भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 991
  • अध्याय २५५ * १८१

दो सौ बचपनवाँ अध्याय

वास्तुविषयक वेधका विवरण

सूत उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि स्तम्भमानविनिर्णयम्।<br>कृत्वा स्वभवनोच्छ्रायं सदा सप्तगुणं बुधैः॥ १<br><br>अशीत्यंशः पृथुत्वे स्यादग्रे नवगुणे सति।<br>रुचकश्चतुरः स्यात् तु अष्टास्रो वज्र उच्यते॥ २<br><br>द्विवज्रः षोडशास्रस्तु द्वात्रिंशास्रः प्रलीनकः।<br>मध्यप्रदेशे यः स्तम्भो वृत्तो वृत्त इति स्मृतः॥ ३<br><br>एते पञ्च महास्तम्भाः प्रशस्ताः सर्ववास्तुषु।<br>पद्मवल्लीलताकुम्भपत्रदर्पणरूषिताः ॥ ४<br><br>स्तम्भस्य नवमांशेन पद्मकुम्भान्तराणि तु।<br>स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला ततः॥ ५<br><br>त्रिभागेनेह सर्वत्र चतुर्भागेन वा पुनः।<br>हीनं हीनं चतुर्थांशात् तथा सर्वासु भूमिषु॥ ६<br><br>वासगेहानि सर्वेषां प्रविशेद् दक्षिणेन तु।<br>द्वाराणि तु प्रवक्ष्यामि प्रशस्तानीह यानि तु॥ ७<br><br>पूर्वेणेन्द्रं जयन्तं च द्वारं सर्वत्र शस्यते।<br>याम्यं च वितथं चैव दक्षिणेन विदुबुर्धाः॥ ८<br><br>पश्चिमे पुष्पदन्तं च वारुणं च प्रशस्यते।<br>उत्तरेण तु भल्लाटं सौम्यं तु शुभदं भवेत्॥ ९<br><br>तथा वास्तुषु सर्वत्र वेधं द्वारस्य वर्जयेत्।<br>द्वारे तु रथ्यया विद्धे भवेत् सर्वकुलक्षयः॥ १०<br><br>तरुणा द्वेषबाहुल्यं शोकः पङ्केन जायते।<br>अपस्मारो भवेन्नूनं कूपवेधेन सर्वदा॥ ११<br><br>व्यथा प्रस्रवणेन स्यात् कीलेनाग्निभयं भवेत्।<br>विनाशो देवताविद्धे स्तम्भेन स्त्रीकृतो भवेत्॥ १२सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं स्तम्भके परिमाणके विषयमें बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे अपने गृहकी ऊँचाईके मानको सातसे गुणाकर उसके अस्सीवें भागके बराबर खम्भेकी मोटाई रखें। उसकी मोटाईमें नौसे गुणा कर अस्सीवें भागके बराबर खम्भेका मूलभाग रखना चाहिये। चार कोणवाला स्तम्भ 'रुचक', आठ कोणवाला 'वज्र', सोलह कोणवाला 'द्विवज्र' तथा बत्तीस कोणवाला 'प्रलीनक' कहा जाता है। मध्य प्रदेशमें जो खम्भा वृत्ताकार रहता है, उसे 'वृत्त' कहा गया है। ये पाँच प्रकारके स्तम्भ सभी प्रकारके वास्तु-कार्यमें प्रशंसनीय कहे गये हैं। ये सभी स्तम्भ पद्म, वल्ली, लता, कुम्भ, पत्र एवं दर्पणसे चित्रित रहने चाहिये। इन कमलों तथा कुम्भोंमें स्तम्भके नवें अंशके बराबर अन्तर रहना चाहिये। स्तम्भके बराबर ऊँचाईको 'तुला' तथा उससे न्यूनको 'उपतुला' कहते हैं। मानके तृतीय या चतुर्थ भागसे हीन जो तुला है, वही 'उपतुला' है। यह उपतुला सभी भूमियोंमें रहती है। सभी वास-गृहोंमें दाहिनी ओर प्रवेशद्वार रखना चाहिये। अब मैं गृहके जो प्रशस्तद्वार हैं, उन्हें बतला रहा हूँ। पूर्व दिशामें इन्द्र और जयन्तद्वार सभी गृहोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। बुद्धिमान् लोग दक्षिण द्वारोंमें याम्य और वितथको श्रेष्ठ मानते हैं। पश्चिम द्वारोंमें पुष्पदन्त और वरुण प्रशंसित हैं। उत्तर द्वारोंमें भल्लाट तथा सौम्य शुभदायक होते हैं। सभी वास्तुओंमें द्वारवेधको बचाना चाहिये। गली, सड़क या मार्गद्वारा द्वार-वेध होनेपर पूरे कुलका क्षय हो जाता है। वृक्षके द्वारा वेध होनेपर द्वेषकी अधिकता होती है। कीचड़से वेध होनेपर शोक होता है और कूपद्वारा वेध होनेपर अवश्य ही सदाके लिये मिरगीका रोग होता है। नाबदान या जलप्रवाहसे वेध होनेपर व्यथा होती है, कीलसे वेध होनेपर अग्निभय होता है, देवतासे विद्ध होनेपर विनाश तथा स्तम्भसे विद्ध होनेपर स्त्रीद्वारा क्लेशकी प्राप्ति होती है॥१—१२॥