भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 985, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 985
* अध्याय २५३ *१७५
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
नामस्तस्तान् प्रवक्ष्यामि स्थानानि च निबोधत।<br>ईशानकोणादिषु तान् पूजयेद्धविषा नरः॥ २३<br>शिखी चैवाथ पर्जन्यो जयन्तः कुलिशायुधः।<br>सूर्यसत्यौ भृशश्चैव आकाशो वायुरेव च॥ २४<br>पूषा च वितथश्चैव बृहत्क्षतयमावुभौ*।<br>गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः पितृगणस्तथा॥ २५<br>दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः।<br>असुरः शोषपापौ च रोगोऽहिमुख्य एव च॥ २६<br>भल्लाटः सोमसर्पौ च अदितिश्च दितिस्तथा।<br>बहिर्द्वात्रिंशदेते तु तदन्तस्तु ततः शृणु॥ २७<br>ईशानादिचतुष्कोणसंस्थितान् पूजयेद् बुधः।<br>आपश्चैवाथ सावित्रो जयो रुद्रस्तथैव च॥ २८<br>मध्ये नवपदे ब्रह्मा तस्याष्टौ च समीपगान्।<br>साध्यानेकान्तरान् विद्यात् पूर्वाद्यान् नामतः शृणु॥ २९<br>अर्यमा सविता चैव विवस्वान् विबुधाधिपः।<br>मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधरः स्मृतः॥ ३०<br>अष्टमश्चापवत्सस्तु परितो ब्रह्मणः स्मृताः।<br>आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निर्दितिस्तथा॥ ३१<br>पदिकानां तु वर्गोऽयमेवं कोणेष्वशेषतः।<br>तन्मध्ये तु बहिर्विंशद् द्विपदास्ते तु सर्वशः॥ ३२<br>अर्यमा च विवस्वांश्च मित्रः पृथ्वीधरस्तथा।<br>ब्रह्मणः परितो दिक्षु त्रिपदास्ते तु सर्वशः॥ ३३करनी चाहिये। मैं उनके नाम और स्थान बतला रहा हूँ, आपलोग सुनिये। (इन्हें जानकर) मनुष्यको ईशान आदि कोणोंमें हविष्यद्वारा उन-उन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। शिखी, पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, अन्तरिक्ष, वायु, पूषा, वितथ, बृहत्क्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप, असुर, शोष, पाप, रोग, अहि, मुख्य, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति और दिति—ये बत्तीस बाह्य देवता हैं। बुद्धिमान् पुरुषको ईशान आदि चारों कोणोंमें स्थित इन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। अब वास्तु चक्रके भीतरी देवताओंके नाम सुनिये—आप, सावित्र, जय, रुद्र—ये चार चारों ओरसे तथा मध्यके नौ कोष्ठोंमें ब्रह्मा और उनके समीप अन्य आठ देवताओंकी भी पूजा करनी चाहिये। (ये सब मिलकर मध्यके तेरह देवता होते हैं।) ब्रह्माके चारों ओर स्थित ये आठ देवता, जो क्रमशः पूर्वादि दिशाओंमें दो-दोके क्रमसे स्थित रहते हैं, साध्यनामसे कहे जाते हैं। उनके नाम सुनिये—अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर तथा आठवें आपवत्स। आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि तथा दिति—ये पाँच देवताओंके वर्ग हैं। (इनकी पूजा अग्निकोणमें करनी चाहिये।) उनके बाहर बीस देवता हैं जो दो पदोंमें रहते हैं। अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर—ये चार ब्रह्माके चारों ओर तीन-तीन पदोंमें स्थित रहते हैं॥ २२–३३॥
वंशानिदानीं वक्ष्यामि ऋजूनपि पृथक् पृथक्।<br>वायुं यावत् तथा रोगात् पितृभ्यः शिखिनं पुनः॥ ३४<br>मुख्याद् भृशं तथा शोषाद् वितथं यावदेव तु।<br>सुग्रीवाददितिं यावन्मृगात् पर्जन्यमेव च॥ ३५<br>एते वंशाः समाख्याताः क्वचिच्च जयमेव तु।<br>एतेषां यस्तु सम्पातः पदं मध्यं समं तथा॥ ३६<br>मर्म चैतत् समाख्यातं त्रिशूलं कोणगं च यत्।<br>स्तम्भं न्यासेषु वर्ज्यानि तुलाविधिषु सर्वदा॥ ३७<br>कीलोच्छिष्टोपघातादि वर्जयेद् यत्नतो जनः।<br>सर्वत्र वास्तुनिर्दिष्टो पितृवैश्वानरायतः॥ ३८अब मैं उनके वंशोंको पृथक्-पृथक् संक्षेपमें कह रहा हूँ। वायुसे लेकर रोगपर्यन्त, पितृगणसे शिखीपर्यन्त, मुख्यसे भृशपर्यन्त, शोषसे वितथपर्यन्त, सुग्रीवसे अदितिपर्यन्त तथा मृगसे पर्जन्यपर्यन्त—ये ही वंश कहे जाते हैं। कहीं-कहीं मृगसे लेकर जयपर्यन्त वंश कहा गया है। पदके मध्यमें इनका जो सम्पात है, वह पद, मध्य तथा सम नामसे प्रसिद्ध है। त्रिशूल और कोणगामी मर्मस्थल कहे जाते हैं, जो सर्वदा स्तम्भन्यास और तुलाकी विधिमें वर्जित माने गये हैं। मनुष्यके लिये यत्नपूर्वक देवताके पदोंपर कीलें गाड़ना, जूठन फेंकना तथा चोटें पहुँचाना वर्जित है। यह वास्तु-चक्र, सर्वत्र पितृवर्गीय वैश्वानरके अधीन माना गया है।

* 'बृहत्क्षत' इति बृहत्संहितायां ५३।५४ स्थः पाठः।

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