भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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८० मयमतम्

  • दुर्गाणि * गिरिवनजलपङ्केरिणदैवतमिश्राणि सप्त दुर्गाणि ॥३६॥ दुर्ग के प्रकार—दुर्ग सात प्रकार के होते हैं—गिरिदुर्ग, वनदुर्ग, जलदुर्ग, पङ्क- दुर्ग, इरिण (मरु) दुर्ग, दैवतदुर्ग एवं मिश्रित दुर्ग।।३६।। गिरिमध्यं गिरिपार्श्वं गिरिशिखरं पार्वतं दुर्गम्। अजलं तरुवनगहनं वनदुर्गं तदुभयन्तु मिश्रं स्यात् ॥३७॥ गिरिदुर्ग पर्वत के मध्य, पर्वत के बगल या पर्वत के शिखर पर स्थित होता है। वनदुर्ग की स्थिति जलहीन स्थान पर वृक्षों के सघन वन में होती है। मिश्रित दुर्ग में गिरि एवं वन दोनों दुर्गों के मिश्रित लक्षण होते हैं।।३७।। दैवं तु सहजदुर्गं पङ्कयुतं पङ्कदुर्गं स्यात्। नद्यब्धिपरिवृतं यज्जलदुर्गं निर्वनोदमिरिणं स्यात् ॥३८॥ जिस दुर्ग की सुरक्षा-व्यवस्था प्राकृतिक होती है, उसे दैवदुर्ग कहते हैं। जिस दुर्ग के बाहर कीचड़ (दलदल) हो, उसे पङ्कदुर्ग कहते हैं। चारो ओर नदी या समुद्र से घिरे दुर्ग को जलदुर्ग तथा वन एवं जल से रहित (ऊषर या रेगिस्तान क्षेत्र में स्थित) दुर्ग को इरिण दुर्ग कहते हैं॥३८॥ अक्षयजलान्नशस्त्रं ह्यतिविपुलोत्तुङ्गघनसालम्। सर्वं हि दुर्गजातं सप्राकारं त्वनेकमुखरक्षम् ॥३९॥ दुर्ग प्रत्येक दृष्टि से सभी लक्षणों से परिपूर्ण होना चाहिये। दुर्ग में अक्षय जल, अन्न एवं शस्त्रास्त्र होना चाहिये। दुर्ग अत्यन्त विस्तृत, उन्नत एवं ठोस होना चाहिये। उसे प्राकार-मण्डल एवं सभी द्वारों पर रक्षकों से युक्त होना चाहिये।।३९।। बहिरुदकरहितवनच्छन्नपथं दुष्प्रवेशं च। गोपुरमण्डपयुक्तं सोपानच्छन्नमच्छन्नम् ।।४०।। बाहर से दुर्ग में प्रवेश हेतु ऐसा मार्ग होना चाहिये, जिस पर जल न हो, वन द्वारा छिपा हो तथा इस मार्ग से दुर्ग में प्रवेश कठिनाई से होता हो। दुर्ग का प्रवेशद्वार गोपुरमण्डप से युक्त, सोपानयुक्त हो एवं ढका न हो।।४०।। द्विकवाटचतुष्परिघार्गलहस्तोन्नतेन्द्रकीलयुतम् । सस्थूणमध्यमालयमिण्ठकसहितं सगूढसोपानम् ॥४१॥ प्रवेशद्वार पर दो कपाट हों, जिनमें चार परिघार्गल (द्वार को खुलने से रोकने के लिये लगी अर्गला) तथा एक हाथ ऊँची इन्द्रकील लगी होनी चाहिये। द्वार पर मध्य