मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ९६२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततोऽतिवेगाज्जगृहुर्नागेन्द्रं सर्वतोऽसुराः ।<br>मन्थानं मन्थयष्टिस्तु मेरुस्तत्राचलोऽभवत् ॥ ६३<br>अभवच्चाग्रतो विष्णुर्भुजमन्दरबन्धनः ।<br>सवासुकिफणालग्नपाणिः कृष्णो व्यराजत ॥ ६४<br>यथा नीलोत्पलैर्युक्तो ब्रह्मदण्डोऽतिविस्तरः ।<br>ध्वनिर्मेघसहस्रस्य जलधेरुत्थितस्तदा ॥ ६५ | तब असुरोंने अत्यन्त वेगपूर्वक मथानी और शेषनागको चारों ओरसे पुनः पकड़ा। उस समय सुमेरु पर्वत मथानीका डंडा बना। भगवान् विष्णुने अग्रसर होकर अपनी भुजासे मन्दराचलको बाँध लिया। उस समय वासुसिके फणोंपर रखा हुआ उनका साँवला हाथ ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो नीले कमलोंसे युक्त अत्यन्त विशाल ब्रह्माण्ड हो। तत्पश्चात् समुद्रसे हजारों मेघकी-सी गर्जना उद्भूत हुई ॥ ५६—६५ ॥ |
| भागे द्वितीये मघवानादित्यस्तु ततः परम् ।<br>ततो रुद्रा महोत्साहा वसवो गुह्यकादयः ॥ ६६<br>पुरतो विप्रचित्तिश्च नमुचिर्वृत्रशम्बरौ ।<br>द्विमूर्धा वज्रदंष्ट्रश्च सैंहिकेयो बलिस्तथा ॥ ६७<br>एते चान्ये च बहवो मुखभागमुपस्थिताः ।<br>ममन्थुरम्बुधिं दृप्ता बलतेजोविभूषिताः ॥ ६८<br>बभूवात्र महाघोषो महामेघरवोपमः ।<br>उदधेर्मथ्यमानस्य मन्दरेण सुरासुरैः ॥ ६९<br>तत्र नानाजलचरा विनिर्धूता महाद्रिणा ।<br>विलयं समुपाजग्मुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७०<br>वारुणानि च भूतानि विविधानि महीधरः ।<br>पातालतलवासीनि विलयं समुपानयत् ॥ ७१<br>तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्रौ संघृष्टाश्च परस्परम् ।<br>न्यपतन् पतगोपेताः पर्वताग्रान्महाद्रुमाः ॥ ७२<br>तेषां संघर्षणाच्चाग्निरर्चिर्भिः प्रज्वलन् मुहुः ।<br>विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमवृणोन्मन्दरं गिरिम् ॥ ७३<br>ददाह कुञ्जरांश्चैव सिंहांश्चैव विनिःसृतान् ।<br>विगतासूनि सर्वाणि सत्त्वानि विविधानि च ॥ ७४ | शेषनागके दूसरे भागमें इन्द्र, उसके बाद आदित्य, उसके बाद महान् उत्साही रुद्रगण, वसुगण तथा गुह्यक आदि थे। आगेकी ओर विप्रचित्ति, नमुचि, वृत्र, शम्बर, द्विमूर्धा, वज्रदंष्ट्र, राहु तथा बलि थे। ये तथा इनके सिवा अन्य बहुत-से राक्षस मुखभागमें उपस्थित थे। बल और तेजसे विभूषित एवं गर्वसे भरे हुए वे सभी समुद्रका मन्थन कर रहे थे। देवताओं और दानवोंद्वारा मन्दराचलकी मथानीसे मन्थन किये जाते हुए समुद्रसे मेघगर्जनके समान भीषण ध्वनि निकलने लगी। वहाँ उस महान् मन्दराचलसे पिसे हुए नाना प्रकारके सैकड़ों-हजारों जलचर नष्ट हो गये। उस पर्वतने वरुणलोकके पाताललोकवासी अनेकों प्रकारके प्राणियोंको विनाशके पथपर पहुँचा दिया। उस पर्वतके घुमाये जाते समय उस मन्दराचलके ऊपर उगे हुए विशाल वृक्ष पक्षियोंसहित परस्परके संघर्षणसे टूट-टूटकर गिर रहे थे। उनके संघर्षणसे उत्पन्न हुई अग्निने बारंबार प्रज्वलित होकर अपनी लपटोंसे मन्दराचलको उसी प्रकार आच्छादित कर लिया, जैसे बिजलियाँ नीले मेघको ढक लेती हैं। उस अग्निने पर्वतसे निकले हुए सिंहों और हाथियोंको तथा अनेकों प्रकारके प्राणरहित सभी जीवोंको भस्म कर दिया ॥ ६६—७४ ॥ |
| तमग्निममरश्रेष्ठः प्रदहन्तमितस्ततः ।<br>वारिणा मेघजेनेन्द्रः शमयामास सर्वतः ॥ ७५ | तब देवश्रेष्ठ इन्द्रने इधर-उधर जलाती हुई उस अग्निको बादलके जलसे चारों ओरसे शान्त कर दिया। |
| ततो नानारसास्तत्र सुस्रुवुः सागराम्भसि ।<br>महाद्रुमाणां निर्यासा बहवश्चौषधीरसाः ॥ ७६<br>तेषाममृतवीर्याणां रसानां पयसैव च ।<br>अमरत्वं सुरा जग्मुः काञ्चनच्छविसंनिभाः ॥ ७७<br>अथ तस्य समुद्रस्य तज्जातमुदकं पयः ।<br>रसान्तरैर्विमिश्रश्च ततः क्षीरादभूद् घृतम् ॥ ७८ | तदनन्तर उस समुद्रके जलमें नाना प्रकारके रस, विशाल वृक्षोंके रस और ओषधियोंके रस अधिक मात्रामें टपकने लगे। उन अमृतके समान गुणकारी रसोंसे युक्त जलसे सुवर्णकी भाँति देदीप्यमान देवगण अमरताको प्राप्त हो गये। समुद्रका जल दुग्धके रूपमें परिणत हो गया था, पुनः अनेक प्रकारके रसोंके मिश्रणसे वह दुग्धसे घृतके |