मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ मयमतम् रक्षा के लिये एवं सभी प्रकार की कामनाओं की वृद्धि के लिये गर्भ-विन्यास करना चाहिये। प्रथमतः ( गर्त में ) गर्भ-विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् उसके ऊपर मूर्तियों को स्थापित करना चाहिये।। १२५-१२६।। शिलेष्टकचिते खाते पुरुषाञ्जलिमात्रके। अनुक्तानां च सर्वेषामजभागादिषु न्यसेत् ।।१२७।। गर्भ-विन्यास वाले क्षेत्र को ( गर्त को ) शिलाओं एवं इष्टकाओं से निर्मित करना चाहिये। इसका माप पुरुष का अञ्जलिप्रमाण रखना चाहिये। अवर्णित सभी पदार्थों को ब्रह्म आदि के भाग में रखना चाहिये ( अवर्णित पदार्थों का वर्णन 'गर्भिविन्यास' अध्याय में प्राप्त होता है ) ।।१२७।। सुरक्षं तु यथागर्भं स्थपतिः स्थापयेत् स्थिरम्। अत्रानुक्तं तु तत्सर्वं द्रष्टव्यं गर्भलक्षणे ।।१२८।। जिस विधि से गर्भिविन्यास सुरक्षित एवं स्थिर रहे ( तथा भवननिर्माण भी सुरक्षित एवं स्थिर रहे ), उसी रीति से स्थपति को गर्भ स्थापित करना चाहिये। यहाँ जिनका वर्णन नहीं किया गया है, उन सभी का वर्णन गर्भलक्षण ( गर्भिविन्यास, अध्याय- १२ ) में किया गया है।।१२८।। एवं प्रोक्ता भूमितिर्देवतानां वर्णानाञ्चाप्यत्र जात्यन्तराणाम्। ग्रामादीनां मानविन्यासमार्गं सालङ्कारं चारु संक्षिप्य तन्त्रात् ।।१२९।। इस प्रकार देवों के अनुरूप भूमि का माप ( वास्तुमण्डल ), वर्ण एवं अन्य जातियों के अनुकूल माप, ग्रामादिकों का प्रमाण, मार्गयोजना आदि को तन्त्रों से अलङ्कार- सहित, सुन्दर ढंग से एवं संक्षेप में लिया गया है।।१२९।। दद्यान्नृपः स्थपतिकादिचतुष्टयेभ्यो मानादिकर्मनिपुणेभ्य इडाञ्च गाञ्च। नित्यं यथा जगति वित्तमनेकवस्तु- न्याचन्द्रतारमधिवासभुवं मुदा सः ।।१३०।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे ग्रामविन्यासो नाम नवमोऽध्यायः