मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
८० मयमतम्
- दुर्गाणि * गिरिवनजलपङ्केरिणदैवतमिश्राणि सप्त दुर्गाणि ॥३६॥ दुर्ग के प्रकार—दुर्ग सात प्रकार के होते हैं—गिरिदुर्ग, वनदुर्ग, जलदुर्ग, पङ्क- दुर्ग, इरिण (मरु) दुर्ग, दैवतदुर्ग एवं मिश्रित दुर्ग।।३६।। गिरिमध्यं गिरिपार्श्वं गिरिशिखरं पार्वतं दुर्गम्। अजलं तरुवनगहनं वनदुर्गं तदुभयन्तु मिश्रं स्यात् ॥३७॥ गिरिदुर्ग पर्वत के मध्य, पर्वत के बगल या पर्वत के शिखर पर स्थित होता है। वनदुर्ग की स्थिति जलहीन स्थान पर वृक्षों के सघन वन में होती है। मिश्रित दुर्ग में गिरि एवं वन दोनों दुर्गों के मिश्रित लक्षण होते हैं।।३७।। दैवं तु सहजदुर्गं पङ्कयुतं पङ्कदुर्गं स्यात्। नद्यब्धिपरिवृतं यज्जलदुर्गं निर्वनोदमिरिणं स्यात् ॥३८॥ जिस दुर्ग की सुरक्षा-व्यवस्था प्राकृतिक होती है, उसे दैवदुर्ग कहते हैं। जिस दुर्ग के बाहर कीचड़ (दलदल) हो, उसे पङ्कदुर्ग कहते हैं। चारो ओर नदी या समुद्र से घिरे दुर्ग को जलदुर्ग तथा वन एवं जल से रहित (ऊषर या रेगिस्तान क्षेत्र में स्थित) दुर्ग को इरिण दुर्ग कहते हैं॥३८॥ अक्षयजलान्नशस्त्रं ह्यतिविपुलोत्तुङ्गघनसालम्। सर्वं हि दुर्गजातं सप्राकारं त्वनेकमुखरक्षम् ॥३९॥ दुर्ग प्रत्येक दृष्टि से सभी लक्षणों से परिपूर्ण होना चाहिये। दुर्ग में अक्षय जल, अन्न एवं शस्त्रास्त्र होना चाहिये। दुर्ग अत्यन्त विस्तृत, उन्नत एवं ठोस होना चाहिये। उसे प्राकार-मण्डल एवं सभी द्वारों पर रक्षकों से युक्त होना चाहिये।।३९।। बहिरुदकरहितवनच्छन्नपथं दुष्प्रवेशं च। गोपुरमण्डपयुक्तं सोपानच्छन्नमच्छन्नम् ।।४०।। बाहर से दुर्ग में प्रवेश हेतु ऐसा मार्ग होना चाहिये, जिस पर जल न हो, वन द्वारा छिपा हो तथा इस मार्ग से दुर्ग में प्रवेश कठिनाई से होता हो। दुर्ग का प्रवेशद्वार गोपुरमण्डप से युक्त, सोपानयुक्त हो एवं ढका न हो।।४०।। द्विकवाटचतुष्परिघार्गलहस्तोन्नतेन्द्रकीलयुतम् । सस्थूणमध्यमालयमिण्ठकसहितं सगूढसोपानम् ॥४१॥ प्रवेशद्वार पर दो कपाट हों, जिनमें चार परिघार्गल (द्वार को खुलने से रोकने के लिये लगी अर्गला) तथा एक हाथ ऊँची इन्द्रकील लगी होनी चाहिये। द्वार पर मध्य
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८१ में काष्ठ की स्थूणा ( खम्भा ) से युक्त कक्ष होना चाहिये, जिसमें मिण्ठक ( द्वार पर लटकने वाली विशेष आकृति ) लगा हो। उस कक्ष में प्रवेश हेतु सीढ़ियाँ बनी होनी चाहिये, जो छिपी हों ॥४१॥ द्वाराणि मण्डपसभाशालाकाराणि कार्याणि । द्वादश सालाकाराश्चतुरं वृत्तं तदायतं च पुनः ॥४२॥ नन्द्यावर्तं कौक्कुटमिभकुम्भं नागवृत्तं च। मग्नचतुरं त्रिकोणमष्टास्रं नेमिखण्डं च ॥४३॥ द्वारों को मण्डप, सभा अथवा शाला के आकार का बनाना चाहिये। इनकी योजना बारह में से किसी एक प्रकार की होनी चाहिये। बारह आकृति-योजनायें इस प्रकार हैं—चौकोर, वृत्त, आयत, नन्द्यावर्त, कुक्कुट, इभ ( गजाकृति ), कुम्भ, नागवृत्त ( कुण्डलीयुक्त सर्प ), मग्नचतुर ( गोलाई वाले कोने से युक्त चौकोर ), त्रिकोण, अष्टकोण तथा नेमिखण्ड ( कुछ गोलाई लिये आकृति )॥४२-४३॥ प्राकाराश्चेष्टकया द्वादशहस्तोच्छिताहीनाः । उत्सेधार्धविशाला मूले भित्तिः ससञ्चारा ॥४४॥ ईंटों से निर्मित प्राकार की उँचाई कम से कम बारह हाथ रखनी चाहिये। प्राकार के मूल की चौड़ाई ऊँचाई की आधी होनी चाहिये। भित्ति इतनी चौड़ी होनी चाहिये, जिससे उस पर सुगमता से चला जा सके ॥४४॥ सालस्याभ्यन्तरतः पांसुचयोपर्यनेकयन्त्रयुतम् । परितः परिखोपेतं पांसुचये संहताट्टालम् ॥४५॥ प्राकार के भीतरी भाग में पांसुचय ( कच्ची मिट्टी की जोड़ाई ) के ऊपर अनेक सुरक्षायन्त्र लगाना चाहिये। चारो ओर परिखा ( खाई ) होनी चाहिये एवं पांसुचय के ऊपर अट्टालक बनाना चाहिये ॥४५॥ परितः शिबिरोपेतं नानाजनवाससङ्कीर्णम् । नृपभवनसमोपेतं हस्त्यश्वरथपदातिबहुमुख्यम् ॥४६॥ इसके चारो ओर सैनिकों की छावनी होनी चाहिये। दुर्ग में विभिन्न प्रकार के लोगों का आवास, राजभवन तथा गज, अश्व, रथ एवं पैदल सेना होनी चाहिये ॥४६॥ धान्यैस्तैलैः क्षारैः सलवणभैषज्यगन्धविषम् । लोहाङ्गारस्नायुविषाणवेण्विन्धनैर्युक्तम् ॥४७॥ दुर्ग के भीतर अन्न, तेल, क्षार, नमक, औषधियाँ, सुगन्ध, विष, धातुयें, अङ्गार मय ०-६
८२ मयमतम् (कोयला), स्नायु (चमड़े की डोरी), सींग, बाँस एवं इन्धन की लकड़ी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये।।४७।। तृणचर्मशाकयुक्तं सवल्कलं सारदारुयुतम्। दुर्गं दुर्गममुक्तं दुर्लङ्घ्यं दुरवगाहं च।।४८।। दुर्ग में तृण (पशुओं का चारा), चमड़ा, शाक (तरकारी), छाल से युक्त काष्ठ एवं कठोर काष्ठ प्रभूत मात्रा में होना चाहिये। दुर्ग को कठिनाई से प्रवेश करने योग्य, कठिनाई से लाँघने योग्य तथा कठिनाई से पार करने योग्य होना चाहिये—ऐसा कहा गया है।।४८।। रक्षार्थं च जयार्थं हारिभिरभेदं च दुर्गमिष्टं स्यात्। इन्द्रश्च वासुदेवो गुहो जयन्तश्च वैश्रवणः।।४९।। अश्विनौ श्रीमदिरे शिवश्च दुर्गा सरस्वती चेति। प्राकारान्तर्दिव्या दुर्गनिवेशे च विज्ञेयाः।।५०।। रक्षा के लिये, विजय के लिये एवं शत्रुओं द्वारा अभेद्यता के लिये दुर्ग की आवश्यकता होती है। दुर्ग-निवेश के समय प्राकार के भीतर इन्द्र, वासुदेव, गुह, जयन्त, कुबेर, दोनों अश्विनीकुमार, श्री, मदिरा, शिव, दुर्गा तथा सरस्वती देवी- देवताओं को स्थापित करना चाहिये।।४९-५०।। एवं दुर्गविधानं सम्यक् प्रोक्तं पुरातनैर्मुनिभिः। इस प्रकार प्राचीन मनीषयों ने दुर्ग-विधान का वर्णन किया है। ❋ नगरविन्यासः ❋ सर्वेषां विन्यासं संक्षेपाद् वक्ष्यते क्रमशः।।५१।। नगर-योजना—अब क्रमशः सभी (नगरों) का विन्यास संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है।।५१।। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गा द्वादश दश वाऽष्टषट्चतुर्युगलम्। तावदुदीचीनास्ते तत्रैवायुग्मसंख्या वा।।५२।। पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले मार्गों की संख्या बारह, दश, आठ, छः, चार या दो होनी चाहिये। इसी प्रकार उत्तर (से दक्षिण जाने वाले) मार्गों की भी योजना रखनी चाहिये। अथवा अयुग्म (विषम) संख्या में मार्ग होने चाहिये।।५२।। एकादशनवसप्तकपञ्चगुणा वैकमार्गा वा। युग्मायुग्मपदेषु द्व्येकत्रिभिरंशकैरजांशाः स्युः।।५३।।
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८३ अयुग्म संख्याओं में ग्यारह, नौ, सात, पाँच, तीन या एक मार्ग होने चाहिये। युग्म ( सम ) अथवा अयुग्म ( विषम ) पदों में दो, तीन एवं एक अज ( ब्रह्मा ) का भाग होता है।।५३।। नगरादीनामेवं मार्गान्युदितानि सर्वेषाम् । दण्डवदेका वीथी तद्दण्डकमित्यभीष्टं स्यात् ॥५४॥ इस प्रकार सभी नगरादिकों के मार्गों का वर्णन किया गया है। दण्ड के समान एक वीथी ( मार्ग ) को दण्डक कहते हैं।।५४।। उत्तरदिङ्मुखमेकं तन्मध्ये सम्प्रयुक्तं चेत् । कर्तरिदण्डकमुदितं प्राचीनौ कुट्टिमौ तर्हि ॥५५॥ उत्तर दिशा से आता हुआ एक मार्ग यदि पूर्वोक्त मार्ग के साल मध्य में संयुक्त होता है तो उसे कर्तरिदण्डक कहते हैं। यदि पूर्व दिशा से ईंटों से निर्मित दो मार्ग आते हैं—।।५५।। तद् बाहुदण्डकं स्याद् दिक्षु चतुर्द्वारसंयुक्तम् । बहुकुट्टिमसंयुक्तं मध्ये वीथ्या द्विपाश्र्वे तु ॥५६॥ शेषं पूर्ववदिष्टं कुटिकामुखदण्डकं प्रोक्तम् । तो उसे बाहुदण्डक कहा जाता है। यदि चारो दिशाओं में द्वार हों तथा वीथी के मध्य में दोनों पार्श्वों में बहुत से कुट्टिमयुक्त ( ईंटों से निर्मित ) मार्ग आकर मिलें एवं शेष स्थिति पूर्ववर्णित रहे तो उसे कुटिकामुख दण्डक कहते हैं।।५६।। प्राचीनोदीचीनैर्मार्गैस्त्रिभिरेव संयुक्तम् ॥५७॥ तत् कलकाबन्धदण्डकमिति तज्ज्ञैः समुद्दिष्टम् । पूर्व से आने वाले तीन मार्ग तथा उत्तर से आने वाले तीन मार्ग जब आपस में संयुक्त होते हैं तो उसे कलकाबन्धदण्डक कहा गया है।।५७।। प्राङ्मुखवीथ्यस्तिस्रश्चोत्तरमार्गास्त्रियश्चैव ॥५८॥ एकैकान्तरितास्ते कुट्टिममार्गास्त्वनेकाश्च । वेदीभद्रकमुदितं नगरादीनामिदं शस्तम् ॥५९॥ यदि पूर्व से तीन मार्ग एवं उत्तर से तीन मार्ग निकलें तथा इनमें एक-एक के बाद अनेक कुट्टिममार्ग हों तो उसे वेदीभद्रक कहते हैं। यह मार्ग-योजना नगरादिकों के लिये उपयुक्त होती है।।५८-५९।। स्वस्तिकमुदितं ग्रामे यथा तथा स्वस्तिकं विद्यात् । प्रागुत्तरमुखमार्गाः षट्षडभीष्टास्तु तद्बाह्ये ॥६०॥
८४ मयमतम् मार्ग की स्वस्तिक-योजना स्वस्तिक ग्राम के लिये कही गई है। इसमें छः मार्ग पूर्व से एवं छः मार्ग उत्तर से निकलते हैं।।६०।। प्रागिव मार्गोपेतं वीथिपदं स्वस्तिकं चैव । पूर्व-वर्णित मार्ग-योजना के अनुसार मार्गों की रचना स्वस्तिक होती है। प्राचीनोदीचीनाश्चत्वारश्चैव मार्गाः स्युः ॥६१॥ ब्रह्मावृतपथमेकं कुट्टिममार्गास्त्रयः प्राच्याम् । एतद् भद्रकमुदितं नाम्ना नगरादिविन्यासम् ॥६२॥ पूर्व से एवं उत्तर से निकलने वाले मार्गों की संख्या चार होती है। एक मार्ग ब्रह्मस्थान से निकलता है। तीन कुट्टिममार्ग पूर्व दिशा में होते हैं। इस मार्गयोजना को भद्रक कहा जाता हैं। इस मार्गयोजना का प्रयोग नगरादि के विन्यास में किया जाता है।।६१-६२।। प्राङ्मुखमार्गाः पञ्चैवोत्तरमार्गास्तथैव स्युः । बहुकुट्टिमसंयुक्तं भद्रमुखं नाम वस्तु स्यात् ॥६३॥ पाँच मार्ग पूर्व दिशा से एवं पाँच मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। बहुत से कुट्टिम मार्ग निकलते हैं। इस मार्गयोजना को भद्रमुख कहते हैं।।६३।। प्राचीनास्तु षडेवैवोत्तरवक्त्रास्तथा मार्गाः । यद् बहुकुट्टिमयुक्तं तद्वस्तु च भद्रकल्याणम् ॥६४॥ छः मार्ग पूर्व दिशा से एवं छः मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं तथा बहुत से कुट्टिम मार्ग होते हैं, तो उसे भद्रकल्याण मार्गयोजना कहते हैं।।६४।। पूर्वापरमुखमार्गाः सप्तैवोदङ्मुखाश्च तथा । शेषं प्रागिव सर्वं विन्यासं तन्महाभद्रम् ॥६५॥ पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले सात मार्ग तथा उत्तर से (दक्षिण की ओर जाने वाले) सात मार्ग हों तथा शेष योजना पूर्ववत् (बहुत से कुट्टिम मार्ग) हो तो उसे महाभद्र मार्गयोजना कहते हैं।।६५।। अष्टौ पूर्वमुखास्ते मार्गाश्चाष्टावुदग्वक्त्राः । द्वादशमार्गोपेतं बह्वर्गलकुट्टिमैर्युक्तम् ॥६६॥ यत्तद्वस्तुसुभद्रं नाम्ना विन्यासमुद्दिष्टम् । आठ मार्ग पूर्व दिशा से एवं आठ मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। (इनके अतिरिक्त) बारह मार्गों एवं बहुत से अर्गल कुट्टियों से (अर्गला के समान आपस में
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८५ गुम्फित ) युक्त मार्ग-विन्यास को वस्तुसुभद्र कहते हैं।।६६।। नवनवमार्गाश्चैते प्राचीनाश्चाप्युदीचीनाः ।।६७।। द्वारोपद्वारयुतं कुट्टिममार्गार्गलैर्युक्तम् । राजगृहोपेतं यन्नगरं नाम्ना जयाङ्गं स्यात् ।।६८।। नौ द्वार पूर्व से निकलते हों तथा नौ द्वार उत्तर से निकलते हों, इन मार्गों पर द्वार एवं उपद्वार ( छोटे प्रवेशद्वार ) हों, इन मार्गों के साथ अर्गल-कुट्टिम मार्ग भी हों तथा नगर में राजगृह भी हो तो उसकी संज्ञा जयाङ्ग होती है।।६७-६८।। प्राचीना दश मार्गाश्चोत्तरमार्गास्तथैव स्युः । नृपमन्दिरसंयुक्तं युक्त्यानेकार्गलोपेतम् ।।६९।। बहुकुट्टिमसंयुक्तं विजयं नाम्ना वरैः प्रोक्तम् । पूर्व दिशा से दश मार्गों का प्रारम्भ होता हो तथा उत्तर दिशा से भी दश मार्ग निकलते हों; साथ ही इन मार्गों के साथ अनेक अर्गलायुक्त कुट्टिम मार्ग हों तथा नगर में राजभवन भी हो तो उसे श्रेष्ठ जनों ने विजय संज्ञा प्रदान की है।।६९।। प्राचीनास्त्वेकादश मार्गा रुद्रा उदीचीनाः ।।७०।। ब्रह्मांशादपरांशो यदभीष्टं तत्र नृपवासम् । तन्मुखतोऽदभ्रमहाङ्गणकं स्यादिष्टभागे तु ।।७१।। ( सर्वतोभद्र योजना में ) पूर्व से ग्यारह मार्ग तथा उत्तर से ग्यारह मार्ग निकलते हों, ब्रह्मभाग के पश्चिम में इच्छित स्थान पर राजा का आवास हो, उसके सम्मुख बहुत विशाल आँगन होना चाहिये।।७०-७१।। तत्रान्तःपुरवासं शेषं सर्वं समुन्नेयम् । तत्राागुदग्गतमार्गा सा कथिता राजवीथीति ।।७२।। इसके पश्चात् अभीष्ट स्थान पर रानियों का आवास होना चाहिये। पूर्व से निकले मार्ग को राजवीथी कहते हैं।।७२।। तस्या द्विपार्श्वयोः स्यात्सैश्वर्याणां तु मालिकापङ्क्तिः । तत्पार्श्वयोर्निवासो वणिजां स्यात्तस्य दक्षिणतः ।।७३।। स्यात्तन्तुवायवासं ह्युत्तरतश्चक्रिणां वासम् । तत्तज्जात्यन्तरगृहमथ तत्सामीप्यतः कुर्यात् ।।७४।। राजवीथी के दोनों पार्श्वों में धनाढ्य लोगों की मालिका-पङ्क्ति ( भवनों की पङ्क्ति ) होनी चाहिये। उनके पार्श्वों में व्यापारियों का आवास होना चाहिये। उसके दक्षिण में
८६ मयमतम् तन्तुवायों ( जुलाहों ) का आवास होना चाहिये। उसके उत्तर में कुम्हारों का आवास होना चाहिये और इनके समीप ही जात्यन्तरों ( छोटी जाति वालों ) का आवास होना चाहिये।।७३-७४।। शेषं प्रागिव सर्वं योग्यं तत्सर्वतोभद्रम्। एवं षोडश भेदा ह्युदिताश्चाद्यैर्मुनीन्द्रैस्तु ।।७५।। शेष सभी पूर्ववर्णित नियमों के अनुसार होना चाहिये। यह सर्वतोभद्र व्यवस्था है। इस प्रकार प्राचीन मुनियों ने नगर के सोलह भेदों का वर्णन किया है।।७५।। मार्गच्छेदं नेष्टं पदमध्ये चत्वरं न स्यात्। शेषं युक्त्यानुक्तं सम्यग्योज्यं नृपेच्छया तज्ज्ञैः ।।७६।। क्षुद्राणामपि चैषां मध्यानां चापि सर्वेषाम्। नगर के मध्य पद में न तो मार्ग बाधित होना चाहिये तथा न ही वहाँ चौराहा होना चाहिये। शेष की योजना राजा की इच्छानुसार मध्य में करनी चाहिये, जिनका यहाँ वर्णन नहीं किया गया है।।७६।। ✺ अन्तरापणम् ✺ तत्र कुटुम्बावलिकं वक्ष्येऽहं चान्तरापणकम् ।।७७।। हाट-योजना—अब मैं ( मय ) कुटुम्बावलिक ( परिवारों के आवास की पंक्ति ) तथा बाजारों का वर्णन करता हूँ।।७७।। परितो रथपथयुक्तं मध्ये वणिजां गृहश्रेणी । तद्दक्षिणतः पार्श्वे गेहं स्यात्तन्तुवायानाम् ।।७८।। बाजार के चारो ओर रथ के चलने योग्य मार्ग हों एवं मध्य में व्यापारियों के गृहों की पङ्क्ति होनी चाहिये। उनके दक्षिण पार्श्व में जुलाहों के गृह होने चाहिये।।७८।। उत्तरतस्तद्वासावलिकं स्याच्चक्रिकाणां तु। कर्मोपजीविनां स्याद्वासं रथपथ्यनेकानाम् ।।७९।। उत्तर भाग में कुम्हारों के भवन होने चाहिये। अन्य शिल्पियों के गृह भी रथमार्ग से संयुक्त होने चाहिये।।७९।। ब्रह्मावृतपथमेकं तत्रान्तरापणं कार्यम् । ताम्बूलादि फलञ्च प्रोक्तं सारान्वितं द्रव्यम् ।।८०।। जो मार्ग ब्रह्म-पद को घेरता हो, उस पर पान, फल एवं सारयुक्त सामग्रियों का हाट बनाना चाहिये।।८०।।
२. अध्याय ८-१६: पाषाण, इष्टिका, दारु (काष्ठ) चयन एवं प्रासाद-अधिष्ठान
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८७ ईशानादिमहेन्द्रद्वारान्तं चान्तरापणकम् । तत्रैव मत्स्यमांसं शुष्कं शाकञ्च विज्ञेयम् ॥८१॥ ईशान से महेन्द्र पद तक हाट-बाजार निर्मित करना चाहिये। वहीं पर मछली, माँस, सूखे पदार्थ एवं शाक (सब्जी, तरकारी) का हाट भी होना चाहिये॥८१॥ महेन्द्राद्यग्न्यन्तं भक्ष्यं भोज्यं च निर्दिष्टम् । अग्न्यादि गृहक्षतपर्यन्तं तत्र भाण्डानि ॥८२॥ महेन्द्र पद से प्रारम्भ कर अग्निकोण-पर्यन्त भक्ष्य एवं भोज्य (खाने-पीने योग्य) पदार्थों का हाट होना चाहिये तथा अग्नि से गृहक्षतपर्यन्त भाण्डों (बरतन) का हाट होना चाहिये॥८२॥ तस्मान्निऋर्तिपदान्तं कंसादिकमत्र विज्ञेयम् । स्यात् पुष्पदन्तभागान्तं पितृभागादि वस्त्रं स्यात् ॥८३॥ गृहक्षत से निऋर्ति के पद तक कांस्य आदि धातुओं से निर्मित पदार्थों का हाट होना चाहिये। पितृपद से पुष्पदन्त के पद तक वस्त्रों का हाट होना चाहिये॥८३॥ तस्मात् समीरणान्तं तण्डुलधान्यादिकं च कटम् । स्याद् भल्लाटपदान्तं वास्त्रादिकं वस्त्रकादीनाम् ॥८४॥ पुष्पदन्त से समीर पदपर्यन्त चावल, अन्न एवं भूसे के बाजार होने चाहिये। वायु से भल्लाट के पद तक वस्त्र आदि के हाट होने चाहिये॥८४॥ तत्रैव लावणादिद्रव्यं तैलादिकं ज्ञेयम् । तस्मादीशपदान्तं गन्धं पुष्पादिकं विहितम् ॥८५॥ उसी स्थान पर नमक आदि पदार्थ एवं तेल आदि का हाट होना चाहिये। भल्लाट से ईश तक सुगन्ध एवं पुष्प आदि का हाट होना चाहिये॥८५॥ एवं नवान्तरापणमुदितं तत्परितस्तु मध्ये । अभ्यन्तरगतमार्गेष्वथ रत्नं हाटकं वस्त्रम् ॥८६॥ इस प्रकार वसति-विन्यास (नगरादि) में चारो ओर नौ प्रकार के हाटों का वर्णन किया गया है। मध्य भाग में जाने वाले मार्गों पर रत्न, सुवर्ण एवं वस्त्रों का हाट होना चाहिये॥८६॥ माञ्जिष्ठं तु मरीचं पिप्पलकं चापि हारिद्रम् । मधुघृततैलादिकमथ भैषज्यं सर्वतः कार्यम् ॥८७॥ इनके अतिरिक्त माञ्जिष्ठ (मजीठ, रंग), काली मिर्च, पीपल, हारिद्र (हल्दी),
८८ मयमतम् शहद, घी, तेल तथा औषध के हाट सभी स्थानों पर होने चाहिये ।।८७।। आर्यपदे च विवस्वति मित्रे पृथिवीधरे च पदे । शास्ता दुर्गा गजमुखलक्ष्म्यौ चात्रैव विज्ञेयाः ॥८८॥ आर्य, विवस्वान्, मित्र एवं पृथिवीधर के पद पर शास्ता, दुर्गा, गजमुख एवं लक्ष्मी का स्थान होना चाहिये ।।८८।। देवालयमथ परितो ग्रामे यथा तथा विहितम् । परितः सर्वजनालयमुदितं किञ्चित्ततो दूरे ॥८९॥ जिस प्रकार ग्राम में उसी प्रकार ( नगर आदि में भी ) चारो ओर देवालय होना चाहिये। इससे कुछ दूर सभी वर्ण के मनुष्यों का आवास होना चाहिये।।८९।। नगराद् द्विशतं दण्डं नीत्वा प्राच्यां तु वाग्नेय्याम् । चण्डालकुटीराणि तत्रैव तु कोलिकानां तु ॥९०॥ नगर से दो सौ दण्ड दूर ले जाकर पूर्व अथवा आग्नेय कोण में चण्डालों एवं कोलिकों के कुटीर होने चाहिये।।९०।। अस्मिन् सर्वमनुक्तं ग्रामे तु यथा तथा विहितम् । पत्तनमृजुवीथियुतं नैव स्यादन्तरापणं तत्र । शेषाणामपि तत्तद्योग्यवशात्तत्र विज्ञेयम् ॥९१॥ यहाँ जिन सबका वर्णन नहीं किया गया है, वे सब उसी प्रकार होंगे, जैसे ग्रामों में वर्णित हैं। पत्तन में एक ऋजुपथ ( सीधी सड़क ) होती है एवं वहाँ बाजार नहीं होते हैं। शेष नगर आदि स्थानों में यथोचित ( आवश्यकतानुसार ) हाट आदि होना चाहिये।।९१।। स्थानीयदुर्गपुरपत्तनकोत्मकोल- द्रोणामुखानि निगमञ्च तथैव खेटम् । ग्रामञ्च खर्वटमितीह दशैव युक्त्या- धिष्ठानकानि कथितानि पुरातनार्यैः ॥९२॥ प्राचीन आचार्यों ने दस प्रकार के वासयोग्य अधिष्ठानों का वर्णन किया है— स्थानीय, दुर्ग, पुर, पत्तन, कोत्मकोल, द्रोणमुख, निगम, खेट, ग्राम तथा खर्वट। ( इनकी स्थापना भौगोलिक स्थिति के अनुसार होती है )।।९२।। एवं प्रोक्तं भूमिदेवादिकानां वर्णानां चाप्यत्र जात्यन्तराणाम् । ग्रामादीनां मानविन्यासमार्गं सालङ्कारं चारु संक्षिप्य तन्त्रात् ।।९३।।
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८९ इस प्रकार तन्त्रों से ग्रहण कर संक्षेप में भूमि, देवताओं, चारो वर्णों, जात्यन्तरों ( सङ्कर जाति ), ग्रामादि के प्रमाण, मार्ग-विन्यास का सुन्दर सजावट के साथ वर्णन किया गया है।।९३।। दत्तान्नृपः स्थपतिकादिचतुष्टयेभ्यो मानादिकर्मनिपुणेभ्य इडां च गाञ्च। नित्यं यथा जगति वित्तमनेकवस्तू- न्याचन्द्रतारमधिवासभुवं मुदा सः ॥९४॥ इति मयमते वस्तुशास्त्रे नगरविधानो नाम दशमोऽध्यायः राजा को मापन आदि कार्य में निपुण चारो स्थपति आदि को गाय एवं पृथिवी प्रदान करना चाहिये। ऐसा करने से जब तक संसार में चन्द्रमा एवं तारे रहेंगे तब तक वह राजा प्रसन्नतापूर्वक पृथिवी पर धन आदि अनेक समृद्धिदायक वस्तुओं से युक्त एवं सर्वदा प्रसन्न रहता है।।९४।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. वप्र-( प्राकार )-निर्माण ( श्लोक १३-१६ ) समराङ्गणसूत्रधार (१०.१६-२५) के अनुसार पुर के बाहर वप्रभूमि का निर्माण करना चाहिये। महारथ्या के प्रमाण से वप्र-भूमि के बाहर तीन परिखाओं का निर्माण होता है। परिखाओं को खोदने से निकली मृत्तिका से इसका निर्माण होता है। इसकी ऊँचाई गज के पेट या पीठ के बराबर रखनी चाहिये। इसके ऊपरी तल को दृढ़ बनाना चाहिये। इसके ऊर्ध्व भाग को पत्थर एवं शिलाओं से दृढ़ बना कर इसके ऊपर प्राकार का निर्माण किया जाता है। २. राजधानी ( श्लोक १९-२६ ) मानसार के अनुसार जिस नगर में विष्णु भगवान् का देवालय हो, उसे राजधानी कहते हैं— तत्रागते नगर्यन्तं यदि विष्ण्वालयं भवेत्।। राजधानीति तन्नाम विद्वद्भिर्वक्ष्यते सदा। ( मानसार-१०.२३-२४ )
९० मयमतम् विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (४.९) में बीस नगरों के अन्तर्गत बीसवें नगर के रूप में राजधानी की चर्चा की गई है। समराङ्गणसूत्रधार (१८.२) के अनुसार जिस नगर में राजा हो, उसे राजधानी कहते हैं— यत्रास्ते नगरे राजा राजधानीं तु तां विदुः। ३. केवल नगर ( श्लोक १९-२१ ) मानसार (१०.२४-२६) के अनुसार चारो दिशाओं में गोपुरयुक्त चार द्वार, रक्षा- गृह एवं सैन्य-आवास, व्यापारियों से युक्त एवं देवालयों से युक्त स्थान केवल नगर होता है। ४. खेट, खर्वट, कुब्ज, पत्तन, शिविर, सेनामुख, स्थानीय, द्रोणमुख, विडम्ब, कोत्मकोलक, निगम एवं स्कन्धावार ( श्लोक-२६-३६ ) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (८), मानसार (१०), समराङ्गणसूत्रधार (१८) में इन सबका वर्णन नगर के भेदों के रूप में किया गया है। विशेष वर्णन इस प्रकार है— (क) समराङ्गणसूत्रधार (१८) के अनुसार कर्वट (खर्वट) नगर के सदृश, निगम कर्वट से गुणों में कम होता है— शाखानगरमेवाहुः कर्वटं नगरोपमम्। ऊनं कर्वटमेवेह गुणैर्निर्गम उच्यते।।३।। पत्तन राजा का दूसरा निवास होता है— उपस्थानं भवेद्राज्ञां यत्र तत्पत्तनं विदुः।।५।। खेट कों नगर के आधे विष्कम्भ माप का कहा गया है— खेटं तदर्धविष्कम्भमाहुः। (१०.७९) इसमें बीस मार्ग होते हैं— विंशतिः खेटके मार्गाः। (१०.८२) (ख) मानसार (१०) के अनुसार नदी एवं पर्वत से सटे शूद्रालययुक्त स्थान खेट कहे जाते हैं— नदीपर्वतप्रान्ते च शूद्रालयसमन्वितम्। महाप्रावृतसंयुक्तं खेटमुक्तं पुरातनैः।।२९।। खर्वट पर्वतों से युक्त, अनेक जातियों के आवास से युक्त एवं सभी प्रचार से संयुक्त होता है—
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ९१ परितः पर्वतैर्युक्तं नानाजातिगृहैर्वृतम्। सर्वप्रचारसंयुक्तमेतत्खर्वटमीरितम् ।।३०।। कुब्जक खेट एवं खर्वट के मध्य में स्थित होता है। सभी वर्णों के लोगों का आवास होता है एवं इसमें वप्र निर्मित नहीं होता है— खेटखर्वटयोर्मध्ये सर्वमर्त्यालयान्वितम्। वप्राभावस्वते तत्तु कुब्जकमुदाहृतम्।।३१।। पत्तन समुद्रतट पर स्थित नगर है। यहाँ सभी वर्णों के लोग निवास करते हैं। अन्य द्वीपों से लाये गये शिल्क एवं कपूर आदि पदार्थों से व्यापारी-वर्ग यहाँ व्यापार करता है— अब्धितीरप्रदेशे तु नानाजातिगृहैर्वृतम्। वणिग्जातिभिराकीर्णं क्रयविक्रयपूरितम्।। रत्नैर्दीपान्तरैर्नीतैः क्षौमैः कर्पूरकादिभिः। एतत्पत्तनमाख्यातं वप्रायतसमन्वितम्।।३२-३३।। (ग) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र में खेट एवं खर्वट का उल्लेख ग्राम के अन्तर्गत किया गया है। खेट प्रायः वन के मध्य में होता है। यहाँ शबर, पुलिन्द एवं मांस से जीवन- यापन करने वाले निवास करते हैं। इसमें गृह प्रायः पर्णनिर्मित (कुटिया) तथा कहीं- कहीं ईंटों के गृह होते हैं। इसमें एक से लेकर दश तक वीथियाँ एवं अनेक क्षुद्रवीथियाँ होती हैं— खेटस्य वास्तुभूमिस्तु प्रायः काननमध्यगाः। शबरैश्च पुलिन्दैश्च संयुता मांसजीविभिः।। पर्णगेहान्विता विष्ण्वगथ वेष्टिकगेहभाक्। एकादशवीथ्यन्ताः क्षुद्रवीथ्यस्समन्ततः।। (८.२०-२१) खर्वट नदी के किनारे बसा स्थान है। यह आम, साल आदि वृक्षों से युक्त होता है। इसमें दश से बीस वीथियाँ एवं अनेक क्षुद्रवीथियाँ होती हैं। एक सौ गृहों से युक्त एक मुख्य वीथी होती है, जहाँ कालिका मन्दिर होता है। यहाँ कृषक, श्रमिक, मदिरागृह एवं बाजार होते हैं— वास्तुभूमिः खर्वटस्य नदीतीरगता मता। रसालसालवकुलैस्तिन्त्रिणीवेणुपाटलैः ।। कदम्बैर्नारिकेलैश्च श्रीपर्णैस्तिलकेरपि। छायावृक्षसमाकीर्णा निष्कुटारामसंवृता।।
९२ मयमतम् दशादिविंशद्वीथीभिरावृता च समन्ततः। शतगेहा मुख्यवीथी तन्मध्ये कालिकागृहम्।। वागुराजीविविभ्रान्त्याैर्भृतकैश्च कृषीवलैः। मदिरागेहसंयुक्ता विपण्यादिभिरावृता।। (८.२२-२५) निगम संज्ञक नगर (८.४०-५०) वन के मध्य में अथवा पर्वत के पार्श्व में स्थित होता है। यह सदा जल से युक्त नदी के तट पर स्थित, रक्षकों से युक्त, दुर्ग एवं प्राकार से युक्त होता है। चारो दिशाओं में चार द्वार, महामार्ग, पीठ, अधिष्ठान एवं गोपुर से युक्त, पूर्व एवं पश्चिम में चालीस प्रतोलियाँ, दक्षिण से उत्तर तीन दण्ड चौड़ी बीस वीथियाँ, अनेक उपवीथियाँ एवं क्षुद्रवीथियाँ होती हैं। इसके मध्य भाग में ऊँचा राजभवन, बाजार, न्यायशाला, सभी वर्णों का निवास, पश्चिम दिशा में देवालय एवं ऊँचे-ऊँचे भवन होते हैं। स्कन्धावार नगर (८.४७-५०) युद्धक्षेत्र से लौटी सेना का आवास होता है। यह पर्वत के पार्श्व में स्थित भूमि पर, पर्वत के मध्यभाग अथवा घने जंगल के मध्य भाग में दृढ़ दुर्ग से युक्त होता है— गिरिपाश्र्वगता भूमिरथवा गिरिमध्यमाक्। महारण्यस्य मध्यस्था दृढ़दुर्गसमन्विता।।४८।। इस क्षेत्र में सामान्य जनों का प्रवेश वर्जित था एवं सेनापति का भवन दक्षिण भाग में दृढ़ द्वार से युक्त होना चाहिये एवं वहाँ अश्व, गज आदि का आवास एवं शस्त्रागार होना चाहिये। द्रोणक नगर (८.५१-५५) में वप्र एवं गोपुर से युक्त नृप के आवास, कृषकों एवं धान्यक्षेत्र से युक्त; समृद्धों के गृहों, अनेक वीथिकाओं, मठ-मण्डप, वापी, कूप, शिवालय एवं चारो वर्णों के आवास से युक्त होता है। कुब्जक नगर (८.५६-५९) दुर्ग, नृपालय, वैश्यों की पर्याप्त संख्या एवं पण्यवीथियों ( बाजार वाले मार्ग ) से युक्त होता है। नगर के उत्तर या पश्चिम दिशा में देवालय, राजवीथी, प्रतोलिका एवं बहुसंख्यक वीथियों से युक्त होता है। पत्तन संज्ञक नगर (८.६०-६५) समुद्रतट या पर्वत के निकट भूमि पर स्थित होता है— पारावारतटे वापि भूधरोपत्यकातटे। स्वादुतोयस्थले वाऽपि पत्तनङ्कारयेद् बुधः।।६०।। यह महामार्ग, आठ वीथियों, राजभवन, दुर्ग, गोपुर, सभामण्डप, देवालय,
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ९३ उपवीथियों, क्षुद्रवीथियों एवं विभिन्न प्रकार के भवनों से युक्त होता है। इसकी रक्षा प्रहरी करते हैं। शिविर नगर (८.६६-६८) में राजा, सचिव, सेनानायक, न्यायवेत्ता आदि राजपुरुष निवास करते हैं। यह नगर काष्ठ, शिला, धातु, वस्त्र अथवा इष्टका से निर्मित होता है। वाहिनीमुख नगर (८.६९-७४) उस स्थान को कहते हैं, जो समुद्र एवं नदी के सङ्गम-स्थल पर बसा होता है— पारावारेण नद्यास्तु सङ्गमो यत्र दृश्यते। तत्रस्थनगरं नाम्ना वाहिनीमुखमीरितम्।। यह दुर्ग प्राकार, चारो ओर रक्षकों एवं दृढ़ द्वार से युक्त होता है। इसमें नदी पर पुल बना होता है। सौ से अधिक बड़ी वीथियाँ, अनेकों उपवीथियाँ, चारो ओर बाजार, अनेक जातियों एवं अनेक भवनों से युक्त होता है। इस प्रकार विश्वकर्मा ने नगरों का विस्तार से वर्णन किया है। ५. दुर्ग (श्लोक-३६-५१) पौराणिक साहित्य एवं शिल्पग्रन्थों में दुर्ग के चार भेदों से लेकर बारह भेदों तक परिचर्चा की गई है। कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं— (क) मत्स्यपुराण (२१७.६-७) में छः दुर्गों—धन्वदुर्ग (मरुभूमि में निर्मित), महीदुर्ग, नरदुर्ग, वृक्षदुर्ग, जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग का वर्णन प्राप्त होता है— धन्वदुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च।। वार्क्षं चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च पार्थिव। सर्वेषामेव दुर्गाणां गिरिदुर्गं प्रशस्यते।। (ख) अग्निपुराण (२२२.४-५) में भी उपर्युक्त दुर्गों का वर्णन प्राप्त होता है— धनुदुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च।। (वार्क्षं चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च भार्गव। सर्वोत्तमं शैलदुर्गमभेद्यं चान्यभेदनम्।।) (ग) शिल्परत्न (पूर्व.-५.८-९) में सात प्रकार के दुर्गों की चर्चा की गई है। ये पर्वत, वन, जल, ऐरण, दैवक, धावन एवं कृतक संज्ञक हैं— दुर्गं तु पार्वतं वन्यमौदकं चैरणं तथा।। दैवकं धावनं चैव कृतकं चेति सप्तधा। (घ) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (१०.१-४६) में बारह प्रकार के दुर्गों का वर्णन किया
९४ मयमतम् गया है। इनकी संज्ञा गिरिदुर्ग, वनदुर्ग, जलदुर्ग, इरिणदुर्ग, दैवत दुर्ग, एकमुख-द्विमुख- चतुर्मुख दुर्ग कूर्मदुर्ग, पारावत दुर्ग, प्रभुदुर्ग एवं युद्धदुर्ग है। (ङ) समराङ्गणसूत्रधार (४५.३९-४०) में छः दुर्गों की चर्चा प्राप्त होती है— दुर्गं तु षड्विधं प्रोक्तं राज्ञां तु विजिगीषताम्। अब्दुर्गं पङ्कदुर्गं वा वनदुर्गैरिणे तथा।। पार्वतीयं महीदुर्गमिति कल्प्यानि पार्थिवैः। सर्वेषामेव दुर्गाणां पार्वतीयं प्रशस्यते।। (च) मानसार (१०.४५-४६) में गिरिदुर्ग, वनदुर्ग, जलदुर्ग, पङ्कदुर्ग, रथदुर्ग, देवदुर्ग एवं मिश्रदुर्ग की चर्चा की गई है— गिरिदुर्गं वनदुर्गं सलिलं पङ्कदुर्गकम्। रथदुर्गं देवदुर्गं मिश्रदुर्गं तथैव च।। (छ) राजवल्लभमण्डन (४.३) में भूदुर्ग, जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग एवं गुहादुर्ग का उल्लेख प्राप्त होता है— भूदुर्गं जलदुर्गमद्रिविषये दुर्गं भवेद् गह्वरे। इनके अतिरिक्त मनुस्मृति, शुक्रनीति एवं अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों में भी दुर्ग की परिचर्चा प्राप्त होती है। ६. अन्तरापण ( बाजार ) ( श्लोक ७७-९४ ) अपराजितपृच्छा (७२.३२-४०) के अनुसार जहाँ लोगों का आवागमन बना रहता हो, ऐसे स्थान पर पूर्व की ओर सुनार, गन्धी ( सुगन्ध बेचने वाला ), दन्तकर्म एवं अन्नागार का स्थान ( बाजार ) होना चाहिये। राजभवन के सम्मुख पान, फल एवं फूल-माला का बाजार होना चाहिये। वहीं अन्य सामानों की दुकानें भी होनी चाहिये। दक्षिण दिशा में लोहे के सामान, शस्त्र, पंखे एवं मोरपंख आदि की हाट होनी चाहिये। ईशान कोण में वस्त्र, आग्नेय दिशा में छोटे वस्त्र, दक्षिण में काले एवं लाल वस्त्र, पूर्व में श्वेत वस्त्र आदि के हाट प्रशस्त होते हैं। अन्न के बाजार सभी दिशाओं में होने चाहिये। पान एवं सुपारी का विक्रय मन्दिर के निकट एवं धोबी आदि का स्थान अपने देवता के आवास के निकट प्रशस्त होता है। राजवल्लभमण्डन (४.१८-१९) में भी विभिन्न व्यवसायियों के स्थान का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार पान, फल, हाथी-दाँत, सुगन्धि, पुष्प एवं मोती के हाट राजभवन एवं मन्दिर के सम्मुख होने चाहिये— ताम्बूलं फलदन्तगन्धकुसुमं मुक्तादिकं यद्भवेत्। राजद्वारसुराग्रतो हि सुधिया कार्यं पुरे सर्वतः।।१८।।
दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ९५ ईशान में रङ्गरेज, जुलाहे, धोबी; आग्नेय कोण में अग्निजीवी ( धातुशिल्पी ); अन्त्यज, चर्मकार, वरड, सुराजीवी एवं वेश्याओं को नैर्ऋत्य कोण तथा वायव्य कोण में व्याध को बसाना चाहिये— ईशे रङ्गकराः कुविन्दरजकाः वह्नौ च तज्जीविनः प्रोक्ता अन्त्यजचर्मकारबरडाः स्युः शौण्डिकाः राक्षसे। पण्यस्त्री निर्ऋतौ च मारुतयुते कोणे न्यसेल्लुब्धकान् ॥१९॥
अथैकादशोऽध्यायः ( भूलम्बविधानम् ) भूमिलम्बविधानं तु वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात्। चतुरस्रमायतास्रं वर्तुलं च तदायतम् ॥१॥ अष्टास्रं च षडस्रं च द्व्यस्रवृत्तं तथैव च। एतद्विन्यासभेदं स्यात् क्षयवृद्धिविधानतः ॥२॥ भूमि के तल एवं आयाम—अब मैं ( मय ) संक्षेप में क्रमानुसार भूमिलम्ब- विधान का वर्णन करता हूँ। क्षय ( कम करते हुये ) एवं वृद्धि ( बढ़ाते हुये ) विधान के अनुसार विन्यास-भेद इस प्रकार हैं—चौकोर, आयताकार, गोलाकार, लम्बाई लिये गोलाकार, अष्टकोण, षट्कोण एवं द्व्यस्रवृत्त ( दो कोणों के साथ गोलाकार )। भूमिलम्बमिति प्रोक्तं त्रिचतुर्हस्तमानतः। द्विद्विहस्तविवृद्ध्यैकं भूमेर्मानं चतुष्टयम् ॥३॥ इसे भूमिलम्ब कहते हैं। एक भूमि ( के भवन ) का मान तीन या चार हस्त से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ की वृद्धि करते हुये चार प्रकार का होता है॥३॥ पञ्चषड्ढस्तमारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात्। द्वितले तु चतुर्मानं रुद्रभानुकरान्तकम् ॥४॥ पाँच या छः हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये ग्यारह या बारह हाथ तक दो तल वाले भवन के चार प्रकार के मान होते हैं॥४॥ सप्ताष्टहस्तमारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात्। पञ्चदशविकारान्तं त्रितले पञ्चमानकम् ॥५॥ तीन तल वाले भवन के सात या आठ हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये पन्द्रह या सोलह हस्तपर्यन्त पाँच प्रकार के मान होते हैं॥५॥ नवपङ्क्तिकराद्यावत् पक्षषोडशहस्तकम् । चतुष्पञ्चतलं प्रोक्तं चतुर्मानं सनातनम् ॥६॥ नौ या दश हाथ से प्रारम्भ कर पन्द्रह या सोलह हाथ तक चार और पाँच तल वाले भवन के चार प्रकार के मान वर्णित हैं॥६॥
एकादशोऽध्यायः 卐 भूलम्बविधानम् ९७ एकहस्तं द्विहस्तं वा क्षुद्रमेकतलं स्मृतम्। युग्मायुग्मकरैर्मानैर्हस्तार्धोनसमन्वितैः ॥७॥ केचिद् वदन्ति देवानां मानुषाणां विमानके। विस्तारे सप्तषट्पञ्चचतुरूर्ध्वंशेऽधिकं त्रिभिः ॥८॥ अथवा एक तल का क्षुद्र प्रमाण एक हाथ या दो हाथ कहा गया है। कुछ विद्वान् देवों एवं मनुष्यों के कई तल वाले भवन के विस्तारप्रमाण में आधा हाथ जोड़ने या कम करने के लिये कहते हैं। यह सम या विषम संख्या वाले सभी हस्त-प्रमाण के लिये हैं। (लम्बाई के लिये) विस्तारप्रमाण में तीन के साथ विस्तार का सात, छः, पाँच, चार या तीन अंश अधिक जोड़ना चाहिये॥७-८॥ शान्तिकं पौष्टिकं जयदमद्भुतं सार्वकामिकम्। उच्छ्रायं द्विगुणं पादार्धाधिकं चापि सम्मतम् ॥९॥ शान्तिक, पौष्टिक, जयद, अद्भुत एवं सार्वकामिक भवनों में पूर्वोक्त प्रमाण के अतिरिक्त भवन की ऊँचाई उसके चौड़ाई की दुगुनी, डेढ़गुनी अथवा सवा गुनी अधिक होनी चाहिये॥९॥ पञ्चदशकरव्यासाद्धीनं क्षुद्रविमानकम्। सप्ताष्टाधिकपङ्क्त्यादिद्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१०॥ चौड़ाई में पन्द्रह हाथ से कम माप का भवन क्षुद्रविमानक होता है। सत्रह या अट्ठारह हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाना चाहिये॥१०॥ आसप्ततेश्चतुर्भूम्यादीनि त्रीणि मतानि च। सप्तविंशतिभेदानि द्वादशान्तान्यनुक्रमात् ॥११॥ (दो-दो हाथ बढ़ाते हुये) सत्तर हाथ तक माप ले जाना चाहिये। चार तल से बारह तलपर्यन्त भवन के सत्ताईस भेद होते हैं एवं इनमें से प्रत्येक के तीन भेद होते हैं॥११॥ त्रिचतुर्विंशतिरतलेर्यावच्छतकरान्तकम् । त्रित्रिहस्तविवृद्ध्या तु त्रिनवोत्सेधमिष्यते ॥१२॥ तेईस या चौबीस हाथ से प्रारम्भ कर एक सौ हाथ तक तीन-तीन हाथ बढ़ाते हुये भवन के सत्ताईस प्रकार के ऊँचाई के प्रमाण-भेद प्राप्त होते हैं॥१२॥ एवमुत्कृष्टमानेषु श्रेष्ठमध्याधमं भवेत्। त्रिचतुष्पङ्क्तिहस्तादिद्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१३॥ मय०-१७
orसप्ताष्टपङ्क्तेरारभ्य`.
Wait, look at line 8 again:
Is there a 'र'?
Let's look at:
प - ङ्के - रा - र - भ्य ?
Wait! Look at the character between 'रा' and 'भ्य':
Wait! Look at the top bar above 'रा':
There is a letter: र with a vertical line (रा).
Then to the right of the vertical line, there is another र!
Wait, is there?
Let's compare with line 10: "सत्रह या अठारह हाथ से प्रारम्भ"
In line 10: "प्रारम्भ" -> 'रा' has vertical line, then 'म्' joins to 'भ'.
Now look at line 8:
After 'रा', there is a glyph that has a top bar, a left curl, and a leg: THAT IS A 'र'!
Wait, is it a र?
Wait! Let's zoom in on line 8:
स - प्ता - ष्ट - प - ङ्के - रा - र - भ्य
Wait, look at the letter before 'भ्य':
It is र!
Wait, then what is before it?
Is that 'रा'?
Wait, look at:
Is it 'सप्ताष्टपङ्केराभ्य' or 'सप्ताष्टपङ्केरारभ्य'?
Wait! Look at:
प
ङ्के (or ङ्क्
एकादशोऽध्यायः 卐 भूलम्बविधानम् ९९ भवन का विस्तार स्तम्भ के बाहर से मापना चाहिये एवं इसकी ऊँचाई इसके जन्म ( मूल ) से प्रारम्भ कर स्तूपिका-पर्यन्त लेनी चाहिये। कुछ विद्वान् भवन की ऊँचाई शिखर-पर्यन्त मानते हैं।।२०।। महतामुच्छ्रयो हस्तैरुद्देशः समुदाहृतः। तत्तद्व्यासे तु सप्तांशे निर्देशोच्चं त्र्यंशकैः ॥२१॥ बड़े भवनों की ऊँचाई कर-प्रमाण में दी गई है। इनका विस्तार दश में सातवाँ भाग होना चाहिये।।२१।। विस्तारद्विगुणोत्सेधं युक्त्याल्पेषु प्रयोजयेत्। देवानां सार्वभौमानामाद्वादशतलं विदुः ॥२२॥ छोटे भवनों की ऊँचाई उनके विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। सार्वभौम देवों का मन्दिर बारह तलों का होना चाहिये।।२२।। रक्षोगन्धर्वयक्षाणामेकादशतलं मतम्। विप्राणां नवभौमं स्याद् दशभौममथापि वा ॥२३॥ राक्षस, गन्धर्व एवं यक्षों का भवन एकादश तल का तथा ब्राह्मणों का भवन नौ या दश तल का होना चाहिये।।२३।। युवराजस्य राज्ञश्च पञ्चमस्यैव सप्तभूः। तदाद्येकादशतलं षण्णां वै चक्रवर्तिनाम् ॥२४॥ पाँचवें प्रकार का भवन युवराजों एवं राजाओं का होता है, जो सात तल का होता है। चक्रवर्ती राजाओं का भवन छः तल से प्रारम्भ कर ग्यारह तलपर्यन्त होता है।।२४।। त्रिभूमं च चतुर्भूमं वणिजां शूद्रजन्मनाम्। राज्ञां पञ्चतलं वाऽपि मतं पट्टभृतां तु तत् ॥२५॥ वैश्यों एवं शूद्रों का भवन तीन एवं चार-तल का होना चाहिये तथा पट्टभृत राजाओं ( छोटे राजाओं ) का भवन पाँच तल का होना चाहिये।।२५।। शतहस्तसमुत्सेधात् सप्तत्यारत्निविस्तरात्। नेष्यतेऽधिकमानं तु सर्वथा तद्विचक्षणैः ॥२६॥ कुशल स्थपति एक सौ हाथ से अधिक ऊँचे तथा सत्तर हाथ से अधिक विस्तृत भवन का प्रमाण अभीष्ट नहीं मानते हैं।।२६।। क्षुद्रल्पमध्यमवरादिविमानकानां व्यामिश्रहस्तकयुजां विपुलोच्चभेदम्।