भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७९ परनृपदेशसमीपे युद्धारम्भक्रियोपेतम् ॥२९॥ सेनासेनापतियुतमिदमुदितं शिबिरमिति च वरैः । सर्वजनैः सङ्कीर्णं नृपभवनयुतं तदेव तथा ॥३०॥ बहुरक्षोपेतं यत् सेनामुखमुच्यते तज्ज्ञैः । शत्रु-देश के समीप स्थित, युद्ध प्रारम्भ करने के लिये सभी सामग्रियों से युक्त तथा सेना एवं सेनापति से युक्त स्थान को शिविर कहते हैं। वही स्थान सभी प्रकार के लोगों के आवास से युक्त एवं राजभवन से युक्त होता है तथा बहुत-सी सेनाओं से युक्त होता है, तो उसे सेनामुख कहते हैं।।२९-३०।। नद्यद्रिपार्श्वयुक्तं नृपभवनयुतं सबहुरक्षम् ॥३१॥ यन्नृपतिस्थापितकं तत्स्थानीयं समुद्दिष्टम् । नदी के किनारे या पर्वत के पास, राजभवन तथा बहुत से सैनिकों से युक्त तथा राजा के द्वारा स्थापित स्थान को स्थानीय कहते हैं।।३१।। नद्यब्धिदक्षिणादक्षिणभागवणिगादिसंयुक्तम् ॥३२॥ सर्वजनावासं यद् द्रोणमुखं प्रोक्तमाचार्यैः । ग्रामसमीपे जनतालयमिदमुदितं विडम्बमिति ॥३३॥ नदी के उत्तर एवं दक्षिण दोनों भागों में अथवा समुद्र के किनारे बसे हुये स्थान को द्रोणमुख कहते हैं। यहाँ व्यापारी वर्ग (प्रधान रूप से) तथा अन्य सभी वर्गों के लोग निवास करते हैं। ग्राम के समीप जनावास को विडम्ब कहा जाता है।।३२-३३।। वनमध्ये जनवासं यत्कोत्मकोलकं प्रोक्तम्। चातुर्वर्ण्यसमेतं सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥३४॥ बहुकर्मकारयुक्तं यन्निगमं तत् समुद्दिष्टम् । वन के मध्य में स्थित जनस्थान को कोत्मकोलक कहा जाता है। जो स्थान चारो वर्गों के लोगों से युक्त हो, सभी प्रकार के लोगों से बसा हो तथा अधिक संख्या में जहाँ हस्तशिल्पी निवास करते हों, उसे निगम कहते हैं।।३४।। नद्यद्रिवनसमेतं बहुजनयुक्तं सनृपवासम् ॥३५॥ एतत् स्कन्धावारं तत्पार्श्वे चेरिका प्रोक्ता। नदी, पर्वत एवं वन से युक्त, जहाँ की जनसंख्या अधिक हो एवं जहाँ राजा निवास करते हों; ऐसे स्थान को स्कन्धावार कहते हैं। इसके पार्श्व में चेरिका जनावास होता है।।३५।।