भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ९३ उपवीथियों, क्षुद्रवीथियों एवं विभिन्न प्रकार के भवनों से युक्त होता है। इसकी रक्षा प्रहरी करते हैं। शिविर नगर (८.६६-६८) में राजा, सचिव, सेनानायक, न्यायवेत्ता आदि राजपुरुष निवास करते हैं। यह नगर काष्ठ, शिला, धातु, वस्त्र अथवा इष्टका से निर्मित होता है। वाहिनीमुख नगर (८.६९-७४) उस स्थान को कहते हैं, जो समुद्र एवं नदी के सङ्गम-स्थल पर बसा होता है— पारावारेण नद्यास्तु सङ्गमो यत्र दृश्यते। तत्रस्थनगरं नाम्ना वाहिनीमुखमीरितम्।। यह दुर्ग प्राकार, चारो ओर रक्षकों एवं दृढ़ द्वार से युक्त होता है। इसमें नदी पर पुल बना होता है। सौ से अधिक बड़ी वीथियाँ, अनेकों उपवीथियाँ, चारो ओर बाजार, अनेक जातियों एवं अनेक भवनों से युक्त होता है। इस प्रकार विश्वकर्मा ने नगरों का विस्तार से वर्णन किया है। ५. दुर्ग (श्लोक-३६-५१) पौराणिक साहित्य एवं शिल्पग्रन्थों में दुर्ग के चार भेदों से लेकर बारह भेदों तक परिचर्चा की गई है। कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं— (क) मत्स्यपुराण (२१७.६-७) में छः दुर्गों—धन्वदुर्ग (मरुभूमि में निर्मित), महीदुर्ग, नरदुर्ग, वृक्षदुर्ग, जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग का वर्णन प्राप्त होता है— धन्वदुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च।। वार्क्षं चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च पार्थिव। सर्वेषामेव दुर्गाणां गिरिदुर्गं प्रशस्यते।। (ख) अग्निपुराण (२२२.४-५) में भी उपर्युक्त दुर्गों का वर्णन प्राप्त होता है— धनुदुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च।। (वार्क्षं चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च भार्गव। सर्वोत्तमं शैलदुर्गमभेद्यं चान्यभेदनम्।।) (ग) शिल्परत्न (पूर्व.-५.८-९) में सात प्रकार के दुर्गों की चर्चा की गई है। ये पर्वत, वन, जल, ऐरण, दैवक, धावन एवं कृतक संज्ञक हैं— दुर्गं तु पार्वतं वन्यमौदकं चैरणं तथा।। दैवकं धावनं चैव कृतकं चेति सप्तधा। (घ) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (१०.१-४६) में बारह प्रकार के दुर्गों का वर्णन किया