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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८७ ईशानादिमहेन्द्रद्वारान्तं चान्तरापणकम् । तत्रैव मत्स्यमांसं शुष्कं शाकञ्च विज्ञेयम् ॥८१॥ ईशान से महेन्द्र पद तक हाट-बाजार निर्मित करना चाहिये। वहीं पर मछली, माँस, सूखे पदार्थ एवं शाक (सब्जी, तरकारी) का हाट भी होना चाहिये॥८१॥ महेन्द्राद्यग्न्यन्तं भक्ष्यं भोज्यं च निर्दिष्टम् । अग्न्यादि गृहक्षतपर्यन्तं तत्र भाण्डानि ॥८२॥ महेन्द्र पद से प्रारम्भ कर अग्निकोण-पर्यन्त भक्ष्य एवं भोज्य (खाने-पीने योग्य) पदार्थों का हाट होना चाहिये तथा अग्नि से गृहक्षतपर्यन्त भाण्डों (बरतन) का हाट होना चाहिये॥८२॥ तस्मान्निऋर्तिपदान्तं कंसादिकमत्र विज्ञेयम् । स्यात् पुष्पदन्तभागान्तं पितृभागादि वस्त्रं स्यात् ॥८३॥ गृहक्षत से निऋर्ति के पद तक कांस्य आदि धातुओं से निर्मित पदार्थों का हाट होना चाहिये। पितृपद से पुष्पदन्त के पद तक वस्त्रों का हाट होना चाहिये॥८३॥ तस्मात् समीरणान्तं तण्डुलधान्यादिकं च कटम् । स्याद् भल्लाटपदान्तं वास्त्रादिकं वस्त्रकादीनाम् ॥८४॥ पुष्पदन्त से समीर पदपर्यन्त चावल, अन्न एवं भूसे के बाजार होने चाहिये। वायु से भल्लाट के पद तक वस्त्र आदि के हाट होने चाहिये॥८४॥ तत्रैव लावणादिद्रव्यं तैलादिकं ज्ञेयम् । तस्मादीशपदान्तं गन्धं पुष्पादिकं विहितम् ॥८५॥ उसी स्थान पर नमक आदि पदार्थ एवं तेल आदि का हाट होना चाहिये। भल्लाट से ईश तक सुगन्ध एवं पुष्प आदि का हाट होना चाहिये॥८५॥ एवं नवान्तरापणमुदितं तत्परितस्तु मध्ये । अभ्यन्तरगतमार्गेष्वथ रत्नं हाटकं वस्त्रम् ॥८६॥ इस प्रकार वसति-विन्यास (नगरादि) में चारो ओर नौ प्रकार के हाटों का वर्णन किया गया है। मध्य भाग में जाने वाले मार्गों पर रत्न, सुवर्ण एवं वस्त्रों का हाट होना चाहिये॥८६॥ माञ्जिष्ठं तु मरीचं पिप्पलकं चापि हारिद्रम् । मधुघृततैलादिकमथ भैषज्यं सर्वतः कार्यम् ॥८७॥ इनके अतिरिक्त माञ्जिष्ठ (मजीठ, रंग), काली मिर्च, पीपल, हारिद्र (हल्दी),

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