भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८३ अयुग्म संख्याओं में ग्यारह, नौ, सात, पाँच, तीन या एक मार्ग होने चाहिये। युग्म ( सम ) अथवा अयुग्म ( विषम ) पदों में दो, तीन एवं एक अज ( ब्रह्मा ) का भाग होता है।।५३।। नगरादीनामेवं मार्गान्युदितानि सर्वेषाम् । दण्डवदेका वीथी तद्दण्डकमित्यभीष्टं स्यात् ॥५४॥ इस प्रकार सभी नगरादिकों के मार्गों का वर्णन किया गया है। दण्ड के समान एक वीथी ( मार्ग ) को दण्डक कहते हैं।।५४।। उत्तरदिङ्मुखमेकं तन्मध्ये सम्प्रयुक्तं चेत् । कर्तरिदण्डकमुदितं प्राचीनौ कुट्टिमौ तर्हि ॥५५॥ उत्तर दिशा से आता हुआ एक मार्ग यदि पूर्वोक्त मार्ग के साल मध्य में संयुक्त होता है तो उसे कर्तरिदण्डक कहते हैं। यदि पूर्व दिशा से ईंटों से निर्मित दो मार्ग आते हैं—।।५५।। तद् बाहुदण्डकं स्याद् दिक्षु चतुर्द्वारसंयुक्तम् । बहुकुट्टिमसंयुक्तं मध्ये वीथ्या द्विपाश्र्वे तु ॥५६॥ शेषं पूर्ववदिष्टं कुटिकामुखदण्डकं प्रोक्तम् । तो उसे बाहुदण्डक कहा जाता है। यदि चारो दिशाओं में द्वार हों तथा वीथी के मध्य में दोनों पार्श्वों में बहुत से कुट्टिमयुक्त ( ईंटों से निर्मित ) मार्ग आकर मिलें एवं शेष स्थिति पूर्ववर्णित रहे तो उसे कुटिकामुख दण्डक कहते हैं।।५६।। प्राचीनोदीचीनैर्मार्गैस्त्रिभिरेव संयुक्तम् ॥५७॥ तत् कलकाबन्धदण्डकमिति तज्ज्ञैः समुद्दिष्टम् । पूर्व से आने वाले तीन मार्ग तथा उत्तर से आने वाले तीन मार्ग जब आपस में संयुक्त होते हैं तो उसे कलकाबन्धदण्डक कहा गया है।।५७।। प्राङ्मुखवीथ्यस्तिस्रश्चोत्तरमार्गास्त्रियश्चैव ॥५८॥ एकैकान्तरितास्ते कुट्टिममार्गास्त्वनेकाश्च । वेदीभद्रकमुदितं नगरादीनामिदं शस्तम् ॥५९॥ यदि पूर्व से तीन मार्ग एवं उत्तर से तीन मार्ग निकलें तथा इनमें एक-एक के बाद अनेक कुट्टिममार्ग हों तो उसे वेदीभद्रक कहते हैं। यह मार्ग-योजना नगरादिकों के लिये उपयुक्त होती है।।५८-५९।। स्वस्तिकमुदितं ग्रामे यथा तथा स्वस्तिकं विद्यात् । प्रागुत्तरमुखमार्गाः षट्षडभीष्टास्तु तद्बाह्ये ॥६०॥