मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २५० * | ९६३ |
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| ततो ब्रह्माणमासीनं देवा वचनमब्रुवन् ।<br>श्रान्ताः स्म सुभृशं ब्रह्मन् नोद्भवत्यमृतं च यत् ॥ ७९<br>ऋते नारायणात् सर्वे दैत्या देवोत्तमास्तथा ।<br>चिरायितमिदं चापि सागरस्य तु मन्थनम् ॥ ८०<br>ततो नारायणं देवं ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ।<br>विधत्स्वैषां बलं विष्णो भवानेव परायणम् ॥ ८१<br><br>विष्णुरुवाच<br>बलं ददामि सर्वेषां कर्मैतद् ये समास्थिताः ।<br>क्षुभ्यतां क्रमशः सर्वैर्मन्दरः परिवर्त्यताम् ॥ ८२ | रूपमें परिवर्तित हो गया। तब वहाँ बैठे हुए ब्रह्मासे देवताओने इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्! हमलोग बहुत थक गये हैं, किंतु जो अभीतक अमृत नहीं निकला, इसका कारण यह है कि भगवान् विष्णुको छोड़कर हम सभी देवगण तथा दैत्यगण समुद्रको मथनेमें देरी कर रहे हैं।' तब ब्रह्माने भगवान् विष्णुसे इस प्रकार कहा—'विष्णो! इन सबको बल प्रदान कीजिये; क्योंकि आप ही इनके शरणदाता हैं' ॥ ७५–८१ ॥<br><br>भगवान् विष्णु बोले—इस मन्थन-कार्यमें जितने लोग सम्मिलित हैं, उन सबको मैं बल प्रदान करता हूँ। अब सभी लोग मिलकर क्रमशः मन्दर पर्वतको घुमायें और सागरको क्षुब्ध करें॥ ८२ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थने एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अमृत-मन्थन नामक दो सौ उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २४९ ॥
दो सौ पचासवाँ अध्याय
अमृतार्थ समुद्र-मन्थन करते समय चन्द्रमासे लेकर विषतकका प्रादुर्भाव
| सूत उवाच<br>नारायणवचः श्रुत्वा बलिनस्ते महोदधौ ।<br>तत्पयः सहिता भूत्वा चक्रिरे भृशमाकुलम् ॥ १<br>ततः शतसहस्त्रांशुसमान इव सागरात् ।<br>प्रसन्नाभः समुत्पन्नः सोमः शीतांशुरुज्ज्वलः ॥ २<br>श्रीरनन्तरमुत्पन्ना घृतात् पाण्डुरवासिनी ।<br>सुरादेवी समुत्पन्ना तुरगः पाण्डुरस्तथा ॥ ३<br>कौस्तुभश्च मणिर्दिव्यश्रोत्पन्नोऽमृतसम्भवः ।<br>मरीचिविकचः श्रीमान् नारायण उरोगतः ॥ ४<br>पारिजातश्च विकचकुसुमस्तबकाञ्चितः ।<br>अनन्तरमपश्यंस्ते धूममम्बरसंनिभम् ॥ ५<br>आपूरितदिशाभागं दुःसहं सर्वदेहिनाम् ।<br>तमाघ्राय सुराः सर्वे मूर्च्छिताः परिलम्बिताः ॥ ६ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवान् विष्णुकी बात सुनकर वे बलवान् सम्मिलित होकर उस महासमुद्रमें उसकी जलराशिको अत्यन्त क्षुभित करने लगे। इसके बाद समुद्रसे सौ सूर्योंकी भाँति दीप्तिशाली शीतरश्मि उज्ज्वल चन्द्रमा उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् समुद्रके जलसे* पीले वस्त्रोंसे शोभित लक्ष्मी उत्पन्न हुईं, फिर सुरादेवी तथा पीले रंगका घोड़ा उत्पन्न हुआ। तदनन्तर नारायणके वक्षःस्थलपर शोभित होनेवाली किरणोंसे व्याप्त, शोभा-सम्पन्न तथा अमृतसे उत्पन्न होनेवाली दिव्य कौस्तुभमणि उत्पन्न हुई। पुनः अनेक खिले हुए पुष्पोंके गुच्छोंसे व्याप्त पारिजात प्रकट हुआ। तदुपरान्त देवताओं और दैत्योंने आकाशके समान नीले रंगके धुएँको निकलते हुए देखा, जो सभी दिशाओंमें परिव्याप्त और सभी प्राणियोंके लिये दुःसह था। उसे सँूघकर देवगण मूच्छित |
* निरुक्त ७। २४ और निघण्टु, १। १२ के अनुसार घृतका जल अर्थ वेदोंमें बहुधा युक्त हुआ है। लक्ष्मीके प्राकट्यके समय इसका प्रयोग आवश्यक था।