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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

६० मयमतम् नन्द्यावर्त ग्राम (उपर्युक्त मार्गों से) युक्त होता है। यह नन्द्यावर्त आकृति का होता है। बाहर की ओर जाने वाले मार्गों के बाहर चारो दिशाओं में चार द्वार होते हैं।।४९।। युक्तानेकैकयुक्तं नन्द्यावर्ताभमिदमुदितम्। आद्यैरष्टादशभिर्द्वाविंशत्यङ्गकैरूदग्वक्त्रैः ॥५०॥ अनेक मार्गों के आपस में संयुक्त होने से अनेक मार्ग-संयोग (तिराहे, चौराहे आदि) बनते हैं। नन्द्यावर्त की आकृति के सदृश होने के कारण इस ग्राम को 'नन्द्यावर्त' कहते हैं। पराग ग्राम का लक्षण इस प्रकार है—यहाँ अठारह से बाईस संख्या तक मार्ग उत्तर से जाते हैं।।५०।। षड्भिः प्राङ्मुखमार्गैर्युक्तं ह्येतत् परागमिति कथितम्। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गैः सप्तभिरुदगग्रैस्त्रिवेदशरैः ॥५१॥ छः मार्ग पूर्व से निकलते हैं। इस ग्राम को 'पराग' कहते हैं। (पद्म ग्राम में) पूर्व-पश्चिम में सात मार्ग होते हैं तथा उत्तर से तीन, चार, पाँच—।।५१।। षट्सप्तभिरपि युक्तैर्विंशतिभिः पञ्चधा पद्मम्। अष्टभिरथ पूर्वाग्रैरुदगग्रैः साष्टविंशतिभिः ॥५२॥ छः या सात मार्ग निकलते हैं तथा बीस मार्ग-संयोग बनते हैं। इस प्रकार 'पद्म'- ग्राम के पाँच भेद बनते हैं। (श्रीप्रतिष्ठित ग्राम में) आठ मार्ग पूर्व दिशा से तथा अट्ठाईस से प्रारम्भ कर—।।५२।। आद्यैर्द्धिः षोडशभिर्मार्गैरन्त्यैर्युतं यत्तु। तच्छ्रीप्रतिष्ठितं स्यादष्टविधं ग्राममुद्दिष्टम् ॥५३॥ बत्तीस संख्या तक मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। इसे 'श्रीप्रतिष्ठित' ग्राम कहते हैं। इस प्रकार आठ प्रकार के ग्राम होते हैं।।५३।। अथवा श्रीवत्सादिकमुपनेतव्यं तु विन्यासम्। सर्वेषां ग्रामाणां नाभिं न प्रोतयेन्मतिमान् ॥५४॥ अथवा 'श्रीवत्स' आदि अन्य ग्रामों का भी विन्यास करना चाहिये। सभी ग्रामों के नाभि (केन्द्र-स्थल) को बुद्धिमान व्यक्ति को विद्ध नहीं करना चाहिये।।५४।। ग्रामे वाऽथ गृहे वा दण्डच्छेदोऽपि नैव कर्तव्यः। सकलाद्यासनकान्तं विन्यासार्थं पदं बुधैर्ग्राह्यम् ॥५५॥ ग्राम अथवा गृह में दण्डच्छेद नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति को ग्राम

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६१ अथवा गृह के विन्यास हेतु सकल ( एकपद वास्तु ) से लेकर आसन ( एक हजार पद वास्तु ) तक ( किसी उपयुक्त ) पदविन्यास को ग्रहण करना चाहिये ।।५५।। क्षुद्रग्रामे मार्गाश्चत्वारश्चाष्ट मध्यमे ग्रामे । द्वादश षोडश मार्गा ग्रामेषूत्कृष्टकेषु मताः ।।५६।। छोटे ग्राम में चार मार्ग, मध्यम ग्राम में आठ मार्ग एवं उत्तम ग्राम में बारह अथवा सोलह मार्ग होते हैं ।।५६।। ❋ द्वाराणि ❋ भल्लाटे च महेन्द्रे राक्षसपादे तु पुष्पदन्तपदे । द्वारायतनस्थानं जलमार्गांश्चापि चत्वारः ।।५७।। द्वार — भल्लाट, महेन्द्र, राक्षस एवं पुष्पदन्त पद द्वारस्थापन के स्थान हैं तथा जलमार्ग भी चार हैं ।।५७।। वितथपदेऽथ जयन्ते सुग्रीवांशे च मुख्यदेवपदे । भृशपूषभृङ्गराजा दौवारिकशोषनागदितिजलदाः ।।५८।। जलमार्ग के चार वास्तु-पद वितथ, जयन्त, सुग्रीव एवं मुख्य हैं ! भृश, पूषा, भृङ्गराज, दौवारिक, शोष, नाग, दिति एवं जलद — ।।५८।। स्थानमुपद्वाराणामष्टौ देवा इमे कथिताः । त्रिकरं पञ्चकरं तत् सप्तकरं द्वारविस्तरम् ।।५९।। इन आठ वास्तुदेवों के पद उपद्वार के स्थान हैं। इन उपद्वारों का विस्तार तीन, पाँच या सात हस्त होता है ।।५९।। तारद्विगुणोत्सेधं चाध्यर्धं वाऽङ्घ्रिहीनं तत् । सर्वेषां ग्रामाणां परितः परिखा बहिश्च वप्राश्च ।।६०।। इन उपद्वारों की ऊँचाई उसकी चौड़ाई की दुगुनी, डेढ़ गुनी अथवा तीन चौथाई होनी चाहिये। सभी ग्रामों के चारो ओर बाहर परिखा ( खाई ) एवं वप्र ( प्राचीर, घेरने वाली भित्ति ) होनी चाहिये ।।६०।। ग्रामादयोऽपि नद्या दक्षिणतीरे तदन्वितायामाः । नवनववसुसुभागे मध्ये ब्राह्मं ततः परं दैवम् ।।६१।। नदी के दक्षिण तट पर उससे घिरे ग्राम ( उत्तम ) होते हैं। इक्यासी वास्तुपद एवं चौंसठ वास्तुपद-विन्यास से युक्त ग्राम का मध्य भाग ब्राह्मक्षेत्र एवं इसके पश्चात् दैव क्षेत्र होता है ।।६१।।

६२ मयमतम् मानुषमथ पैशाचं क्रमशः सङ्कल्प्य युक्त्या तु । दैविकमानुषभागे विप्राणां स्याद् गृहश्रेणी ॥६२॥ इसके पश्चात् मानुष एवं पैशाच क्षेत्र का निश्चय करना चाहिये। दैव एवं मानुष क्षेत्र में ब्राह्मणों के गृह होने चाहिये।।६२।। कर्मोपजीविनां स्यात्पैशाचे तत्र वा द्विजावासम् । तस्मिन् सुरगणभवनं क्रमशः प्रागादिषु स्थाप्यम् ॥६३॥ अपने कार्य के द्वारा अपनी आजीविका चलाने वालों का गृह पैशाच क्षेत्र में होना चाहिये अथवा वहाँ ब्राह्मणों का आवास होना चाहिये। उनके मध्य पूर्व आदि दिशाओं में क्रमानुसार देवालय की स्थापना करनी चाहिये।।६३।। ❋ प्रासादस्थानम् ❋ एतस्याभ्यन्तरे विप्रदेवतास्थापनं भवेत् । शिवहर्म्यं च ग्रामाणां समं बाह्येऽथवा भवेत् ॥६४॥ वास्तु-क्षेत्र के भीतर ब्राह्मण एवं देवता की स्थापना करनी चाहिये। शिवालय की स्थापना ग्राम के बाहर होनी चाहिये अर्थात् शिवालय की स्थापना इच्छानुसार ग्राम के भीतर या बाहर कहीं भी हो सकती है।।६४।। भृङ्गराजांशके वाऽपि पावके तु विनायकम् । ऐशांशे शिवहर्म्यं स्यात् सौम्ये वानान्तरेषु वा ॥६५॥ भृङ्गराज के या पावक के भाग पर विनायक का मन्दिर होना चाहिये। ईश के पद पर, सोम के पद पर अथवा अन्य किसी वास्तुपद पर शिवमन्दिर की स्थापना करनी चाहिये।।६५।। बाह्येऽस्य तु गृहश्रेणी मानेन विधिना कुरु । शैवानां परिवाराणां प्रोक्तं स्थानमिहोच्यते ॥६६॥ देवालय के बाहर गृहों की श्रेणी पूर्ववर्णित मान के अनुसार नियमपूर्वक होनी चाहिये। शिव के परिवार-देवताओं के स्थान का यहाँ वर्णन किया जा रहा है।।६६।। सूर्यपदे सौरं स्यादग्निपदे कालिकावेश्म । भृशभागे विष्णुगृहं याम्यायां षण्मुखस्थानम् ॥६७॥ सूर्य के वास्तुपद पर सूर्यदेवता का स्थान एवं अग्नि के पद पर कालिका का मन्दिर होना चाहिये। भृश के वास्तुपद पर विष्णुमन्दिर तथा यम के पद पर षण्मुख ( कार्तिकेय ) का मन्दिर होना चाहिये।।६७।।

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६३ भृशभागे मृगांशे तु नैर्ऋत्यां केशवालयम्। सुग्रीवांशे गणाध्यक्षः पुष्पदन्तपदेऽपि वा ॥६८॥ भृश, मृग या नैर्ऋत्य स्थान पर केशव का मन्दिर होना चाहिये। सुग्रीव के पद पर या पुष्पदन्त के पद पर गणाध्यक्ष ( गणेश ) का मन्दिर होना चाहिये।।६८।। आर्यकभवनं निर्ऋते वरुणे विष्णोर्विमानं स्यात्। स्थानकमासनशयनं धाम्येतास्मिन् क्रमेण चोर्ध्वतलात् ॥६९॥ आर्यक का भवन नैर्ऋत्य कोण में एवं विष्णु का विमान ( देवालय ) वरुण के पद पर होना चाहिये। मन्दिर में ऊपरी तल से क्रमशः विष्णु की स्थानक ( खड़ी ), आसन ( बैठी ) एवं शयन प्रतिमा होनी चाहिये।।६९।। अथवा मूलतलं घनमुपरितले स्थानकं प्रोक्तम्। सुगतालयमथ सुगले भृङ्गनृपे चैव जिनधाम ॥७०॥ अथवा भूतल पर बड़ी एवं भारी तथा ऊपरी तल पर स्थानक मुद्रा में विष्णुप्रतिमा होनी चाहिये। सुगल के पद पर सुगत ( बुद्ध ) की प्रतिमा एवं भृङ्गराज के पद पर जिन-देवालय होना चाहिये।।७०।। मदिरालयमथ वायौ मुख्ये कात्यायनीवासः । सोमे धनगृहं वा मातृणामालयं तत्र ॥७१॥ वायु के पद पर मदिरा का मन्दिर, मुख्य के पद पर कात्यायनी का मन्दिर, सोम के पद पर धनद ( कुबेर ) का मन्दिर अथवा मातृदेवियों का मन्दिर होना चाहिये।।७१।। ईशे शङ्करभवनं पर्जन्यांशे जयन्ते वा। सोमे धनदगृहं वा शोषपदे वा विधातव्यम् ॥७२॥ शिवालय ईश, पर्जन्य या जयन्त के पद पर, कुबेर का मन्दिर सोम अथवा शोष के पद पर निर्मित कराना चाहिये।।७२।। तत्र गजाननभवनं ह्यादितौ वा मातृकोष्ठं स्यात्। मध्ये विष्णोर्धिष्ण्यं तत्र सभामण्डपं प्रोक्तम् ॥७३॥ वहीं गणेश का भवन होना चाहिये। अथवा अदिति के पद पर मातृदेवियों का मन्दिर होना चाहिये। मध्य में विष्णु का मन्दिर होना चाहिये। वहीं सभामण्डप भी होना चाहिये—ऐसा कहा गया है।।७३।। ब्रह्मस्थानैशाने वाग्नेय्यां वा सभास्थानम्। तदुदक्पश्चिमभागे हरिसदनं दक्षिणे परतः ॥७४॥

६४ मयमतम् अथवा सभास्थल ब्रह्मा के पद पर ईशान कोण या आग्नेय कोण में होना चाहिये। विष्णुमन्दिर उत्तर-पश्चिम में अथवा दक्षिण में होना चाहिये।।७४।। क्रूरसमेतं कर्म प्रत्ययमथ पञ्च मध्ये तु। युग्मायुग्मपदे च ब्रह्मस्थानेऽष्टनवभागे ।।७५।। मध्य के पाँच पदों पर निर्माणकार्य दुःखकारक होता है। वास्तुमण्डल के युग्म पद से तथा अयुग्म पद (समसंख्या एवं विषमसंख्या) से निर्मित होने पर ब्रह्मस्थान आठ भाग एवं नौ भाग से निर्मित होना चाहिये।।७५।। व्यपनीयाजं भागं प्रागादिषु दिक्षु च क्रमशः। नलिनकभवनं स्वस्तिकनन्द्यावर्त्तौ प्रलीनकं चैव ।।७६।। यच्छ्रीप्रतिष्ठिताख्यं चतुर्मुखहर्म्यं तु पद्मसमम्। विष्णुच्छन्दविमानं त्रितलाद्द्वादशतलान्तम् ।।७७।। ब्रह्मा के भाग को छोड़ कर पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर क्रमशः नलिनक, स्वस्तिक, नन्द्यावर्त, प्रलीनक, श्रीप्रतिष्ठित, चतुर्मुख एवं पद्मसम भवन का निर्माण करना चाहिये। वहाँ तीन तल से लेकर बारह तलपर्यन्त विष्णुच्छन्द विमान का निर्माण होना चाहिये। बहिरप्येवं सौधं ग्रामादिषु तत्र विज्ञेयम्। स्थितमासीनं शयनं यत्र यदिष्टं तु तत्र तत्स्थाप्यम् ।।७८।। यह विष्णुमन्दिर ग्रामादि से बाहर भी हो सकता है। इसमें विष्णु की खड़ी, बैठी या शयन करती हुई मूर्ति स्थापित करनी चाहिये।।७८।। उत्कृष्टमध्यमाधमनीचादिकं क्रमेणैवम्। भवनं ग्रामेषूदितमिति नीचं चोत्तमे न स्यात् ।।७९।। ग्रामों में क्रमानुसार उत्कृष्ट, मध्यम, अधम एवं नीच आदि भवन होने चाहिये; किन्तु उत्तम ग्राम में नीच भवन नहीं होना चाहिये।।७९।। क्षुद्रे क्षुद्रविमानं यद्यत्रैवोचितं विधातव्यम्। त्रिचतुष्पञ्चतलं तद्धीने हीने च सामान्यम् ।।८०।। यदि ग्राम क्षुद्र हो तो वहाँ क्षुद्र विमान (छोटा मन्दिर) ही उचित है एवं वही बनाना चाहिये। तीन, चार एवं पाँच तल का देवालय हीन ग्राम में होना चाहिये तथा हीन ग्राम में सामान्य भवन होना चाहिये।।८०।। ग्रामे वा नगरे वोत्कृष्टे देवालयं तु नीचं चेत्। नीचा भवन्ति पुरुषाः स्त्रियोऽपि दुःशीलतां यान्ति ।।८१।।

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६५ उत्कृष्ट ग्राम अथवा नगर में यदि नीच श्रेणी का देवालय हो तो वहाँ के पुरुषों में नीच प्रवृत्ति एवं स्त्रियों में दुःशीलता होती है।।८१।। तस्मात् सममधिकं वा तत्सङ्घ्येव प्रयोक्तव्या । हरिहरसदनं वास्तुकमन्यत् सर्वं यथेष्टं स्यात् ॥८२॥ इसलिये ग्राम अथवा नगर की श्रेणी के समान या अधिक श्रेणी का मन्दिर निर्मित होना चाहिये। हरिहर मन्दिर अथवा अन्य सभी वास्तुनिर्मिति यथोचित होनी चाहिये।।८२।। ❋ दौवारिकाः ❋ चण्डेश्वरः कुमारो धनदः काली च पूतना चैव । कालीसुतश्च खड्गी चैते दौवारिकाः प्रोक्ताः ॥८३॥ चण्डेश्वर, कुमार, धनद, काली, पूतना, कालीसुत तथा खड्गी—ये देवता दौवारिक कहे गये हैं।।८३।। प्राक्प्रत्यङ्मुखमैशं ग्रामादिषु तत्पराङ्मुखं शुभदम् । विष्णुगृहं सर्वमुखं ग्रामस्यान्तर्मुखं शुभदम् ॥८४॥ ग्राम आदि में पूर्वमुख या पश्चिममुख शिव का स्थान होना चाहिये। यदि उनका मुख ग्रामादि से बाहर की ओर हो तो प्रशस्त होता है। विष्णु का मुख सभी दिशाओं में हो सकता है; किन्तु उनका मुख यदि ग्राम की ओर हो तो शुभ होता है।।८४।। शेषं पूर्वाभिमुखं मातृणामुत्तराभिमुखम् । प्रत्यग्द्वारं सौरं गेहारम्भात् पुरामरावासम् ॥८५॥ शेष देवगण पूर्वमुख होने चाहिये। मातृदेवियों को उत्तरमुख स्थापित करना चाहिये। सूर्यमन्दिर का द्वार पश्चिममुख होना चाहिये। पुर आदि में मनुष्यों के गृह से पहले देवालयों का निर्माण कराना चाहिये।।८५।। ❋ वर्ज्यस्थानानि ❋ हृदये वंशस्थाने शूले सूत्रे च सन्धौ च । कर्णसिरायां षट्के नोक्तान्यमरालयादीनि ॥८६॥ त्याज्य स्थान—वास्तुमण्डल के हृदय, वंश, सूत्र, सन्धिस्थल तथा कर्णसिराओं— इन छः स्थलों पर देवालय आदि का निर्माण नहीं होना चाहिये।।८६।। ❋ श्रेणिस्थानम् ❋ गोशाला दक्षिणतश्चोत्तरदेशे तु पुष्पवाटी स्यात् । पूर्वद्वारोपान्ते पश्चिमत्तस्तापसावासम् ॥८७॥ मय०-५

६६ मयमतम् अन्य श्रेणी के भवन-स्थान— (पुर तथा ग्राम आदि के ) दक्षिण ओर गोशाला एवं उत्तर में पुष्पवाटिका होनी चाहिये। पूर्व या पश्चिम द्वार के निकट तपस्वियों का आवास होना चाहिये।।८७।। सर्वत्रैव जलाशयमिष्टं वापी च कूपञ्च। वैश्यानां दक्षिणतः परितः सदनं तु शूद्राणाम् ।।८८।। जलाशय, वापी एवं कूप सभी स्थानों पर होना चाहिये। वैश्यों का आवास दक्षिण में एवं शूद्रों का आवास चारो ओर होना चाहिये।।८८।। प्राच्यां वाऽप्युत्तरतो गेहं कुर्यात् कुलालानाम्। तत्रैव नापितानामन्यत्कर्मोपयुक्तानाम् ।।८९।। पूर्व अथवा उत्तर दिशा में कुम्हारों के गृह होने चाहिये। वहीं नाइयों का एवं अन्य हस्तकौशल वालों के भी गृह होने चाहिये।।८९।। मत्स्योपजीविनां स्याद्वासं वायव्यदेशे तु। पश्चिमदेशे मांसैरुपवृत्तीनां निवासः स्यात् ।।९०।। उत्तर-पश्चिम दिशा में मछुआरों का निवास होना चाहिये। पश्चिमी क्षेत्र में मांस से आजीविका चलाने वालों का निवास होना चाहिये।।९०।। तैलोपजीविनां चैवोत्तरदेशे गृहश्रेणिः। तेलियों के गृह उत्तर दिशा में होने चाहिये। ✺ गृहलक्षणम् ✺ धनुभिस्त्रिपञ्चसप्तभिरथ नवभिर्गृहावधिः प्रोक्तः ।।९१।। गृह के लक्षण—गृहों की चौड़ाई तीन, पाँच, सात या नौ धनुप्रमाण होनी चाहिये।।९१।। दण्डाभ्यामथ तस्मादायामं वर्धयेत् क्रमशः। व्यासद्विगुणावधिकं यावद् दैर्घ्यं गृहीतव्यम् ।।९२।। गृहों की लम्बाई चौड़ाई से क्रमशः दो-दो दण्ड बढ़ानी चाहिये। लम्बाई उतनी ही ग्रहण करनी चाहिये, जितनी कि चौड़ाई की दुगुनी से अधिक न हो जाय।।९२।। तत्रैव हस्तमानैर्गेहं कुर्याद् यथाविधिना। रुचकः स्वस्तिकमथवा नन्द्यावर्त्तञ्च सर्वतोभद्रम् ।।९३।। गृहों का निर्माण विधि के अनुसार हस्तप्रमाण से करना चाहिये। ये गृह रुचक, स्वस्तिक, नन्द्यावर्त और सर्वतोभद्र (किसी एक शैली के ) हो सकते हैं।।९३।।

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६७ स्याद् वर्धमानमेषामाकृत्या तच्चतुर्गृहं प्रोक्तम्। दण्डकशालालाङ्गलमथवा शूर्पं यथेष्टं स्यात् ।।९४।। गृह ( सर्वतोभद्र या ) वर्धमान हो सकता है। आकृति की दृष्टि से ये चार गृह कहे गये हैं। अथवा दण्डक, लाङ्गल या शूर्प गृह इच्छानुसार हो सकते हैं।।९४।। ग्रामात् किञ्चिद्दूरे पावकदेशेऽथवा वायौ। वासः स्यात्स्थपतीनां शेषाणां तत्र कर्तव्यम् ।।९५।। ग्राम से कुछ दूरं आग्नेय अथवा वायव्य कोण में स्थपतियों का आवास होना चाहिये। शेष का आवास भी वहीं बनवाना चाहिये।।९५।। तस्मात् किञ्चिद्दूरे रजकादीनां निवासः स्यात्। चण्डालकुटीराणि पूर्वायां क्रोशमात्रे तु ।।९६।। उससे कुछ दूर रजक ( धोबी ) आदि का आवास होना चाहिये। ग्राम से पूर्व दिशा में एक कोस की दूरी पर चण्डाल वर्ग का आवास होना चाहिये ।।९६।। चण्डालयोषितस्तास्ताम्रायःसीसभूषणाः सर्वाः। पूर्वाह्ने मलमोक्षक्रियोचिता ग्राममावेश्य ।।९७।। वहाँ चण्डाल-स्त्रियाँ ताम्र, अयस् एवं सीसे के आभूषण पहने हुये निवास करें। दिन के प्रथम प्रहर में ग्राम में प्रवेश कर चण्डाल वर्ग ग्राम की गन्दगी साफ करें।।९७।। प्रागुत्तरदिशि दण्डैः पञ्चशतैः स्याच्छवावासम्। शेषाणामपि तत्तदूरे देशे श्मशानं स्यात् ।।९८।। पूर्वोत्तर दिशा में ग्राम से पाँच सौ दण्ड दूर शवों ( की अन्त्येष्टि क्रिया ) का स्थान होना चाहिये। शेष लोगों ( सामान्य जनों से पृथक् ) का श्मशान उससे दूर होना चाहिये।।९८।। ✹ विन्यासदोषाः ✹ चण्डालचर्मकारश्मशानतोयाशयापयानञ्च । देवगृहविश्वकोष्ठग्रामावृतदेशमार्गपरिवृत्तिः ।।९९।। भवन-विन्यास के दोष—चण्डाल एवं चर्मकार का आवास, श्मशान, जलाशय, देवालय, विश्वकोष्ठ ( सभी पदार्थों का संग्रहस्थल ), ग्राम के चारो ओर का परिवेश एवं ग्राम के चारो ओर के मार्ग यदि उचित स्थान पर नहीं होते हैं ( तो उनका परिणाम कष्टकर होता है )।।९९।।

६८ मयमतम् व्यसनं ग्रामविनाशो नृपभङ्गो भवति मरणं च। देवालयान्तरापणशून्यत्वं शोध्यसञ्चयं चापि ॥१००॥ मार्गेऽशुद्धक्षेपणमीदृग् ग्रामस्य शून्यतादायि । उपर्युक्त का दुष्परिणाम ग्राम का विनाश, राजा का भङ्ग (हानि) एवं मृत्यु होता है। देवालय एवं हाट का रिक्त होना, कूड़े का संग्रह तथा मार्ग में अशुद्ध वस्तुओं (कूड़े आदि) का फेंका जाना ग्राम को शून्य कर देता है॥१००॥ ☀ गर्भविन्यासः ☀ ग्रामादीनां च सर्वेषां गर्भविन्यासमुच्यते ॥१०१॥ शिलान्यास—सभी ग्रामादिकों के गर्भ-विन्यास का वर्णन किया जाता है॥१०१॥ सगर्भं सर्वसम्पत्त्यै विगर्भं सर्वनाशनम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गर्भं सम्यग्विनिक्षिपेत् ॥१०२॥ (ग्रामादि का) गर्भयुक्त होना सभी प्रकार की सम्पत्तियों का एवं गर्भहीन होना सभी प्रकार के विनाश का कारण होता है

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६९ उन्नतं तावदेवं स्याद्वृत्तं स्याच्चतुरस्रकम् । सपञ्चपञ्चकोष्ठं वा नवकोष्ठकमेव वा ॥१०६॥ ताम्रपात्र की ऊँचाई उसकी चौड़ाई के समान होनी चाहिये। उसमें पच्चीस अथवा नौ कोष्ठ होने चाहिये ।।१०६।। उपपीठपदे देवास्तस्मिन् पात्रे तु सम्मताः । रजतेन वृषः सूर्ये वज्री हाटकनिर्मितः ॥१०७॥ उपपीठ पद से युक्त (पच्चीस कोष्ठ वाले) उस पात्र में वास्तुदेवों को स्थान देना चाहिये। सूर्य के कोष्ठ में रजतनिर्मित वृष एवं सुवर्णनिर्मित इन्द्र को स्थापित करना चाहिये ।।१०७।। यमे तु यमराजश्च शुल्बेनायसवारणः । हैमः सिंहस्तु रूप्येण वरुणे सजलाधिपः ॥१०८॥ यम के पद पर ताम्रनिर्मित यमराज, लौहनिर्मित सिंह एवं रजतनिर्मित वरुण को स्थापित करना चाहिये ।।१०८।। वाजी श्वेतमयः सोमे राजतो द्विजराजकः । ईशे वैकृन्तमनले त्रपु सीसं तु नैर्ऋते ॥१०९॥ सोम के पद पर श्वेत वर्ण का (रजतमय) अश्व तथा रजतनिर्मित गज रखना चाहिये। ईश के पद पर पारा, अग्नि पर टिन, निर्ऋति पर सीसा रखना चाहिये ।।१०९।। स्वर्णं समीरणे जातिहिङ्गुल्यं तु जयन्तके । हरितालं भृशे भागे वितथे तु मनःशिला ॥११०॥ समीरण के पद पर सुवर्ण, जयन्त पर सिन्दूर, भृश पर हरिताल तथा वितथ पर मनःशिला (मैनसिल) रखना चाहिये ।।११०।। माक्षिकं भृङ्गराजे स्याद्राजावर्तं सुकन्धरे । गैरिकं शोषभागे तु गणमुख्येऽञ्जनं भवेत् ॥१११॥ भृङ्गराज पर माक्षिक (एक खनिज पदार्थ), सुकन्धर पर लाजावर्त, शोष पर गैरिक (गेरु) तथा गणमुख्य पर अञ्जन रखना चाहिये ।।१११।। अदितौ दरदं विद्यादेवमेव न्यसेत् क्रमात् । चतुष्पदे च लोकेशाः स्थाप्याश्चाभ्यन्तराननाः ॥११२॥ अदिति पर रक्त वर्ण का ताम्र रखना चाहिये। उपर्युक्त सभी को भली-भाँति जान कर क्रमानुसार रखना चाहिये। चतुष्पदों पर लोकनाथों को इस प्रकार स्थापित करना

७० मयमतम् चाहिये, जिससे उनका मुख केन्द्र की ओर रहे।।११२।। षड्भिः पञ्चचतुस्त्रिद्विमात्रे बिम्बोदयं भवेत्। तदर्धं वाहनोत्सेधं स्थानकासनमेव वा ।।११३।। इन देवों की प्रतिमा की ऊँचाई छः, पाँच, चार, तीन या दो अङ्गल होनी चाहिये एवं उनके वाहनों की ऊँचाई पूर्वोक्त माप की आधी होनी चाहिये। प्रतिमायें स्थानक मुद्रा ( खड़ी ) अथवा आसन मुद्रा ( बैठी ) में होनी चाहिये ।।११३।। मुक्तापवत्से मरीचौ विद्रुमं सवितर्यथ। पुष्परागं च वैडूर्यं विवस्वति विनिक्षिपेत् ।।११४।। आपवत्स पर मोती, मरीचि पर मूँगा, सविता पर पुष्पराग ( पोखराज ) तथा विवस्वान् पर वैदूर्य मणि रखना चाहिये।।११४।। वज्रमिन्द्रजये विद्यादिन्द्रनीलं तु मित्रके। रुद्रराजे महानीलं मरकतं तु महीधरे ।।११५।। इन्द्रजय पर हीरा, मित्रक पर इन्द्रनील, रुद्रराज पर महानील तथा महीधर पर मरकत ( पन्ना ) रखना चाहिये।।११५।। मध्यमे पद्मरागं तु विन्यसेद् गर्भभाजने। रत्नानि धातवश्चैव स्वस्वविस्तारभाजने ।।११६।। पात्र के मध्य में पद्मराग ( रुबी ) रखना चाहिये। रत्न एवं धातुओं को पात्र में उनके उचित स्थान पर रखना चाहिये।।११६।। तद्देवस्थानभावज्ञैरानीतानि निधापयेत्। हेमायस्ताप्ररूप्यैश्च स्वस्तिकानि चतुर्दिशि ।।११७।। उन देवों के स्थान एवं स्थिति को विधिपूर्वक ज्ञात कर रत्नादि को रखना चाहिये। चारो दिशाओं में सुवर्ण, आयस ( लौह ), ताँबे एवं चाँदी के स्वस्तिक रखने चाहिये।।११७।। ब्रह्मस्थानाद् बहिष्ठानि पूर्वादौ स्थापयेत्क्रमात्। स्वर्णेन शालिं रूप्येण व्रीहिं चायसकोद्रवम् ।।११८।। ब्रह्मस्थान के बाहर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर दिशा में सुवर्ण के साथ शालिधान्य, चाँदी के साथ व्रीहि, अयस के साथ कोद्रव ( कोदो ) रखना चाहिये।।११८।। त्रपुकङ्कं सीसमाषं तिलं वैकृन्तकल्पितम्। मुद्गं चायोमयं ताम्रं कुलत्थमिति लोहजान् ।।११९।।

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ७१ टिन के साथ कङ्गु धान्य, सीसा के साथ माष (उड़द), तिल पारे के साथ, मूँग को अयस (लोह) के साथ तथा कुलत्थ को ताम्र धातु के साथ रखना चाहिये।।११९।। भाजनाय बलिं दत्त्वा पश्चात् सर्वं निधापयेत् । अङ्गुलाधिकविस्तीर्णमायामं द्वादशाङ्गुलम् ।।१२०।। प्रथमतः पात्र के लिये बलि (उपर्युक्त वर्णित पदार्थ) प्रदान करना चाहिये। इसके पश्चात् सभी पदार्थों को पात्र में रख देना चाहिये। (पात्र को ढकने के लिये) एक अङ्गुल से अधिक चौड़ा तथा बारह अङ्गुल लम्बा पत्र लेना चाहिये।।१२०।। पञ्चाङ्गुलेन वृद्धिः स्याद्द्वात्रिंशत्प्रमाणतः । खादिरं चेन्द्रकीलं स्यात्तस्याग्रं चित्रवृत्तकम् ।।१२१।। बारह अङ्गुल से लेकर पाँच-पाँच अङ्गुल के वृद्धि-मान से बत्तीस अङ्गुल तक (पत्र) का प्रमाण हो सकता है। यह इन्द्रकीलसंज्ञक पत्र खदिर के काष्ठ का गोलाकार निर्मित होना चाहिये।।१२१।। भाजनोपरि तत्स्थाप्यं गर्भन्यासविचक्षणैः । स्थानीये द्रोणमुखे खर्वटे प्रतिनागरे ।।१२२।। गर्भ-विन्यास के ज्ञाता को इस पत्र को पात्र के ऊपर रखना चाहिये। यह गर्भ- विन्यास स्थानीय, द्रोणमुख तथा खर्वट एवं प्रत्येक प्रकार के नगर में करना चाहिये। ग्रामे च निगमे खेटे पत्तने कोत्मकोलके । ब्रह्मण्यार्यर्कभागेऽपि विवस्वति यमे तथा ।।१२३।। मित्रे च वरुणे चैव सोमे च पृथिवीधरे । द्वारदक्षिणदेशे वा ह्येतेषां गर्भ इष्यते ।।१२४।। (उपर्युक्त के अतिरिक्त) ग्राम, निगम, खेट, पत्तन तथा कोत्मकोलक आदि वसति- विन्यासों में गर्भ-विन्यास ब्रह्मा, आर्य, अर्क, विवस्वान्, यम, मित्र, वरुण, सोम एवं पृथिवीधर के भाग में या द्वार के दक्षिण भाग में करना चाहिये।।१२३-१२४।। पुष्पदन्ते च भल्लाटे महेन्द्रे च गृहक्षते । विष्णुस्थाने श्रियः स्थाने स्कन्दस्थानेऽथवा पुनः ।।१२५।। स्थापयेद् ग्रामरक्षार्थं सर्वकामाभिवृद्धये । गर्भमादौ विनिक्षिप्य बिम्बं तदुपरि न्यसेत् ।।१२६।। (द्वार के दक्षिण भाग में) पुष्पदन्त, भल्लाट, महेन्द्र एवं गृहक्षत के पद पर अथवा विष्णु के स्थान (मन्दिर), लक्ष्मी के स्थान या स्कन्द के स्थान में ग्राम की

७२ मयमतम् रक्षा के लिये एवं सभी प्रकार की कामनाओं की वृद्धि के लिये गर्भ-विन्यास करना चाहिये। प्रथमतः ( गर्त में ) गर्भ-विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् उसके ऊपर मूर्तियों को स्थापित करना चाहिये।। १२५-१२६।। शिलेष्टकचिते खाते पुरुषाञ्जलिमात्रके। अनुक्तानां च सर्वेषामजभागादिषु न्यसेत् ।।१२७।। गर्भ-विन्यास वाले क्षेत्र को ( गर्त को ) शिलाओं एवं इष्टकाओं से निर्मित करना चाहिये। इसका माप पुरुष का अञ्जलिप्रमाण रखना चाहिये। अवर्णित सभी पदार्थों को ब्रह्म आदि के भाग में रखना चाहिये ( अवर्णित पदार्थों का वर्णन 'गर्भिविन्यास' अध्याय में प्राप्त होता है ) ।।१२७।। सुरक्षं तु यथागर्भं स्थपतिः स्थापयेत् स्थिरम्। अत्रानुक्तं तु तत्सर्वं द्रष्टव्यं गर्भलक्षणे ।।१२८।। जिस विधि से गर्भिविन्यास सुरक्षित एवं स्थिर रहे ( तथा भवननिर्माण भी सुरक्षित एवं स्थिर रहे ), उसी रीति से स्थपति को गर्भ स्थापित करना चाहिये। यहाँ जिनका वर्णन नहीं किया गया है, उन सभी का वर्णन गर्भलक्षण ( गर्भिविन्यास, अध्याय- १२ ) में किया गया है।।१२८।। एवं प्रोक्ता भूमितिर्देवतानां वर्णानाञ्चाप्यत्र जात्यन्तराणाम्। ग्रामादीनां मानविन्यासमार्गं सालङ्कारं चारु संक्षिप्य तन्त्रात् ।।१२९।। इस प्रकार देवों के अनुरूप भूमि का माप ( वास्तुमण्डल ), वर्ण एवं अन्य जातियों के अनुकूल माप, ग्रामादिकों का प्रमाण, मार्गयोजना आदि को तन्त्रों से अलङ्कार- सहित, सुन्दर ढंग से एवं संक्षेप में लिया गया है।।१२९।। दद्यान्नृपः स्थपतिकादिचतुष्टयेभ्यो मानादिकर्मनिपुणेभ्य इडाञ्च गाञ्च। नित्यं यथा जगति वित्तमनेकवस्तु- न्याचन्द्रतारमधिवासभुवं मुदा सः ।।१३०।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे ग्रामविन्यासो नाम नवमोऽध्यायः

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः '७३ राजा को मापन आदि कर्म में निपुण चारो स्थपतियों को भूमि एवं गायें प्रदान करनी चाहिये; जो व्यक्ति इस प्रकार करता है, उसे संसार में चन्द्रमा एवं तारों की स्थितिपर्यन्त सर्वदा धन एवं अनेक ( समृद्धिदायक ) वस्तुओं की प्राप्ति होती रहती है एवं वह सर्वदा प्रसन्न रहता है।।१३०।।

अथ दशमोऽध्यायः ( नगरविधानम् ) नगरादीनां मानं विन्यासञ्च क्रमादहं वक्ष्ये । नगर-योजना—मैं नगर आदि के प्रमाण एवं विन्यास का क्रमानुसार वर्णन करता हूँ। ✵ नगरमानम् ✵ आद्यं धनुषां त्रिशतं तस्माच्छतदण्डवर्धनादुपरि ॥१॥ साष्टकसप्ततिभेदाश्चाष्टसहस्रान्तकं यावत् । नगराणां विपुलं हि प्रोक्तं पूर्वोक्तमानेन ॥२॥ नगरों का प्रमाण—नगर का प्रमाण तीन सौ धनुष से प्रारम्भ होकर एक-एक सौ दण्ड की वृद्धि करते हुये आठ हजार दण्ड तक प्राप्त होता है। इसके अठहत्तर भेद बनते हैं। इस प्रकार नगरों के विस्तार का प्रमाण प्राप्त होता है।।१-२।। शतदण्डादिदशवृद्ध्या त्रिःसप्तत्रिशतदण्डान्तम् । क्षुद्राणामिदमुदितं नगराणामेव सर्वेषाम् ॥३॥ एक सौ दण्ड से प्रारम्भ कर दश-दश दण्ड की वृद्धि करते हुये तीन सौ दण्ड- पर्यन्त सभी क्षुद्र नगरों के इक्कीस विस्तार-प्रमाण प्राप्त होते हैं।।३।। उत्कृष्टपुरपरिधिर्नृपतेर्यष्टिद्विरष्टसाहस्रैः । चातुःसहस्रकान्तं पञ्चशतोनाद्धि पञ्चपञ्चधा मानम् ॥४॥ राजाओं के उत्तम पुरों की परिधि का प्रमाण सोलह हजार यष्टिप्रमाण से प्रारम्भ कर पाँच सौ दण्ड कम करते हुये चार हजार पर्यन्त कहा गया है। इस प्रकार इनके पच्चीस प्रमाणभेद बनते हैं।।४।। त्रिशतादिचतुःशतकं यावद्वृद्ध्या तु विंशतिभिः । षड्विधमुक्तं खेटं श्रेष्ठे मध्ये परे विपुलम् ॥५॥ तीन सौ दण्ड से प्रारम्भ कर बीस-बीस दण्ड की वृद्धि करते समय चार सौ दण्डपर्यन्त खेट के छः प्रकार के भेद वर्णित हैं। इनमें दो श्रेष्ठ, दो मध्यम एवं दो कनिष्ठ प्रकार के खेट होते हैं।।५।।

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७५ तस्मात् त्रिराष्टवृद्ध्या द्रोणमुखे पञ्चधा मानम् । षण्णवतिचतुःशतकं यावत्तावत्तु विस्तारम् ॥१६॥ उससे ( चार सौ दण्ड से ) चौबीस-चौबीस दण्ड की वृद्धि करते हुये चार सौ छियानबे दण्डपर्यन्त द्रोणमुख वास्तु के पाँच प्रकार बनते हैं। ये इनके विस्तारमान कहे गये हैं।।१६।। द्विशतादिचतुःशतकं यावत्पञ्चाशदभिवृद्ध्या । पञ्चप्रमाणमेवं खर्वटविस्तार उद्दिष्टः ॥१७॥ दो सौ दण्ड से प्रारम्भ करते हुये पचास-पचास दण्ड की क्रमशः वृद्धि चार सौ दण्डपर्यन्त की जाती है। इस प्रकार खर्वट के विस्तार के पाँच प्रमाणभेद प्राप्त होते हैं।।१७।। द्विशतादिपङ्क्तिवृद्ध्या चत्वारिंशत्त्रिशतदण्डं स्यात् । यावन्निगमे विपुलाः प्रोक्तास्त्रिःपञ्चभेदाश्च ॥१८॥ दो सौ से प्रारम्भ कर दश-दश दण्ड की वृद्धि करते हुये तीन सौ चालीस दण्डपर्यन्त निगम के विस्तार का मान प्राप्त होता है। विस्तारमान की दृष्टि से इसके पन्द्रह भेद बनते हैं।।१८।। शतदण्डे शतवृद्ध्या पञ्चशतं यावदुद्दिष्टम् । स्यात् कोत्मकोलकानां विपुलं पञ्चैव भेदेन ॥१९॥ शत दण्ड से प्रारम्भ कर एक-एक सौ दण्ड की वृद्धि करते हुये पाँच सौ पर्यन्त कोत्मकोलक का विस्तार रखा जाता है। विस्तारमान की दृष्टि से इसके पाँच भेद होते हैं।।१९।। तावन्मानं प्रोक्तं पुरविपुले सूरिभिः प्राज्ञैः । यावत्पञ्चशतान्तं त्रिशतादारभ्य सप्तधा मानम् ॥ १२०॥ पञ्चाशद्धनुवृद्ध्या विपुलं कथितं विडम्बस्य । प्रागुपदिष्टं मानं ह्येतन्मानं तु वै तेषाम् ॥१२१॥ विद्वान् मनीषियों ने पुरों के विस्तार के प्रमाणों का इस प्रकार वर्णन किया है। विडम्ब का विस्तार-मान तीन सौ दण्ड से प्रारम्भ कर पचास-पचास दण्ड की वृद्धि करते हुये पाँच सौ दण्डपर्यन्त होता है। इसके प्रमाण की दृष्टि से सात भेद बनते हैं। पूर्ववर्णित मान ही इनका ( समानुपातिक ) मान होता है।।१२०-१२१।। द्विगुणं त्रिपादमर्धं पादं तेषां मुखायतं विपुलात् । विपुले तु षडष्टांशे भागेनैकेन वायतं पुरतः ॥१२२॥

७६ मयमतम् इन पुरादिकों की लम्बाई इनकी चौड़ाई की दुगुनी, तीन चौथाई, आधी अथवा चतुर्थांश अधिक होती है। अथवा चौड़ाई का षष्ठांश या अष्टमांश अधिक लम्बाई रखनी चाहिये।।१२।। ✺ वप्रविधानम् ✺ चतुरस्रमायतास्रं वृत्तं वृत्तायतं च पुनः। स्याद् गोलवृत्तमेवं वप्राकारास्तु पञ्चैव ।।१३।। प्राकार-योजना—नगर का प्राकारमण्डल ( चारदिवारी ) पाँच प्रकार की होती है—चौकोर, आयताकार, वृत्ताकार, वृत्तायताकार ( लम्बाई लिये वृत्ताकार ) तथा गोलवृत्ताकार।।१३।। पङ्क्त्यष्टसप्तपञ्चकचतुरंशैस्तत्कृते विपुले। मुनिरसशरयुगशिखिभिर्भागैर्वप्रावधिः प्रोक्तः ।।१४।। प्राकार-मण्डल की लम्बाई दश, आठ, सात, पाँच एवं चार तथा चौड़ाई सात, छः, पाँच, चार एवं तीन रखनी चाहिये।।१४।। द्वित्रिचतुर्हस्तं स्याद्विपुलं सालस्य तुङ्गे तु। सप्तदशैकादशभिर्हस्तैरग्रं तु त्र्यंशोनम् ।।१५।। परितः परिखा बाह्येऽबाह्ये देवालयादीनि। वप्र के मूल का विस्तार दो, तीन या चार हस्त तथा ऊँचाई सात, दश या ग्यारह हस्त रखना चाहिये। इसके ऊर्ध्व भाग का विस्तार मूल से तीन भाग कम होना चाहिये। देवालय आदि के बाहर एवं भीतर परिखा ( जलयुक्त खाई ) होनी चाहिये।।१५।। ✺ वर्ज्यस्थानानि ✺ पेचकभागाद्यासनभागान्तं चण्डितं प्रोक्तम् ।।१६।। सूत्रादीन्यथ विषमस्थानानि च वर्जयेन्मतिमान्। त्याज्य स्थान—पेचक वास्तु-विन्यास ( चार पद वास्तु ) या आसन वास्तु- विन्यास ( एक सौ पद वास्तु ) अथवा इन दोनों के मध्य आने वाले वास्तु-विन्यासों में से किसी का प्रयोग किया जा सकता है। बुद्धिमान व्यक्ति को निर्माण करते समय वास्तु के सूत्रादिकों एवं विषम स्थलों का परित्याग करना चाहिये।।१६।। ✺ मार्गाः ✺ प्रागुदगग्रं मार्गं तत्र यथेष्टं न्यसेद्विधिना ।।१७।। वहाँ मार्ग की योजना इच्छानुसार विधिपूर्वक पूर्व तथा उत्तर से प्रारम्भ करते हुये करनी चाहिये।।१७।।

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७७ दण्डादिसप्तदण्डं यावद्दण्डार्धवॄद्ध्या तु। मार्गविशालाश्चैते त्रयोदशभेदाः समुद्दिष्टाः ॥१८॥ मार्गों का विस्तार एक दण्ड से प्रारम्भ कर आधा-आधा दण्ड बढ़ाते हुये सात दण्डपर्यन्त रखना चाहिये। इस प्रकार विस्तार की दृष्टि से मार्ग के तेरह भेद कहे गये हैं॥१८॥ ❊ राजधानी ❊ राष्ट्रस्य मध्यभागे सज्जनबहुले नदीसमीपे च। नगरं केवलमथवा राजगृहोपेतराजधानी वा ॥१९॥ राष्ट्र (राज्य) के मध्य भाग में, नदी के निकट, श्रेष्ठ लोगों की जनसंख्या जहाँ अधिक हो, ऐसा वसति-विन्यास केवल नगर होता है। उस नगर में यदि राजभवन हो तो उसे राजधानी कहते हैं॥१९॥ दिक्षु चतुर्द्वारयुतं गोपुरयुक्तं तु सालाढ्यम्। क्रयविक्रयकैर्युक्तं सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥२०॥ चारो दिशाओं में चार द्वार से युक्त, द्वारों पर शालयुक्त गोपुर, क्रय-विक्रय के स्थानों (बाजार) से युक्त एवं सभी वर्णों के आवास से युक्त स्थान (नगर होता है)॥२०॥ सर्वसुरालयसहितं नगरमिदं केवलं प्रोक्तम्। प्रत्यगुदग्दिशि गहना परितः साला बहिः सपांसुचया ॥२१॥ सभी देवों के मन्दिर से युक्त स्थान को केवल नगर कहा गया है। (राजधानी के) पूर्व एवं उत्तर दिशा में गहरा होता है तथा बाहर चारो ओर गीली मिट्टी से निर्मित प्राकार होता है॥२१॥ परितः परिखा बाह्ये शिबिरयुतानेकमुखरक्षा। पूर्वायां दक्षिणतश्चाभिमुखा राजबलयुक्ता ॥२२॥ प्राकार-मण्डल के बाहर चारो ओर परिखा होती है। नगर (राजधानी) के रक्षार्थ शिविर होता है, जहाँ से प्रत्येक दिशा पर दृष्टि रक्खी जाती है। राज्य के प्रहरी सैनिक पूर्व एवं दक्षिण दिशा में मुख करके पहरा देते हैं॥२२॥ उन्नतगोपुरयुक्ता नानाविधमालिकोपेता। सर्वसुरालयसहिता नानागणिकान्विता बहुद्याना ॥२३॥ नगर में ऊँचे-ऊँचे गोपुर (प्रवेशद्वार) होते हैं, जिनमें अनेक मालिकायें होती हैं।

७८ मयमतम् उसमें सभी देवों के मन्दिर, नाना प्रकार की गणिकायें एवं बहुत से उद्यान होते हैं।।२३।। हस्त्यश्वरथपदातिबहुमुख्या सर्वजनयुक्ता। द्वारोपद्वारयुताभ्यन्तरतोऽनेकजनवासा ॥२४॥ यहाँ गज, अश्व, रथ एवं पैदल सैनिक होते हैं। सभी प्रकार के एवं सभी वर्ण के लोग निवास करते हैं। इस नगर में द्वार एवं उपद्वार (छोटे प्रवेशद्वार ) होते हैं। नगर के भीतर अनेक प्रकार के जनावास होते हैं।।२४।। या नृपवेश्मसमेता सा कथिता राजधानीति । काननवनदेशे वा सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥२५॥ क्रयविक्रयकैर्युक्तं पुरमुदितं यत्तदेव नगरमिति । इस प्रकार का राजभवन से युक्त नगर राजधानी कहलाता है। जो वन-प्रदेश में स्थित होता है, जहाँ सभी प्रकार के लोग बसते हैं एवं क्रय-विक्रय के स्थल ( हाट, बाजार ) से युक्त पुर को नगर कहते हैं।।२५।। ✵ खेटादिभेदाः ✵ शूद्रैरधिष्ठितं यन्नद्यचलावेष्टितं तु तत्खेटम् ॥२६॥ नदी अथवा पर्वत से घेरे एवं शूद्रों के निवास से युक्त स्थान को खेट कहते हैं।।२६।। परितः पर्वतयुक्तं खर्वटकं सर्वजनसहितम्। खर्वटखेटकमध्ये यज्जनताढ्यं जनस्थानकुब्जम् ॥२७॥ चारो ओर पर्वत से घिरे हुये, सभी वर्णों के आवास से युक्त स्थान को खर्वटक कहते हैं। खेट एवं खर्वट के मध्य स्थित घनी जनसंख्या वाले स्थान को कुब्ज कहते हैं।।२७।। द्वीपान्तरागतवस्तुभिरभियुक्तं सर्वजनसहितम् । क्रयविक्रयकैर्युक्तं रत्नधनक्षौमगन्धवस्वाढ्यम् ॥२८॥ सागरवेलाभ्याशे तदनुगतायामि पत्तनं प्रोक्तम्। अन्य द्वीपों से आये हुये वस्तुओं से युक्त, सभी प्रकार के लोगों से युक्त, क्रय- विक्रयस्थल से युक्त, रत्न, धन, सिल्क के वस्त्रों से युक्त तथा विविध प्रकार के सुगन्धियों ( इत्र आदि ) से युक्त, सागर-तट पर स्थित एवं उससे सम्बद्ध नगर को पत्तन कहते हैं।।२८।।

दशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७९ परनृपदेशसमीपे युद्धारम्भक्रियोपेतम् ॥२९॥ सेनासेनापतियुतमिदमुदितं शिबिरमिति च वरैः । सर्वजनैः सङ्कीर्णं नृपभवनयुतं तदेव तथा ॥३०॥ बहुरक्षोपेतं यत् सेनामुखमुच्यते तज्ज्ञैः । शत्रु-देश के समीप स्थित, युद्ध प्रारम्भ करने के लिये सभी सामग्रियों से युक्त तथा सेना एवं सेनापति से युक्त स्थान को शिविर कहते हैं। वही स्थान सभी प्रकार के लोगों के आवास से युक्त एवं राजभवन से युक्त होता है तथा बहुत-सी सेनाओं से युक्त होता है, तो उसे सेनामुख कहते हैं।।२९-३०।। नद्यद्रिपार्श्वयुक्तं नृपभवनयुतं सबहुरक्षम् ॥३१॥ यन्नृपतिस्थापितकं तत्स्थानीयं समुद्दिष्टम् । नदी के किनारे या पर्वत के पास, राजभवन तथा बहुत से सैनिकों से युक्त तथा राजा के द्वारा स्थापित स्थान को स्थानीय कहते हैं।।३१।। नद्यब्धिदक्षिणादक्षिणभागवणिगादिसंयुक्तम् ॥३२॥ सर्वजनावासं यद् द्रोणमुखं प्रोक्तमाचार्यैः । ग्रामसमीपे जनतालयमिदमुदितं विडम्बमिति ॥३३॥ नदी के उत्तर एवं दक्षिण दोनों भागों में अथवा समुद्र के किनारे बसे हुये स्थान को द्रोणमुख कहते हैं। यहाँ व्यापारी वर्ग (प्रधान रूप से) तथा अन्य सभी वर्गों के लोग निवास करते हैं। ग्राम के समीप जनावास को विडम्ब कहा जाता है।।३२-३३।। वनमध्ये जनवासं यत्कोत्मकोलकं प्रोक्तम्। चातुर्वर्ण्यसमेतं सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥३४॥ बहुकर्मकारयुक्तं यन्निगमं तत् समुद्दिष्टम् । वन के मध्य में स्थित जनस्थान को कोत्मकोलक कहा जाता है। जो स्थान चारो वर्गों के लोगों से युक्त हो, सभी प्रकार के लोगों से बसा हो तथा अधिक संख्या में जहाँ हस्तशिल्पी निवास करते हों, उसे निगम कहते हैं।।३४।। नद्यद्रिवनसमेतं बहुजनयुक्तं सनृपवासम् ॥३५॥ एतत् स्कन्धावारं तत्पार्श्वे चेरिका प्रोक्ता। नदी, पर्वत एवं वन से युक्त, जहाँ की जनसंख्या अधिक हो एवं जहाँ राजा निवास करते हों; ऐसे स्थान को स्कन्धावार कहते हैं। इसके पार्श्व में चेरिका जनावास होता है।।३५।।