भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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९२ मयमतम् दशादिविंशद्वीथीभिरावृता च समन्ततः। शतगेहा मुख्यवीथी तन्मध्ये कालिकागृहम्।। वागुराजीविविभ्रान्त्याैर्भृतकैश्च कृषीवलैः। मदिरागेहसंयुक्ता विपण्यादिभिरावृता।। (८.२२-२५) निगम संज्ञक नगर (८.४०-५०) वन के मध्य में अथवा पर्वत के पार्श्व में स्थित होता है। यह सदा जल से युक्त नदी के तट पर स्थित, रक्षकों से युक्त, दुर्ग एवं प्राकार से युक्त होता है। चारो दिशाओं में चार द्वार, महामार्ग, पीठ, अधिष्ठान एवं गोपुर से युक्त, पूर्व एवं पश्चिम में चालीस प्रतोलियाँ, दक्षिण से उत्तर तीन दण्ड चौड़ी बीस वीथियाँ, अनेक उपवीथियाँ एवं क्षुद्रवीथियाँ होती हैं। इसके मध्य भाग में ऊँचा राजभवन, बाजार, न्यायशाला, सभी वर्णों का निवास, पश्चिम दिशा में देवालय एवं ऊँचे-ऊँचे भवन होते हैं। स्कन्धावार नगर (८.४७-५०) युद्धक्षेत्र से लौटी सेना का आवास होता है। यह पर्वत के पार्श्व में स्थित भूमि पर, पर्वत के मध्यभाग अथवा घने जंगल के मध्य भाग में दृढ़ दुर्ग से युक्त होता है— गिरिपाश्र्वगता भूमिरथवा गिरिमध्यमाक्। महारण्यस्य मध्यस्था दृढ़दुर्गसमन्विता।।४८।। इस क्षेत्र में सामान्य जनों का प्रवेश वर्जित था एवं सेनापति का भवन दक्षिण भाग में दृढ़ द्वार से युक्त होना चाहिये एवं वहाँ अश्व, गज आदि का आवास एवं शस्त्रागार होना चाहिये। द्रोणक नगर (८.५१-५५) में वप्र एवं गोपुर से युक्त नृप के आवास, कृषकों एवं धान्यक्षेत्र से युक्त; समृद्धों के गृहों, अनेक वीथिकाओं, मठ-मण्डप, वापी, कूप, शिवालय एवं चारो वर्णों के आवास से युक्त होता है। कुब्जक नगर (८.५६-५९) दुर्ग, नृपालय, वैश्यों की पर्याप्त संख्या एवं पण्यवीथियों ( बाजार वाले मार्ग ) से युक्त होता है। नगर के उत्तर या पश्चिम दिशा में देवालय, राजवीथी, प्रतोलिका एवं बहुसंख्यक वीथियों से युक्त होता है। पत्तन संज्ञक नगर (८.६०-६५) समुद्रतट या पर्वत के निकट भूमि पर स्थित होता है— पारावारतटे वापि भूधरोपत्यकातटे। स्वादुतोयस्थले वाऽपि पत्तनङ्कारयेद् बुधः।।६०।। यह महामार्ग, आठ वीथियों, राजभवन, दुर्ग, गोपुर, सभामण्डप, देवालय,