मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८१ में काष्ठ की स्थूणा ( खम्भा ) से युक्त कक्ष होना चाहिये, जिसमें मिण्ठक ( द्वार पर लटकने वाली विशेष आकृति ) लगा हो। उस कक्ष में प्रवेश हेतु सीढ़ियाँ बनी होनी चाहिये, जो छिपी हों ॥४१॥ द्वाराणि मण्डपसभाशालाकाराणि कार्याणि । द्वादश सालाकाराश्चतुरं वृत्तं तदायतं च पुनः ॥४२॥ नन्द्यावर्तं कौक्कुटमिभकुम्भं नागवृत्तं च। मग्नचतुरं त्रिकोणमष्टास्रं नेमिखण्डं च ॥४३॥ द्वारों को मण्डप, सभा अथवा शाला के आकार का बनाना चाहिये। इनकी योजना बारह में से किसी एक प्रकार की होनी चाहिये। बारह आकृति-योजनायें इस प्रकार हैं—चौकोर, वृत्त, आयत, नन्द्यावर्त, कुक्कुट, इभ ( गजाकृति ), कुम्भ, नागवृत्त ( कुण्डलीयुक्त सर्प ), मग्नचतुर ( गोलाई वाले कोने से युक्त चौकोर ), त्रिकोण, अष्टकोण तथा नेमिखण्ड ( कुछ गोलाई लिये आकृति )॥४२-४३॥ प्राकाराश्चेष्टकया द्वादशहस्तोच्छिताहीनाः । उत्सेधार्धविशाला मूले भित्तिः ससञ्चारा ॥४४॥ ईंटों से निर्मित प्राकार की उँचाई कम से कम बारह हाथ रखनी चाहिये। प्राकार के मूल की चौड़ाई ऊँचाई की आधी होनी चाहिये। भित्ति इतनी चौड़ी होनी चाहिये, जिससे उस पर सुगमता से चला जा सके ॥४४॥ सालस्याभ्यन्तरतः पांसुचयोपर्यनेकयन्त्रयुतम् । परितः परिखोपेतं पांसुचये संहताट्टालम् ॥४५॥ प्राकार के भीतरी भाग में पांसुचय ( कच्ची मिट्टी की जोड़ाई ) के ऊपर अनेक सुरक्षायन्त्र लगाना चाहिये। चारो ओर परिखा ( खाई ) होनी चाहिये एवं पांसुचय के ऊपर अट्टालक बनाना चाहिये ॥४५॥ परितः शिबिरोपेतं नानाजनवाससङ्कीर्णम् । नृपभवनसमोपेतं हस्त्यश्वरथपदातिबहुमुख्यम् ॥४६॥ इसके चारो ओर सैनिकों की छावनी होनी चाहिये। दुर्ग में विभिन्न प्रकार के लोगों का आवास, राजभवन तथा गज, अश्व, रथ एवं पैदल सेना होनी चाहिये ॥४६॥ धान्यैस्तैलैः क्षारैः सलवणभैषज्यगन्धविषम् । लोहाङ्गारस्नायुविषाणवेण्विन्धनैर्युक्तम् ॥४७॥ दुर्ग के भीतर अन्न, तेल, क्षार, नमक, औषधियाँ, सुगन्ध, विष, धातुयें, अङ्गार मय ०-६