भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९८२* मत्स्यपुराण *

| गृहभर्तुर्विनाशः स्याद् गृहेण च गृहे कृते।<br>अमेध्यावस्करैर्विद्धे गृहिणी बन्धकी भवेत्॥ १३<br>तथा शस्त्रभयं विद्यादन्त्यजस्य गृहेण तु।<br>उच्छ्रायाद् द्विगुणां भूमिं त्यक्त्वा वेधो न जायते॥ १४<br>स्वयमुद्घाटिते द्वारे उन्मादो गृहवासिनाम्।<br>स्वयं वा पिहिते विद्यात् कुलनाशं विचक्षणः॥ १५<br>मानाधिके राजभयं न्यूने तस्करतो भवेत्।<br>द्वारोपरि च यद् द्वारं तदन्तकमुखं स्मृतम्॥ १६<br>अध्वनो मध्यदेशे तु अधिको यस्य विस्तरः।<br>वज्रं तु संकटं मध्ये सद्यो भर्तुर्विनाशनम्॥ १७<br>तथान्यपीडितं द्वारं बहुदोषकरं भवेत्।<br>मूलद्वारात् तथान्यत् तु नाधिकं शोभनं भवेत्॥ १८<br>कुम्भश्रीपर्णीवल्लीभिर्मूलद्वारं तु शोभयेत्।<br>पूजयेच्चापि तन्नित्यं बलिना चाक्षतोदकैः॥ १९<br>भवनस्य वटः पूर्वे दिग्भागे सार्वकामिकः।<br>उदुम्बरस्तथा याम्ये वारुण्यां पिप्पलः शुभः॥ २०<br>प्लक्षश्चोत्तरतो धन्यो विपरीतास्त्वसिद्धये।<br>कण्टकी क्षीरवृक्षश्च आसनः सफलो द्रुमः॥ २१<br>भार्याहानौ प्रजाहानौ भवेतां क्रमशस्तदा।<br>न च्छिन्द्याद् यदि तानन्यानन्तरे स्थापयेच्छुभान्॥ २२<br>पुन्नागाशोकबकुलशमीतैलकचम्पकान् ।<br>दाडिमीपिप्पलीद्राक्षास्तथा कुसुममण्डपान्॥ २३<br>जम्बीरपूगपनसद्रुमकेतकीभि-<br>र्वातीसरोजशतपत्रिकमल्लिकाभिः।<br>बन्नारिकेलकदलीदलपाटलाभि-<br>र्युक्तं तदत्र भवनं श्रियमातनोति॥ २४ | एक घरसे दूसरे घरमें वेध पड़नेपर गृहपतिका विनाश होता है तथा अपवित्र द्रव्यादिद्वारा वेध होनेपर घरकी स्वामिनी वन्ध्या हो जाती है। अन्त्यजके घरके द्वारा वेध होनेपर हथियारसे भय प्राप्त होता है। गृहकी ऊँचाईसे दुगुनी भूमिकी दूरीपर वेधका दोष नहीं होता। जिस घरके द्वार बिना हाथ लगाये स्वयं खुल जाते हैं, उस घरके निवासियोंको उन्मादका रोग होता है। इसी प्रकार स्वयं बंद हो जानेपर कुलका नाश हो जाता है—ऐसा विद्वान् लोग बतलाते हैं। गृहके द्वार यदि अपने मानसे अधिक ऊँचे हैं तो राजभय तथा यदि नीचे हैं तो चोरोंका भय होता है। द्वारके ऊपर जो द्वार बनता है, वह यमराजका मुख कहा जाता है। मार्गके बीचमें बने हुए जिस गृहकी चौड़ाई बहुत अधिक होती है, वह वज्रके समान शीघ्र ही गृहपतिके विनाशका कारण होता है। यदि मुख्यद्वार अन्य द्वारोंसे निकृष्ट हो तो वह बहुत बड़ा दोषकारक होता है। अतः मुख्यद्वारकी अपेक्षा अन्य द्वारोंका बड़ा होना शुभकारक नहीं है। घट, श्रीपर्णी और लताओंसे मूलद्वारको सुशोभित रखना चाहिये और उसकी नित्य बलि, अक्षत और जलसे पूजा करनी चाहिये। घरकी पूर्व दिशामें बरगदका वृक्ष सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है। दक्षिणमें गूलर और पश्चिममें पीपलका पेड़ शुभकारक होता है। इसी तरह उत्तरमें पाकड़का पेड़ मङ्गलकारी है। इससे विपरीत दिशामें रहनेपर ये वृक्ष विपरीत फल देनेवाले होते हैं। घरके समीप यदि काँटे या दूधवाले वृक्ष, असनाका वृक्ष एवं फलदार वृक्ष हों तो उनसे क्रमशः स्त्री और संतानकी हानि होती है। यदि कोई उन्हें काट न सके तो उनके समीप अन्य शुभदायक वृक्षोंको लगा दे। पुंनाग, अशोक, मौलसिरी, शमी, तिलक, चम्पा, अनार, पीपली, दाख, अर्जुन, जंबीर, सुपारी, कटहल, केतकी, मालती, कमल, चमेली, मल्लिका, नारियल, केला एवं पाटल—इन वृक्षोंसे सुशोभित घर लक्ष्मीका विस्तार करता है॥ १३–२४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यासु वेधपरिवर्जनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके वास्तु-विद्या-प्रसङ्गमें वेधविवरण नामक दो सौ पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५५ ॥