मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ मयमतम् गया है। इनकी संज्ञा गिरिदुर्ग, वनदुर्ग, जलदुर्ग, इरिणदुर्ग, दैवत दुर्ग, एकमुख-द्विमुख- चतुर्मुख दुर्ग कूर्मदुर्ग, पारावत दुर्ग, प्रभुदुर्ग एवं युद्धदुर्ग है। (ङ) समराङ्गणसूत्रधार (४५.३९-४०) में छः दुर्गों की चर्चा प्राप्त होती है— दुर्गं तु षड्विधं प्रोक्तं राज्ञां तु विजिगीषताम्। अब्दुर्गं पङ्कदुर्गं वा वनदुर्गैरिणे तथा।। पार्वतीयं महीदुर्गमिति कल्प्यानि पार्थिवैः। सर्वेषामेव दुर्गाणां पार्वतीयं प्रशस्यते।। (च) मानसार (१०.४५-४६) में गिरिदुर्ग, वनदुर्ग, जलदुर्ग, पङ्कदुर्ग, रथदुर्ग, देवदुर्ग एवं मिश्रदुर्ग की चर्चा की गई है— गिरिदुर्गं वनदुर्गं सलिलं पङ्कदुर्गकम्। रथदुर्गं देवदुर्गं मिश्रदुर्गं तथैव च।। (छ) राजवल्लभमण्डन (४.३) में भूदुर्ग, जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग एवं गुहादुर्ग का उल्लेख प्राप्त होता है— भूदुर्गं जलदुर्गमद्रिविषये दुर्गं भवेद् गह्वरे। इनके अतिरिक्त मनुस्मृति, शुक्रनीति एवं अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों में भी दुर्ग की परिचर्चा प्राप्त होती है। ६. अन्तरापण ( बाजार ) ( श्लोक ७७-९४ ) अपराजितपृच्छा (७२.३२-४०) के अनुसार जहाँ लोगों का आवागमन बना रहता हो, ऐसे स्थान पर पूर्व की ओर सुनार, गन्धी ( सुगन्ध बेचने वाला ), दन्तकर्म एवं अन्नागार का स्थान ( बाजार ) होना चाहिये। राजभवन के सम्मुख पान, फल एवं फूल-माला का बाजार होना चाहिये। वहीं अन्य सामानों की दुकानें भी होनी चाहिये। दक्षिण दिशा में लोहे के सामान, शस्त्र, पंखे एवं मोरपंख आदि की हाट होनी चाहिये। ईशान कोण में वस्त्र, आग्नेय दिशा में छोटे वस्त्र, दक्षिण में काले एवं लाल वस्त्र, पूर्व में श्वेत वस्त्र आदि के हाट प्रशस्त होते हैं। अन्न के बाजार सभी दिशाओं में होने चाहिये। पान एवं सुपारी का विक्रय मन्दिर के निकट एवं धोबी आदि का स्थान अपने देवता के आवास के निकट प्रशस्त होता है। राजवल्लभमण्डन (४.१८-१९) में भी विभिन्न व्यवसायियों के स्थान का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार पान, फल, हाथी-दाँत, सुगन्धि, पुष्प एवं मोती के हाट राजभवन एवं मन्दिर के सम्मुख होने चाहिये— ताम्बूलं फलदन्तगन्धकुसुमं मुक्तादिकं यद्भवेत्। राजद्वारसुराग्रतो हि सुधिया कार्यं पुरे सर्वतः।।१८।।