भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ७१ टिन के साथ कङ्गु धान्य, सीसा के साथ माष (उड़द), तिल पारे के साथ, मूँग को अयस (लोह) के साथ तथा कुलत्थ को ताम्र धातु के साथ रखना चाहिये।।११९।। भाजनाय बलिं दत्त्वा पश्चात् सर्वं निधापयेत् । अङ्गुलाधिकविस्तीर्णमायामं द्वादशाङ्गुलम् ।।१२०।। प्रथमतः पात्र के लिये बलि (उपर्युक्त वर्णित पदार्थ) प्रदान करना चाहिये। इसके पश्चात् सभी पदार्थों को पात्र में रख देना चाहिये। (पात्र को ढकने के लिये) एक अङ्गुल से अधिक चौड़ा तथा बारह अङ्गुल लम्बा पत्र लेना चाहिये।।१२०।। पञ्चाङ्गुलेन वृद्धिः स्याद्द्वात्रिंशत्प्रमाणतः । खादिरं चेन्द्रकीलं स्यात्तस्याग्रं चित्रवृत्तकम् ।।१२१।। बारह अङ्गुल से लेकर पाँच-पाँच अङ्गुल के वृद्धि-मान से बत्तीस अङ्गुल तक (पत्र) का प्रमाण हो सकता है। यह इन्द्रकीलसंज्ञक पत्र खदिर के काष्ठ का गोलाकार निर्मित होना चाहिये।।१२१।। भाजनोपरि तत्स्थाप्यं गर्भन्यासविचक्षणैः । स्थानीये द्रोणमुखे खर्वटे प्रतिनागरे ।।१२२।। गर्भ-विन्यास के ज्ञाता को इस पत्र को पात्र के ऊपर रखना चाहिये। यह गर्भ- विन्यास स्थानीय, द्रोणमुख तथा खर्वट एवं प्रत्येक प्रकार के नगर में करना चाहिये। ग्रामे च निगमे खेटे पत्तने कोत्मकोलके । ब्रह्मण्यार्यर्कभागेऽपि विवस्वति यमे तथा ।।१२३।। मित्रे च वरुणे चैव सोमे च पृथिवीधरे । द्वारदक्षिणदेशे वा ह्येतेषां गर्भ इष्यते ।।१२४।। (उपर्युक्त के अतिरिक्त) ग्राम, निगम, खेट, पत्तन तथा कोत्मकोलक आदि वसति- विन्यासों में गर्भ-विन्यास ब्रह्मा, आर्य, अर्क, विवस्वान्, यम, मित्र, वरुण, सोम एवं पृथिवीधर के भाग में या द्वार के दक्षिण भाग में करना चाहिये।।१२३-१२४।। पुष्पदन्ते च भल्लाटे महेन्द्रे च गृहक्षते । विष्णुस्थाने श्रियः स्थाने स्कन्दस्थानेऽथवा पुनः ।।१२५।। स्थापयेद् ग्रामरक्षार्थं सर्वकामाभिवृद्धये । गर्भमादौ विनिक्षिप्य बिम्बं तदुपरि न्यसेत् ।।१२६।। (द्वार के दक्षिण भाग में) पुष्पदन्त, भल्लाट, महेन्द्र एवं गृहक्षत के पद पर अथवा विष्णु के स्थान (मन्दिर), लक्ष्मी के स्थान या स्कन्द के स्थान में ग्राम की