भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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९० मयमतम् विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (४.९) में बीस नगरों के अन्तर्गत बीसवें नगर के रूप में राजधानी की चर्चा की गई है। समराङ्गणसूत्रधार (१८.२) के अनुसार जिस नगर में राजा हो, उसे राजधानी कहते हैं— यत्रास्ते नगरे राजा राजधानीं तु तां विदुः। ३. केवल नगर ( श्लोक १९-२१ ) मानसार (१०.२४-२६) के अनुसार चारो दिशाओं में गोपुरयुक्त चार द्वार, रक्षा- गृह एवं सैन्य-आवास, व्यापारियों से युक्त एवं देवालयों से युक्त स्थान केवल नगर होता है। ४. खेट, खर्वट, कुब्ज, पत्तन, शिविर, सेनामुख, स्थानीय, द्रोणमुख, विडम्ब, कोत्मकोलक, निगम एवं स्कन्धावार ( श्लोक-२६-३६ ) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (८), मानसार (१०), समराङ्गणसूत्रधार (१८) में इन सबका वर्णन नगर के भेदों के रूप में किया गया है। विशेष वर्णन इस प्रकार है— (क) समराङ्गणसूत्रधार (१८) के अनुसार कर्वट (खर्वट) नगर के सदृश, निगम कर्वट से गुणों में कम होता है— शाखानगरमेवाहुः कर्वटं नगरोपमम्। ऊनं कर्वटमेवेह गुणैर्निर्गम उच्यते।।३।। पत्तन राजा का दूसरा निवास होता है— उपस्थानं भवेद्राज्ञां यत्र तत्पत्तनं विदुः।।५।। खेट कों नगर के आधे विष्कम्भ माप का कहा गया है— खेटं तदर्धविष्कम्भमाहुः। (१०.७९) इसमें बीस मार्ग होते हैं— विंशतिः खेटके मार्गाः। (१०.८२) (ख) मानसार (१०) के अनुसार नदी एवं पर्वत से सटे शूद्रालययुक्त स्थान खेट कहे जाते हैं— नदीपर्वतप्रान्ते च शूद्रालयसमन्वितम्। महाप्रावृतसंयुक्तं खेटमुक्तं पुरातनैः।।२९।। खर्वट पर्वतों से युक्त, अनेक जातियों के आवास से युक्त एवं सभी प्रचार से संयुक्त होता है—