भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 970, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 970
९६०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्वपक्षव्यजनेनाथ वीज्यमानं गरुत्मता।<br>स्तूयमानं समन्ताच्च सिद्धचारणकिंनरैः ॥ ३५<br>आम्नायैर्मूर्तिमद्भिः स्तूयमानं समन्ततः।<br>सव्यबाहूपधानं तं तुष्टुवुर्देवदानवाः।<br>कृताञ्जलिपुटाः सर्वे प्रणताः सर्वतोदिशम्॥ ३६कर रहे थे, गरुड़ अपने डैनारूपी पंखेसे जिनपर हवा कर रहे थे, चारों ओरसे सिद्ध, चारण और किन्नर जिनकी स्तुतिमें तन्मय थे, मूर्तिमान् वेद चारों ओरसे जिनकी स्तुति कर रहे थे तथा जो अपनी बायीं भुजाको तकिया बनाये हुए थे। तब वे सभी देव-दानव सब ओरसे हाथ जोड़कर प्रणाम करके उन भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ २९—३६॥
देवदानवा ऊचुः<br>नमो लोकत्रयाध्यक्ष तेजसा जितभास्कर।<br>नमो विष्णो नमो जिष्णो नमस्ते कैटभार्दन॥ ३७<br>नमः सर्गक्रियाकर्त्रे जगत्पालयते नमः।<br>रुद्ररूपाय शर्वाय नमः संहारकारिणे॥ ३८<br>नमः शूलायुधाधृष्य नमो दानवघातिने।<br>नमः क्रमत्रयाक्रान्त त्रैलोक्यायाभवाय च॥ ३९<br>नमः प्रचण्डदैत्येन्द्रकुलकालमहानल।<br>नमो नाभिह्रदोद्भूतपद्मगर्भ महाबल॥ ४०<br>पद्मभूत महाभूत कर्त्रे हर्त्रे जगत्प्रिय।<br>जनिता सर्वलोकेश क्रियाकारणकारिणे॥ ४१<br>अमरारिविनाशाय महासमरशालिने।<br>लक्ष्मीमुखाब्जमधुप नमः कीर्तिनिवासिने॥ ४२<br>अस्माकममरत्वाय ध्रियतां ध्रियतामयम्।<br>मन्दरः सर्वशैलानामयुतायुतविस्तृतः॥ ४३<br>अनन्तबलबाहुभ्यामवष्टभ्यैकपाणिना ।<br>मथ्यताममृतं देव स्वधास्वाहार्थकामिनाम्॥ ४४<br>ततः श्रुत्वा स भगवान् स्तोत्रपूर्वं वचस्तदा।<br>विहाय योगनिद्रां तामुवाच मधुसूदनः॥ ४५देवताओं और दैत्योंने कहा—त्रिलोकीनाथ ! आप अपने तेजसे सूर्यको पराजित करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुको प्रणाम है। जिष्णुको अभिवादन है। आप कैटभका वध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सृष्टि-कर्म करनेवालेको प्रणाम है। आप जगत्के पालनकर्ता हैं, आपको अभिवादन है। आप रुद्ररूपसे संहार करनेवाले हैं, आप शर्वको नमस्कार है। त्रिशूलरूप आयुधसे धर्षित न होनेवाले आपको प्रणाम है। दानवोंका वध करनेवाले आपको अभिवादन है। आप तीन पगसे त्रिलोकीको आक्रान्त कर लेनेवाले और अजन्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप प्रचण्ड दैत्येन्द्रोंके कुलके लिये कालरूप महान् अग्नि हैं, आपको प्रणाम है। महाबल ! आपके नाभि-कुण्डसे पद्मकी उत्पत्ति हुई है, आपको अभिवादन है। आप पद्मको उत्पन्न करनेवाले, महाभूत, जगत्‌के कर्ता, हर्ता और प्रिय, सभीके जनक, सभी लोकोंके स्वामी, कार्य और कारण—दोनोंका निर्माण करनेवाले, अमरोंके शत्रुओंका विनाश करनेके लिये महान् समर करनेवाले, लक्ष्मीके मुखकमलके मधुप और यशमें निवास करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप हमलोगोंकी अमरत्व-प्राप्तिके लिये सभी पर्वतोंमें विशाल मन्दराचलको, जो अयुतायुत योजन विस्तृत है, अवश्य धारण कीजिये। देव ! आप अपनी अनन्त बलशालिनी भुजाओंके द्वारा पर्वतको रोककर एक हाथसे स्वाहा-स्वधाके अभिलाषी देवताओंके उपकारार्थ अमृतका मन्थन कीजिये। तदनन्तर भगवान् मधुसूदन उस स्तुतिपूर्ण वचनको सुनकर उस योगनिद्राका परित्याग कर इस प्रकार बोले ॥ ३७-४५॥
श्रीभगवानुवाच<br>स्वागतं विबुधाः सर्वे किमागमनकारणम्।<br>यस्मात् कार्यादिह प्राप्तास्तद् ब्रूत विगतज्वराः॥ ४६<br>नारायणेनैवमुक्ताः प्रोचुस्तत्र दिवौकसः।<br>अमरत्वाय देवेश मध्यमाने महोदधौ ॥ ४७श्रीभगवान्‌ने कहा—देवगण ! आप सब लोगोंका स्वागत है। आपलोगोंके यहाँ आगमनका क्या उद्देश्य है? आपलोग जिस कार्यके लिये यहाँ आये हैं। उसे निश्चिन्त होकर बतलाइये। नारायणके ऐसा कहनेपर देवताओंने कहा—‘देवेश ! हमलोग अमरत्व-प्राप्तिके लिये
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