भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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८८ मयमतम् शहद, घी, तेल तथा औषध के हाट सभी स्थानों पर होने चाहिये ।।८७।। आर्यपदे च विवस्वति मित्रे पृथिवीधरे च पदे । शास्ता दुर्गा गजमुखलक्ष्म्यौ चात्रैव विज्ञेयाः ॥८८॥ आर्य, विवस्वान्, मित्र एवं पृथिवीधर के पद पर शास्ता, दुर्गा, गजमुख एवं लक्ष्मी का स्थान होना चाहिये ।।८८।। देवालयमथ परितो ग्रामे यथा तथा विहितम् । परितः सर्वजनालयमुदितं किञ्चित्ततो दूरे ॥८९॥ जिस प्रकार ग्राम में उसी प्रकार ( नगर आदि में भी ) चारो ओर देवालय होना चाहिये। इससे कुछ दूर सभी वर्ण के मनुष्यों का आवास होना चाहिये।।८९।। नगराद् द्विशतं दण्डं नीत्वा प्राच्यां तु वाग्नेय्याम् । चण्डालकुटीराणि तत्रैव तु कोलिकानां तु ॥९०॥ नगर से दो सौ दण्ड दूर ले जाकर पूर्व अथवा आग्नेय कोण में चण्डालों एवं कोलिकों के कुटीर होने चाहिये।।९०।। अस्मिन् सर्वमनुक्तं ग्रामे तु यथा तथा विहितम् । पत्तनमृजुवीथियुतं नैव स्यादन्तरापणं तत्र । शेषाणामपि तत्तद्योग्यवशात्तत्र विज्ञेयम् ॥९१॥ यहाँ जिन सबका वर्णन नहीं किया गया है, वे सब उसी प्रकार होंगे, जैसे ग्रामों में वर्णित हैं। पत्तन में एक ऋजुपथ ( सीधी सड़क ) होती है एवं वहाँ बाजार नहीं होते हैं। शेष नगर आदि स्थानों में यथोचित ( आवश्यकतानुसार ) हाट आदि होना चाहिये।।९१।। स्थानीयदुर्गपुरपत्तनकोत्मकोल- द्रोणामुखानि निगमञ्च तथैव खेटम् । ग्रामञ्च खर्वटमितीह दशैव युक्त्या- धिष्ठानकानि कथितानि पुरातनार्यैः ॥९२॥ प्राचीन आचार्यों ने दस प्रकार के वासयोग्य अधिष्ठानों का वर्णन किया है— स्थानीय, दुर्ग, पुर, पत्तन, कोत्मकोल, द्रोणमुख, निगम, खेट, ग्राम तथा खर्वट। ( इनकी स्थापना भौगोलिक स्थिति के अनुसार होती है )।।९२।। एवं प्रोक्तं भूमिदेवादिकानां वर्णानां चाप्यत्र जात्यन्तराणाम् । ग्रामादीनां मानविन्यासमार्गं सालङ्कारं चारु संक्षिप्य तन्त्रात् ।।९३।।