मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ मयमतम् (कोयला), स्नायु (चमड़े की डोरी), सींग, बाँस एवं इन्धन की लकड़ी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये।।४७।। तृणचर्मशाकयुक्तं सवल्कलं सारदारुयुतम्। दुर्गं दुर्गममुक्तं दुर्लङ्घ्यं दुरवगाहं च।।४८।। दुर्ग में तृण (पशुओं का चारा), चमड़ा, शाक (तरकारी), छाल से युक्त काष्ठ एवं कठोर काष्ठ प्रभूत मात्रा में होना चाहिये। दुर्ग को कठिनाई से प्रवेश करने योग्य, कठिनाई से लाँघने योग्य तथा कठिनाई से पार करने योग्य होना चाहिये—ऐसा कहा गया है।।४८।। रक्षार्थं च जयार्थं हारिभिरभेदं च दुर्गमिष्टं स्यात्। इन्द्रश्च वासुदेवो गुहो जयन्तश्च वैश्रवणः।।४९।। अश्विनौ श्रीमदिरे शिवश्च दुर्गा सरस्वती चेति। प्राकारान्तर्दिव्या दुर्गनिवेशे च विज्ञेयाः।।५०।। रक्षा के लिये, विजय के लिये एवं शत्रुओं द्वारा अभेद्यता के लिये दुर्ग की आवश्यकता होती है। दुर्ग-निवेश के समय प्राकार के भीतर इन्द्र, वासुदेव, गुह, जयन्त, कुबेर, दोनों अश्विनीकुमार, श्री, मदिरा, शिव, दुर्गा तथा सरस्वती देवी- देवताओं को स्थापित करना चाहिये।।४९-५०।। एवं दुर्गविधानं सम्यक् प्रोक्तं पुरातनैर्मुनिभिः। इस प्रकार प्राचीन मनीषयों ने दुर्ग-विधान का वर्णन किया है। ❋ नगरविन्यासः ❋ सर्वेषां विन्यासं संक्षेपाद् वक्ष्यते क्रमशः।।५१।। नगर-योजना—अब क्रमशः सभी (नगरों) का विन्यास संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है।।५१।। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गा द्वादश दश वाऽष्टषट्चतुर्युगलम्। तावदुदीचीनास्ते तत्रैवायुग्मसंख्या वा।।५२।। पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले मार्गों की संख्या बारह, दश, आठ, छः, चार या दो होनी चाहिये। इसी प्रकार उत्तर (से दक्षिण जाने वाले) मार्गों की भी योजना रखनी चाहिये। अथवा अयुग्म (विषम) संख्या में मार्ग होने चाहिये।।५२।। एकादशनवसप्तकपञ्चगुणा वैकमार्गा वा। युग्मायुग्मपदेषु द्व्येकत्रिभिरंशकैरजांशाः स्युः।।५३।।