ब्रह्मा हृदये स तु पूज्यते॥ ४६उसके मस्तकपर अग्नि और मुखमें जलका निवास है, दोनों स्कन्धोंपर पृथ्‍वीधर तथा अर्यमा अधिष्ठित हैं। बुद्धिमान्‌को वक्षःस्थलपर आपवत्सकी पूजा करनी चाहिये। नेत्रोंमें दिति और पर्जन्य तथा कानोंमें अदिति और जयन्त हैं। कंधोंपर सर्प और इन्द्रकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार बाहुओंमें सूर्य और चन्द्रमासे लेकर पाँच-पाँच देवता स्थित हैं। रुद्र और राजयक्ष्मा—ये दोनों बायें हाथपर अवस्थित हैं। उसी प्रकार सावित्र और सविता दाहिने हाथपर स्थित हैं। विवस्वान् और मित्र—ये उदरमें तथा पूषा और पापयक्ष्मा—ये हाथोंके मणिबन्धोंमें स्थित हैं। उसी प्रकार असुर और शोष—ये बायें पार्श्वमें तथा दाहिने पार्श्वमें वितथ और बृहत्क्षत स्थित हैं। ऊरुभागोंपर यम और वरुण, घुटनोंपर गन्धर्व और पुष्पक, दोनों जंघोंपर क्रमशः भृङ्ग और सुग्रीव, दोनों नितम्बोंपर दौवारिक और मृग, लिङ्गस्थानपर जय और शक्र तथा पैरोंपर पितृगण स्थित हैं। मध्यके नौ पदोंमें, जो हृदय कहलाता है, ब्रह्माकी पूजा होती है॥ ३४—४६॥
चतुःषष्टिपदो वास्तुः प्रासादे ब्रह्मणा स्मृतः।<br>ब्रह्मा चतुष्पदस्तत्र कोणेष्वर्धपदस्तथा॥ ४७<br>बहिष्कोणेषु वास्तौ तु सार्धाश्चोभयसंस्थिताः।<br>विंशतिद्विपदाश्चैव चतुःषष्टिपदे स्मृताः॥ ४८<br>गृहारम्भेषु कण्डूतिः स्वाम्यङ्गे यत्र जायते।<br>शल्यं त्वपनयेत् तत्र प्रासादे भवने तथा॥ ४९<br>सशल्यं भयदं यस्मादशल्यं शुभदायकम्।<br>हीनाधिकाङ्गतां वास्तोः सर्वथा तु विवर्जयेत्॥ ५०<br>नगरग्रामदेशेषु सर्वत्रैवं विवर्जयेत्।<br>चतुःशालं त्रिशालं च द्विशालं चैकशालकम्।<br>नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि स्वरूपेण द्विजोत्तमाः॥ ५१ब्रह्माने प्रासादके निर्माणमें चौंसठ पदोंवाले वास्तुको श्रेष्ठ बतलाया है। उसके चार पदोंमें ब्रह्मा तथा उनके कोणोंमें आपवत्स, सविता आदि आठ देवगण स्थित हैं। वास्तुके बाहरवाले कोणोंमें भी अग्नि आदि आठ देवताओंका निवास है तथा दो पदोंमें जयन्त आदि बीस देवता स्थित हैं। इस प्रकार चौंसठ पदवाले वास्तुचक्रमें देवताओंकी स्थिति बतलायी गयी है। गृहारम्भके समय गृहपतिके जिस अङ्गमें खुजली जान पड़े, महल तथा भवनमें वास्तुके उसी अङ्गपर गड़ी हुई शल्य या कीलको निकाल देना चाहिये; क्योंकि शल्यसहित गृह भयदायक और शल्यरहित कल्याणकारक होता है। वास्तुका अधिक एवं हीन अङ्गका होना सर्वथा त्याज्य है। इसी प्रकार नगर, ग्राम और देश—सभी जगहपर इन दोषोंका परित्याग करना चाहिये। द्विजवरो! अब मैं चतुःशाल, त्रिशाल, द्विशाल तथा एकशालवाले भवनोंके नाम और स्वरूपका वर्णन करूँगा॥ ४७—५१॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे एकाशीतिपदवास्तुनिर्णयो नाम त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें इक्यासीपद-निर्णय नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५३॥