मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८० * मत्स्यपुराण *
| पञ्चत्रिंशत्करा वैश्ये ह्यङ्गुलानि त्रयोदश।<br>तावत्करैव शूद्रस्य युता पञ्चदशाङ्गुलैः ॥ ३६<br><br>शालायास्तु त्रिभागेन यस्याग्रे वीथिका भवेत्।<br>सोष्णीषं नाम तद्वास्तु पश्चाच्छ्रेयोच्छ्रयं भवेत् ॥ ३७<br><br>पार्श्वयोर्वीथिका यत्र सावष्टम्भं तदुच्यते।<br>समन्ताद्वीथिका यत्र सुस्थितं तदिहोच्यते ॥ ३८<br><br>शुभदं सर्वमेतत् स्याच्चातुर्वर्ण्ये चतुर्विधम्।<br>विस्तरात् षोडशो भागस्तथा हस्तचतुष्टयम् ॥ ३९<br><br>प्रथमो भूमिकोच्छ्राय उपरिष्टात् प्रहीयते।<br>द्वादशांशेन सर्वासु भूमिकासु तथोच्छ्रयः ॥ ४०<br><br>पक्केष्टका भवेद् भित्तिः षोडशांशेन विस्तरात्।<br>दारुवैरपि कल्प्या स्यात् तथा मृन्मयभित्तिका ॥ ४१<br><br>गर्भमानेन मानं तु सर्ववास्तुषु शस्यते।<br>गृहव्यासस्य पञ्चाशदष्टादशभिरङ्गुलैः ॥ ४२<br><br>संयुतो द्वारविष्कम्भो द्विगुणश्चोच्छ्रयो भवेत्।<br>द्वारशाखासु बाहुल्यमुच्छ्रायकरसम्मितैः ॥ ४३<br><br>अङ्गुलैः सर्ववास्तूनां शस्यते पृथुत्वं बुधैः।<br>उदुम्बरोत्तमाङ्गं च तदर्धार्धप्रविस्तरात् ॥ ४४ | वैश्यके लिये पैंतीस हाथ तेरह अङ्गुल लम्बी शाला होनी चाहिये। उतने ही हाथ तथा पंद्रह अङ्गुल शूद्रकी शालाका परिमाण है। शालाकी लम्बाईके तीन भागपर यदि सामनेकी ओर गली बनी हो तो वह 'सोष्णीष' नामक वास्तु है। पीछेकी ओर गली हो तो वह 'श्रेयोच्छ्रय' कहलाता है। यदि दोनों पार्श्वोंमें वीथिका हो तो वह 'सावष्टम्भ' तथा चारों ओर वीथिका हो तो 'सुस्थित' नामक वास्तु कहा जाता है। ये चारों प्रकारकी वीथियाँ चारों वर्णोंके लिये मङ्गलदायी हैं। शालाके विस्तारका सोलहवाँ भाग तथा चार हाथ—यह पहले खण्डकी ऊँचाईका मान है। अधिक ऊँचा करनेसे हानि होती है। उसके बाद अन्य सभी खण्डोंकी ऊँचाई बारहवें भागके बराबर रखनी चाहिये। यदि पक्की ईंटोंकी दीवाल बनायी जा रही हो तो गृहकी चौड़ाईके सोलहवें भागके परिमाणके बराबर मोटाई होनी चाहिये। वह दीवाल लकड़ी तथा मिट्टीसे भी बनायी जा सकती है। सभी वास्तुओंमें भीतरके मानके अनुसार लम्बाई-चौड़ाईका मान श्रेष्ठ माना गया है। गृहके व्याससे पचास अङ्गुल विस्तार तथा अठारह अङ्गुल वेधसे युक्त द्वारकी चौड़ाई रखनी चाहिये और उसकी ऊँचाई चौड़ाईसे दुगुनी होनी चाहिये। जितनी ऊँचाई द्वारकी हो उतनी ही दरवाजेमें लगी हुई शाखाओंकी भी होनी चाहिये। ऊँचाई जितने हाथोंकी हो उतने ही अङ्गुल उन शाखाओंकी मोटाई होनी चाहिये—यही सभी वास्तुविद्याके ज्ञाताओंने बताया है। द्वारके ऊपरका कलश (बुर्ज) तथा नीचेकी देहली (चौखट)—ये दोनों शाखाओंसे आधे अधिक मोटे हों, अर्थात् इन्हें शाखाओंसे ड्योढ़ा मोटा रखना चाहिये ॥ ३६—४४ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यासु गृहमाननिर्णयो नाम चतुःपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुप्रकरणमें गृह-मान-निर्णय नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५४ ॥