मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २५६ * | १८३ |
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दो सौ छप्पनवाँ अध्याय
वास्तुप्रकरणमें गृह-निर्माणविधि
| सूत उवाच | |
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| उदगादिप्लवं वास्तु समानशिखरं तथा।<br>परीक्ष्य पूर्ववत् कुर्यात् स्तम्भोच्छ्रायं विचक्षणः॥ १<br><br>न देवधूर्तसचिवचत्वराणां समीपतः।<br>कारयेद् भवनं प्राज्ञो दुःखशोकमयं ततः॥ २<br><br>तस्य प्रदेशाश्चत्वारस्तथोत्सर्गोऽग्रतः शुभः।<br>पृष्ठतः पृष्ठभागस्तु सव्यावर्तः प्रशस्यते॥ ३<br><br>अपसव्यो विनाशाय दक्षिणे शीर्षकस्तथा।<br>सर्वकामफलो नृणां सम्पूर्णो नाम वामतः॥ ४<br><br>एवं प्रदेशमालोक्य यत्नेन गृहमारभेत्।<br>अथ सांवत्सरोक्ते मुहूर्ते शुभलक्षणे॥ ५<br><br>रत्नोपरि शिलां कृत्वा सर्वबीजसमन्विताम्।<br>चतुर्भिर्ब्राह्मणैः स्तम्भं कारयित्वा सुपूजितम्॥ ६<br><br>शुक्लाम्बरधरः शिल्पिसहितो वेदपारगः।<br>स्नापितं विन्यसेत् तद्वत् सर्वौषधिसमन्वितम्॥ ७<br><br>नानाक्षतसमोपेतं वस्त्रालङ्कारसंयुतम्।<br>ब्रह्मघोषेण वाद्येन गीतमङ्गलनिःस्वनैः॥ ८<br><br>पायसं भोजयेद् विप्रान् होमं तु मधुसर्पिषा।<br>वास्तोष्पते प्रतिजानीहि मन्त्रेणानेन सर्वदा॥ ९<br><br>सूत्रपाते तथा कार्यमेवं स्तम्भोदये पुनः।<br>द्वारवंशोच्छ्रये तद्वत् प्रवेशसमये तथा॥ १०<br><br>वास्तूपशमने तद्वद् वास्तुयज्ञस्तु पञ्चधा।<br>ईशाने सूत्रपातः स्यादाग्नेये स्तम्भारोपणम्॥ ११<br><br>प्रदक्षिणं च कुर्वीत वास्तोः पदविलेखनम्।<br>तर्जनी मध्यमा चैव तथाङ्गुष्ठस्तु दक्षिणे॥ १२<br><br>प्रवालरत्नकनकफलं पिष्ट्वा कृतोदकम्।<br>सर्ववास्तुविभागेषु शस्तं पदविलेखने॥ १३ | **सूतजी कहते हैं—*ऋषियो ! बुद्धिमान् पुरुष उत्तरकी ओर झुकी हुई या समान भागवाली भूमिकी परीक्षा कर पूर्व कही गयी रीतिसे स्तम्भकी ऊँचाई आदिका निर्माण कराये। बुद्धिमान् पुरुषको देवालय, धूर्त, सचिव या चौराहेके समीप अपना घर नहीं बनवाना चाहिये; क्योंकि इससे दुःख, शोक और भय बना रहता है। घरके चारों ओर तथा द्वारके सम्मुख और पीछे कुछ भूमिको छोड़ देना शुभकारक है। पिछला भाग दक्षिणावर्त रहना ठीक है; क्योंकि वामावर्त विनाशकारक होता है। दक्षिण भागमें ऊँचा रहनेवाला घर 'सम्पूर्ण' वास्तुके नामसे अभिहित किया जाता है। वह मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करता है। इस प्रकारके प्रदेशको देखकर प्रयत्नपूर्वक गृह आरम्भ करना चाहिये। सर्वप्रथम वेदज्ञ पुरोहित श्वेत वस्त्र धारण कर कारीगरके साथ ज्योतिषीके कथनानुसार शुभ मुहूर्तमें सभी बीजोंसे युक्त आधार-शिलाको रत्नके ऊपर स्थापित करे। पुनः चार ब्राह्मणोंद्वारा उस स्तम्भकी भलीभाँति पूजा कराकर उसे धो-पोंछकर अक्षत, वस्त्र, अलंकार और सर्वौषधिसे पूजितकर पूर्ववत् मन्त्रोच्चारण, बाजा और माङ्गलिक गीत आदिके शब्दके साथ स्थापित कर दे। ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराये और 'वास्तोष्पते प्रतिजानीहि' (ऋक्संहिता ७।५४।१) इस मन्त्रके द्वारा मधु और घीसे हवन करे। वास्तुयज्ञ पाँच प्रकारके हैं—सूत्रपात, स्तम्भारोपण, द्वारवंशोच्छ्रय (चौखट-स्थापन), गृहप्रवेश और वास्तु-शान्ति। इन सभीमें पूर्ववत् कार्य करनेका विधान है। ईशानकोणमें सूत्रपात और अग्निकोणमें स्तम्भारोपण होता है। वास्तुके पदचिह्नोंको बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। सभी वास्तु-विभागोंमें दाहिने हाथकी तर्जनी, मध्यमा और अङ्गूठेसे मूँगा, रत्न और सुवर्णके चूर्णसे मिश्रित जलद्वारा पद-चिह्न बनाना श्रेष्ठ माना गया है॥ १—१३ ॥ |
* यह पूरा मन्त्र इस प्रकार है—वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान्स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥ (ऋ० ७।५४।१, तैत्ति० सं० ३।४।१०।१)