भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८९ इस प्रकार तन्त्रों से ग्रहण कर संक्षेप में भूमि, देवताओं, चारो वर्णों, जात्यन्तरों ( सङ्कर जाति ), ग्रामादि के प्रमाण, मार्ग-विन्यास का सुन्दर सजावट के साथ वर्णन किया गया है।।९३।। दत्तान्नृपः स्थपतिकादिचतुष्टयेभ्यो मानादिकर्मनिपुणेभ्य इडां च गाञ्च। नित्यं यथा जगति वित्तमनेकवस्तू- न्याचन्द्रतारमधिवासभुवं मुदा सः ॥९४॥ इति मयमते वस्तुशास्त्रे नगरविधानो नाम दशमोऽध्यायः राजा को मापन आदि कार्य में निपुण चारो स्थपति आदि को गाय एवं पृथिवी प्रदान करना चाहिये। ऐसा करने से जब तक संसार में चन्द्रमा एवं तारे रहेंगे तब तक वह राजा प्रसन्नतापूर्वक पृथिवी पर धन आदि अनेक समृद्धिदायक वस्तुओं से युक्त एवं सर्वदा प्रसन्न रहता है।।९४।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. वप्र-( प्राकार )-निर्माण ( श्लोक १३-१६ ) समराङ्गणसूत्रधार (१०.१६-२५) के अनुसार पुर के बाहर वप्रभूमि का निर्माण करना चाहिये। महारथ्या के प्रमाण से वप्र-भूमि के बाहर तीन परिखाओं का निर्माण होता है। परिखाओं को खोदने से निकली मृत्तिका से इसका निर्माण होता है। इसकी ऊँचाई गज के पेट या पीठ के बराबर रखनी चाहिये। इसके ऊपरी तल को दृढ़ बनाना चाहिये। इसके ऊर्ध्व भाग को पत्थर एवं शिलाओं से दृढ़ बना कर इसके ऊपर प्राकार का निर्माण किया जाता है। २. राजधानी ( श्लोक १९-२६ ) मानसार के अनुसार जिस नगर में विष्णु भगवान् का देवालय हो, उसे राजधानी कहते हैं— तत्रागते नगर्यन्तं यदि विष्ण्वालयं भवेत्।। राजधानीति तन्नाम विद्वद्भिर्वक्ष्यते सदा। ( मानसार-१०.२३-२४ )